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संस्मरण प्रेतात्मा के दर्शन -रमेश झा

 

हिमालिनी  अंक अगस्त 2020 ।सन् १९५२ के जून महीने की घटना है । उस समय मैं १४ साल का रहा होऊंगा और बिहार(भारत) के सीतामढी जिले के एक गांव के हाई स्कूल के आठवें वर्ग मे पढ़ता था ।
मेरे पिता तीन सगे भाई थे । उन लोगों के बीच उसी बर्ष होली के बाद पैतृक सम्पति का बंटबारा हो चुका था । इसके फलस्वरूप बड़े चाचा को अपने परिवार साथ नए मकान में जाना पड़ा । उनके एकमात्र लड़के की शादी जो हम सभी चचेरे भाई बहनो में बडे थे पुराने घर में रहते वक्त हो चुकी थी । दुर्भाग्य से हमारी भाभी शादी के पांच साल के अन्दर मिरगी की मरीज बन गई और दो मासुम बच्चियों को जन्म देकर इस संसार से चली गई । अपनी पुत्रवधु के असामयिक निधन से हमारे बड़े चाचा चाची की परेशानियां बेहद बढ़ गई । साथ ही नए मकान में स्थानान्तरित हो जाने से संयुक्त परिवार के परिजनों से मदद पाने का अवसर सीमित हो गया । ऐसी विषम अवस्था में परिवार के बुजुर्ग और शुभेच्क्षुकों ने बडे भैया की दूसरी शादी करवाना ही सर्वोत्तम विकल्प ठहराया और मृत भाभी के वार्षिक श्राद्ध होने से पहले भैया की शादी कर दी गई ।
इधर नई भाभी के आने से पहले एक दिन आधी रात को तेज हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश होने लगी, बिजली की चौंकाचौध और बादलो की टकराहट से आधी रात की तनहाई थम गई और माहौल अशान्त हो जाने पर मेरी नींद टूट गई । तब मंै उत्सुकतावश अपने कमरे के दरबाजा को खोल कर उसके एक पल्ले को अपने बांये हाथ से बन्द किए हुए दूसरे पल्ले को किंचित खोलकर आँगन की ओर देखने लगा । इतने ही मैंने चांदनी और बादलाें के बीच जारी आँख मिंचौली खेल के परिदृश्य में बड़े भैया की मृत पत्नी जैसी सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व की नारी को धवल साड़ी में नंगे पाँव सर पर सूप को छतरी जैसे ओढे हुए तेज रफ्तार मे उस कमरे में प्रवेश करते हुए देखा जिसमें मृत भाभी पहले से रहती थी । इतना देखते ही मैं सहम गया, मेरे रोंगटें खडेÞ हो गए । मैंने तुरन्त दरबाजा बन्द किया और उसी कमरे मे सो रहे अपने पिता को जगाया और उन्हें सारी बातों की जानकारी दीं । इस पर मेरे पिता ने दरवाजा को खोलकर वहीं से कौन गई है उस कमरे में कड़ी आवाज लगाई । उस पर वह उसी तरह सर पर सूप को छतरी की तरह रखे हुए उस दो मुखी कोठरी में प्रवेश कर गई जिसके दरवाजे से परिवार के लोग बाहर सड़क पर जाते थे । इस घटना का जिक्र मैने ही नहीं मेरे पिता ने भी अपनी मां से नही किया । कोइ स्त्री चोरी करने आई होगी (कहकर विराम दिया गया ।

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नई भाभी शादी के १६वें दिन बड़े चाचा के नए मकान मे आ गई । उनके ससुराल आने के कुछ दिन के अन्दर, कहते हैं, उनके शरीर में मृत भाभी की प्रेतात्मा प्रविष्ट कर गई और अकल्पनीय बाते होने लगीं । जब मृत भाभी की प्रेतात्मा नई भाभी में क्रियाशील होती तब वो अधिकतर अपनी सास के विरुद्ध उनके अपने प्रति किए गए कठोर व्यवहार के लिए कोसती और उनसे प्रतिशोध लेने की धमकी देती थी । इतना ही नहीं कभी कभार वो रोने लगती थी । ऐसा ही हुआ एकबार नई भाभी, यानी प्रेतात्मा फूट–फूट कर रोने लगी, उनकी आंखो से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी । इस पर हमारी दादी ने उनसे दुःख वेदना के कारण पूछे, तो वो उस आधी रात की बात कहने लगी जिस रात तेज हवाओं से शुरु हुई मूसलाधार बारिश में उस कमरे में प्रवेश करने पर मेरे पिता ने उसे कडेÞ शब्दों में धमका कर उस कमरे में नही रहने दिया था । प्रेतात्मा के द्वारा उक्त रहस्योद्घाटन होते ही उसके समीप उपस्थित सभी आश्चर्य में पड़ गए । चूँकि मैंने वा मेरे पिता ने उस रात की घटना के बारे मे किसी को कुछ नहीं कहा था, अतः सभी को विस्मय में पड़ना स्वाभाविक था । तत्काल मेरी दादी ने कहा कि वो फिर ऐसी गलती नहीं करेंगे, पाठशाला से आने पर मैं उन्हें समझा दूंगी । इतना भरोसा दिलाने पर प्रेतात्मा ने रोना बन्द किया ।

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पिताजी के पाठशाला से आने पर दादी ने मृतात्मा के उनके ऊपर लगाए गए आरोप का जिक्र किया तो उन्होंने उसकी सत्यता की पुष्टि की इस सन्दर्भ मे चर्चा और आगे बढ़ी तो पिताजी ने उस घटना में चश्मदीद साक्षी के रूप मे मेरे नाम का भी हवाला दिया । चूँकि तब तक मेरा स्कूल खुल जाने से मैं मौका पर उपस्थित नहीं था, अतएव मुझसे सम्पुष्टि नहीं कराई जा सकी । मेरे पिता के पाठशाला से आने तक भाभी सामान्य हो चुकी थी । फलतः मेरे पिता के द्वारा प्रेतात्मा के समक्ष जाकर भूल स्वीकार करने की बात टल गई ।
भाभी की मृत्यु मिरगी रोग से हुई थी, इसे अकाल मृत्यु नहीं कहा जा सकता था, लेकिन उनके श्राद्ध पिण्डदान कर्म मे अवश्य त्रुटि हुई होगी जिससे उनकी आत्मा क्षुब्ध होकर अपनी सौत में प्रविष्ट कर अशान्ति मचा रहने की धारणा बुजुर्गो की बनी । इस समस्या का अबिलम्ब निदान करना जरुरी समझा गया, क्योंकि भाभी दिनानुदिन क्षीण हो रही थी । वो जो कुछ खाती, कहते हैं उसके प्रतिफल में प्रेतात्मा भागीदार हो जाती थी । अंत मे पंडितों कर्मकाण्डियों द्वारा सप्ताहव्यापी मंत्र जाप हवन पूजन कराने पर प्रेतात्मा ने भाभी को सताना छोड़ दिया तब जाकर बड़े चाचा के परिवार में शान्ति स्थिरता बहाल हुई । वैसे तो तुलसी दास जी द्वारा सुझाए गए माध्यम यानी हनुमान चालीसा का शतबार पाठ करने से भी प्रेतात्मा के उपद्रव से त्राण संभव था और है भी ।
‘भुतप्रेत निकट नहीं आवे महावीर जब नाम सुनावें’
(लेखक झा पूर्व न्यायाधीश हैं ।)

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