रिया के उत्पीढ़न की छतिपूर्ति कैसे होगी ? : योगेश मोहनजी गुप्ता

भारत का इलेक्ट्रोनिक मीडिया सम्पूर्ण विश्व के अन्य प्रगतिशील देशों की अपेक्षा राजनैतिक, सामाजिक व अन्य प्रमुख क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। यदि हम राजनैतिक क्षेत्र की चर्चा करें तो भारत में किस पार्टी की सरकार बनेगी अथवा नहीं, इसकी पूर्व अवधारणा के निर्धारण में मीडिया की प्रमुख भूमिका रही है। इसी तरह मीडिया भारतीय समाज में घटित किसी भी घटना को चर्चा का केन्द्र बनाकर न्यायधीश के अन्तिम निर्णय आने से पूर्व ही अपनी अवधारणाओं के आधार पर निर्णय सुना देते हैं और उसी निर्णय के अनुरूप जनता की अभिवृति अथवा विचार बना देते हैं। इस विशेष कार्य की परिणिति के लिये भारतीय मीडिया की प्रशंसा करनी होगी। वर्तमान में भारत का इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया एक अन्य प्रमुख विषय के लिये चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। विगत 4 माह से भी अधिक समय होने के पश्चात भी सुशान्त आत्महत्या की घटना की आरोपी रिया जो कि एक मध्यमवर्गीय परिवार से सम्बद्ध है, उसको भारत की उच्चतम जांच ऐजेन्सियों का सामना करना पड़ रहा है। हमारी भारतीय मीडिया ही है जिसने भारत की उच्चतम जांच ऐजेन्सियों यथा – ईडी, सीबीआई, नारकोटिक्स आदि के जाँच के परिणाम आने से पूर्व ही रिया को दोषी सिद्ध कर दिया था।
सुशान्त के स्वर्गवासी होने का दुख सम्पूर्ण देश को है, परन्तु उसके परिवार ने जिस प्रकार उसकी मृत्यु को भुनाने का प्रयास किया उसका भी दुख सम्पूर्ण देश को आज होना चाहिए। सुशान्त के पिता, जिनकी अपने पुत्र से जीवित रहते कोई वार्तालाप भी नहीं थी, परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात उन्होंने 15 करोड़ की धनराशि को अवैध तरीके से प्रयुक्त करने के आरोप में रिया के विरुद्ध बिहार में एफआईआर दर्ज करवा दी और रिया पर सुशान्त की मृत्यु का आरोप भी लगाया। बिहार के तत्कालीन डीजीपी श्री गुप्तेश्वर पाण्डेय ने मीडिया के द्वारा अपने को चर्चित करने के लिये प्रतिदिन समाचार चैनल पर आना प्रारम्भ कर दिया और अपने पद की मर्यादा का उल्लंघन करके रिया को दोषी मानना प्रारम्भ कर दिया। अपनी ओर से उनका यही प्रयास रहा कि रिया को किसी प्रकार बिहार प्रदेश में लाकर उत्पीढ़न किया जाये, परन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने संभवतया इसमें निहित उनके प्रयोजन का अनुमान लगा लिया तभी उन्होंने इस घटना की सीबीआई जांच के आदेश कर दिये। किसी भी प्रदेश के डीजीपी का पद सम्मानीय होता है, उसकी गरिमा को धूमिल करने का अधिकार किसी को नहीं है। डीजीपी गुप्तेश्वर जी ने सभी मर्यादा व गरिमा का उल्लंघन करते हुए मुम्बई पुलिस की निष्पक्षता को धूमिल करने का पूर्ण प्रयास किया। इस घटना को हमारी इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इतने प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया कि सम्पूर्ण देशवासी रिया के विरुद्ध हो गये। अंततः केन्द्रीय सरकार को इस मुद्दे को बिहार सरकार के आग्रह पर केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरों (सीबीआई) को सौंपना पड़ा। तत्पश्चात सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स विभाग तथा अन्य ऐजेन्सियों के द्वारा सच्चाई को जानने के लिये रिया चक्रवर्ती से दीर्घ समय तक पूछताछ करना आवश्यक हो गया, परन्तु सही कहा गया है कि सांच को आंच नहीं। अतः परिणामस्वरूप रिया चक्रवर्ती के विरुद्ध न तो हत्या, ना ही अवैध तरीके से धन का उपयोग का मुद्दा और ना ही नारकोटिक्स विभाग की अवहेलना का मुद्दा सत्य सिद्ध हुआ। अंततः उच्च न्यायालय के आदेशानुसार रिया को जमानत पर मुक्त किया गया है और आदेश बहुत स्पष्ट किया कि रिया का कोई दोष नहीं है।
भारत के संविधान व न्यायालय के द्वारा रिया चक्रवर्ती की निश्छल छवि की सच्चाई का आदेश, वास्तविकता से अवगत कराने के लिये पर्याप्त है। एक व्यक्ति के द्वारा झूठी रिपोर्ट लिखवाने पर भी नेता लोगों के कारण एक ईमानदार नागरिक भी झूठे आक्षेपों से ऐसे भंवर में फंसता जाता है जहाँ उसका भविष्य तो अंधकारमय हो ही जाता है साथ ही सम्पूर्ण देश भी उसे एक अपराधी समझने लगने लगता है। सुशान्त की आत्महत्या के मूल कारणों को भली भांति जानते हुये भी किसी ने सच्चाई से अवगत नहीं कराया। अब सुशान्त की मृत्यु से संबंधित सभी तथ्य स्पष्ट है। वास्तविकता यह है कि सुशान्त बिहार प्रदेश के एक मध्यम परिवार से था, वह अपने सपनों को साकार करने हेतु मुम्बई आया था, मुम्बई में सुशान्त की किस्मत साथ देती है और मात्र 7-8 वर्ष की अल्प अवधि में ही वह एक सफल अभिनेता बन जाता है, परन्तु एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म होने के कारण उसने धन के आभाव में जीवन के संघर्ष को देखा था, परन्तु इतने कम समय में जीवन में सफलता प्राप्ति ने उसको पथ भ्रष्ट किया। सुशान्त ने धन सम्पदा की प्राप्ति से विलासिता पूर्ण दिनचर्या बना ली, महिला व पुरुष मित्रों के साथ विदेशों में घूमना, वहाँ पूर्ण सुख प्राप्त करना, अपनी जीवन शैली में शामिल कर लिया। इसी जीवन शैली में वह नशे आदि व्यसनों का अभ्यस्त हो गया। उसने एकान्त में अपना फार्म हाउस बना लिया, जहाँ उसने अपने महिला मित्रों के साथ विलासिता पूर्ण दावतों का आयोजन करना प्रारम्भ किया तथा समुद्र के बीच टापू पर अपने महिला मित्रों के साथ अपने धन को व्यय करना प्रारम्भ कर दिया। सुशान्त के परिवार के सदस्यों को यह भ्रम था कि उसके पास 15-17 करोड़ की धनराशि होनी चाहिये। इसी भ्रम के कारण उन्होंने रिया के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करा दी, जिसके परिणामस्वरूप रिया को 4 माह तक विभिन्न प्रकार की जांच ऐजेन्सियों एवं जनता के विभिन्न परीक्षणों से त्रस्त होना पड़ा। इस ज्वलन्त मुद्दे में कंगना रानौत ने भी अपने अर्नगल वक्तयों से मीडिया में अपनी छवि बनाने का प्रयास किया और सफलता भी प्राप्त की। वह अपने लिये केन्द्र सरकार से वाई श्रेणी सुरक्षा की सुविधा प्राप्त करने में सफल हो गई। अब सुशान्त की आत्महत्या की प्रत्येक अनसुलझी कड़ी सुलझ चुकी है। वास्तविकता प्रकट हो चुकी है, परन्तु इतने माह के अंतराल में रिया चक्रवर्ती के उत्पीढ़न की क्षतिपूर्ति कैसे होगी और कौन करेगा? यह प्रश्न चिह्न सभी बुद्धिजीवी जनता के मन को झकझोर देता है और क्या मीडिया के द्वारा भविष्य में ऐसी ही किसी अन्य घटना को जनता के आकर्षण का केन्द्र नहीं बनाया जायेगा? मीडिया या अन्य नेतृत्व ऐसा विश्वास दिला सकते है कि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति नहीं होगी।

चेयरमैन
आई आई एम टी यूनिवर्सिटी
मेरठ
भारत

