चीन की विस्तारवादी नीति का हिस्सा तो नहीं बन रहा नेपाल ? : डॉ. श्वेता दीप्ति
डॉ.श्वेता दीप्ति, जमीन का भूखा चीन अपने हर पडोसी से झगड़ा करता रहा है
हिमालिनी अंक अक्टूबर 2020 | नेपाल सरकार २००५ से चीन के साथ सीमा विवाद में उलझी है । इसी विवाद के चलते नेपाल ने २०१२ में हुई सीमा संबंधी बातचीत को भी रद्द कर दिया था । लेकिन पिछले कुछ सालों ने नेपाल की राजनीति में जो परिवर्तन आया है उससे स्पष्ट पता चल रहा है कि, नेपाल की राजनीति कहीं ना कहीं चीन से अत्यधिक रूप में प्रभावित हो रही है । कई विषयों पर सत्ता पक्ष की खामोशी बताती है कि वह दबाव में है । देश की जनता से अधिक वो किसी अप्रत्यक्ष शक्ति के दबाव में है । जिसका सबसे ताजा उदाहरण है हुम्ला की घटना, जहाँ स्थानीयवासी कहते हैं कि नेपाल की जमीन का अतिक्रमण हुआ है वहीं सरकार सर्वेक्षण के रिपोर्ट का इंतजार भी नहीं करती है और घोषणा कर देती है कि चीन ने कोई अतिक्रमण नहीं किया है । यहाँ देश में एक मजबूत विपक्ष की कमी जरुर खलती है हालांकि काँग्रेस ने इसका विरोध किया और अब जाकर सरकार यह कह रही है कि वहाँ पोस्ट बनाया जाएगा । जो भी हो पर सरकार की कमजोरी तो जाहिर हो ही चुकी है ।
जहाँ इस विषय पर सरकार की सुस्ती नजर आ रही है वहीं चीन ने अपनी ओर से सर्वेक्षण की प्रक्रिया पूरी कर ली है । चीन सरकार ने नेपाल में दोनों देशों की सीमा पर बनी इमारतों के बारे में सवाल उठाए जाने के बाद सर्वेक्षण और मानचित्रण विभाग से तकनीशियनों को भेजकर इस क्षेत्र का फिर से सर्वेक्षण किया है । चीनी अधिकारियों के अनुसार, इमारत के निर्माण से पहले साइट का सर्वेक्षण और मैप किया गया था । फिर भी सीमा का सवाल उठने पर यह दूसरा सर्वेक्षण किया गया है ।
सर्वेक्षण पूरा होने के बाद, चीन ने पिलर नंबर ११ और १२ को निशाना बनाते हुए एक नक्शा बनाया है और इसे अपने मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के माध्यम से सार्वजनिक किया है ।
उसने दावा किया है कि उसने जो भवन बनाया है वह नेपाल चीन सीमा के दो किलोमीटर के भीतर है । क्षेत्र के एक उच्च पदस्थ अधिकारी ने पत्रिका को अपने सर्वेक्षण के बारे में एक विस्तृत साक्षात्कार दिया है । दूसरे शब्दों में, चीन सरकार ने इस अध्ययन के माध्यम से अपने विचार सार्वजनिक किए हैं और यह जता दिया है कि नेपाल का दावा गलत है उसने भवन का निर्माण अपनी जमीन पर किया है । किन्तु नेपाल सरकार की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है ।
जबकि अगर हालात पर नजर डाली जाए तो नेपाल के पहाड़, मैदानी इलाकों और उसकी नदियों तक चीन की पहुंच हो चुकी है ।
चीन नेपाल रिश्तों को लेकर कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि ओली सरकार, बीजिंग के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रही है । नेपाल के दोलखा, गोरखा, धारचुला, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुआसभा और रसूवा जिलों में चीन ने अतिक्रमण किया हुआ है किन्तु सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है । नक्शा और भूमि सर्वेक्षण विभाग के मुताबिक चीन दोलखा स्थित अंतर्राष्ट्रीय सीमा का १५०० मीटर हिस्सा अतिक्रमण कर चुका है । उसने कोरलांग क्षेत्र के पिलर संख्या ५७ पर अतिक्रमण किया । दरअसल ये वो इलाका है जिसकी सीमा को लेकर दोनों देशों के बीच पहले से तनाव चल रहा है और चीन की सरकार नेपाल पर इस सीमा विवाद को अपने हित में सुलझाने को लेकर पहले से दबाव बना रही है ।
चीन ने गोरखा जिले की सीमा पर पिलर नंबर ३५, ३७, और ३८ को रिलोकेट किया है । वहीं नांपा भांज्यांग में बाउंड्री पिलर ६२ पर भी जमीन हक जता रहा है । पहले घ पिलर गोरखा के रुई गांव और टाम नदी के करीब थे । चीन ने २०१७ में ही पूरा गांव हड़पने के साथ इस इलाके को तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र से जोड़ दिया था । हालांकि अभी तक ये गांव नेपाल के नक्शे में है और स्थानीय लोग नेपाल सरकार को ही अपना टैक्स देते हैं ।
इसी तरह मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक दारचुला के जियूजियू गांव का एक हिस्सा भी चीन ने अपने कब्जे में ले लिया है । इस वजह से नेपाल के कई घर अब चीनियों के अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं ।
नेपाल के कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट में भी कुछ दिनों पहले चीन के कई इलाकों में नेपाली जमीन हड़पने का खुलासा हुआ थ । जिसमें नेपाली जिलों के ११ स्थानों पर अवैध चीनी कब्जे का जिक्र था । हुमला जिले में चीन ने सड़क निर्माण के जरिये बागडारे खोला और करनाली नदी का रुख मोड़ जमीन कब्जा करने की कोशिश की है वहीं तिब्बत में निर्माण गतिविधियों के चलते सिनजेन, भुरजुक और जंबुआ खोला के रुख में हुए बदलाव से रसुवा की जमीन पर चीनी कब्जे की जानकारी साझा की गई थी । वहीं अरुण नदी, कमखोला नदी, समदुग नदी के पास भी चीन की कारगुजारियों का खुलासा हुआ था ।
हुमला में सूत्रों के अनुसार कई सालों से लाप्चा, लिमी क्षेत्र में चीन अतिक्रमण कर रहा है । यह क्षेत्र बहुत ही महत्त्वपूर्ण रणनीतिक स्थान है और यहां से कैलाश मानसरोवर यात्रा का स्पष्ट नजारा दिखता है । १० साल पहले जब क्षेत्र में सड़क निर्माण किया गया था तो चीन ने वहां एक इमारत का निर्माण किया था । नेपाल के इस पर आपत्ति जताने पर चीन ने इसे पशु चिकित्सा केंद्र बताया और कहा कि वह केंद्र दोनों देशों के लिए उपयोगी होगा । लाप्चा लिमी क्षेत्र देश का सुदूर इलाका है । यहां प्रशासन की प्रभावित उपस्थिति नहीं रहती है । चीन ने इसी बात का फायदा उठाते हुए इमारतों का निर्माण किया और अब खुले तौर पर उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह जमीन नेपाल की नहीं है । सूत्रों के अनुसार चीन पिछले कई महीनों से तिब्बत में अपने अधिकार क्षेत्र के तहत सड़कों का निर्माण कर रहा है । इससे नेपाल में बहने वाली कुछ नदियों का रास्ता बदल गया है । इस स्थिति ने चीन को नेपाल की जमीन पर कब्जा करने का मौका दे दिया है ।
चीन का कहना है कि नदी उसके क्षेत्र में बह रही तो जमीन भी उसी की है । चीन की इस चालबाजी ने सरकार के लिए परेशानियां खड़ी कर दी है परन्तु इस पर सरकार की खामोशी अवश्य प्रश्न खडा करती है । इन हालातों में हम यह कह सकते हैं कि सरकार का राष्ट्रवाद सिर्फ भारत के साथ सीमा विवाद पर जगता है । देश की यह विदेश नीति किसी भी मायने से सही नहीं कही जा सकती है ।
वैश्विक स्तर पर चीन की विस्तारवादी नीति का असर
चीन की जब भी चर्चा चलती है तो नेपोलियन बोनापार्ट का कथन याद आता है, उन्होंने कहा था कि, ‘वहां एक दैत्य पड़ा सो रहा है, उसे सोने दो, क्योंकि जब वह उठेगा तो आतंक पैदा कर देगा ।’ नेपोलियन की यह भविष्यवाणी दो सौ साल बाद काफी हद तक सही साबित हो रही है । दरअसल चीन में राजशाही हो, गणतंत्र हो या साम्यवादी शासन, हर काल में उसने ताकत और हथियार के बल पर अपने साम्राज्य का विस्तार किया है ।
चीन के कई प्राचीन राजवंशों ने देश की सीमा को कोरिया, वियतनाम, मंगोलिया और मध्य एशिया तक बढ़ाया । १९४९ में जब चीन में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई तो यह विस्तारवादी नीति और उग्र हो गयी । माओ का कथन था, ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है ।’ माओ ने अपने देशवासियों को भरोसा दिलाया था कि प्राचीन काल में चीन की सीमाएं जहां तक थीं, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी उसे जरूर हासिल करेगी । इसके बाद चीन हर हथकंडे अपनाकर अपनी सीमा का विस्तार करने लगा । चीन अपने १४ पड़ोसियों की जमीन पर तो दावा करता ही है वह ड हजार किलोमीटर दूर अमेरिका के हवाई द्वीप को भी अपना मानता है । चीनियों के मुताबिक चीनी नाविकों ने कोलबंस से बहुत पहले ही अमेरिका की खोज कर ली थी । अमेरिका के न्यू मैक्सिको राज्य के चट्टानों पर बने चित्र इसके प्रमाण हैं । इतना ही नहीं चीन यह भी कहता है कि यूरोप की खोज से शताब्दियों पहले उसके नाविक आस्ट्रेलिया में बस गये थे । चीन अपनी विस्तारवादी नीति के लिए युद्ध अनिवार्य मानता है इसलिए दुनिया के २३ देश उसकी कुटिल चाल से परेशान हैं ।
दुनिया में सबसे अधिक पड़ोसी चीन को मिले हैं । चीन की सीमा १४ देशों से मिलती है । भूगोल ने उसको एक बड़ी नेमत दी है लेकिन जमीन का भूखा चीन अपने हर पडोसी से झगड़ा करता रहा है । उससे केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के २२ और देश परेशान हैं । एक नजर दुनिया के उन देशों पर जो चीन की विस्तारवादी नीति का शिकार बन रहा हैः
अफगानिस्तानः अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत पर चीन अपना दावा करता है । १९६३ की संधि के बावजूद उसने इस प्रांत में अतिक्रमण कर रखा है ।
भूटानः भूटान के चेरपिक गोम्पा, धो, डंगमार, गेसूर डोकलाम, सिचुलंग, द्रामना और हा जिले के भूभाग को चीन अपना मानता है । चीन ने भूटान में भी घुसपैठ कर रखी है ।
ब्रुनेईः दक्षिण चीन सागर स्थित ब्रुनेई के स्प्रैटली द्वीप पर चीन अपना दावा करता है । म्यांमारः चीन का कहना है कि युआन राजवंश (१२७१–१३६८) के शासन में बर्मा चीन के अधीन था । म्यांमार से भी चीन का सीमा विवाद है ।
कम्बोडियाः चीन के मुताबिक कम्बोडिया मिंग राजवंश (१३६८–१६४४) के समय चीन का हिस्सा था । इसलिए उसके बड़े भूभाग पर चीन दावा करता रहा है ।
भारतः सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में चीन घुसपैठ करता रहा है । १९६२ की लड़ाई के बाद चीन ने भारत की ३८ हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है ।
इंडोनेशियाः दक्षिणी चीन सागर में इंडोनेशिया के नातुना द्वीप समूह पर चीन अपना दावा करता रहा है ।
जपानः पूर्वी चीन सागर में जापान के सेनकाकू द्वीप पर को भी चीन अपना कहता है ।
कजाकिस्तानः चीन का दावा है कि कजाकिस्तान चीनी सम्राट कुबलई खान (१२६०–१२९४) के समय उसका हिस्सा था । चीन कजाकिस्तान के बड़े भूभाग पर अपना दावा करता रहा है ।
किर्गिस्तानः चीन किर्गिस्तान को भी प्राचीन चीन का हिस्सा मानता है । उसका आरोप है कि १९वीं शताब्दी में रूस ने इस पर अपना अधिपत्य जमा लिया ।
लाओसः चीन के मुताबिक लाओस भी चूंकि युआन राजवंश (१२७१–१३६८) के समय उसका हिस्सा था, इसलिए इस देश की जमीन पर भी उसका दावा है ।
मलेशियाः दक्षिणी चीन सागर में स्प्रैटली द्वीप समूह में कई द्वीप हैं । यहां के अलग अलग द्वीपों पर मलेशिया, वियतनाम, चीन, ताइवान और फिलीपींस का कब्जा है । मलेशिया के कब्जे वाले द्वीप को चीन अपना मानता है ।
मंगोलियाः युआन राजवंश (१२७१–१३६८) साम्राज्य के आधार पर मंगोलिया की जमीन पर भी चीन दावा ठोकता रहा है ।
नेपालः १७८८–१७९२ के बीच चीन और नेपाल में युद्ध हुआ था । इस युद्ध में चीन ने नेपाल के कई इलाकों पर कब्जा जमाया था । हाल में यह बात सामने आयी है कि चीन ने नेपाल के ११ इलाकों पर कब्जा जमा रखा है ।
उत्तर कोरियाः चीन युआन राजवंश (१२७१– १३६८) साम्राज्य के आधार पर उत्तर कोरिया के बेकडू पर्वत और जियानदाओ पर दावा करता रहा है ।
पाकिस्तानः पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित बाल्टिस्तान और चीन के शिजियांग प्रांत की सीमा आपस में मिलती है । इस इलाके में चीन ने अपना दावा ठोका । भारत की सुरक्षा खतर में डालने के लिए पाकिस्तान ने चीन को शक्सगाम घाटी में काराकोरम सड़क बनाने के लिए जमीन दे दी ।
फिलीपींसः दक्षिणी चीन सागर में फिलीपींस के स्कारबरो शोल और स्प्रैटली द्पीप को चीन अपना मानता है ।
रूसः चीन ने हाल ही मे दावा किया है कि रूस का व्लादिवोस्टक शहर १८२० में चीन का हिस्सा था । वह पहले भी रूस की हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन अपना दावा ठोकता रहा है ।
सिंगापुरः दक्षिणी चीन सागर के कुछ हिस्से को लेकर चीन का सिंगापुर से भी विवाद है ।
ताइवानः वन चाइना थ्योरी के मुताबिक चीन, ताइवान को अपना हिस्सा मानता है । १९४९ में जब चीन में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई थी तब चीन के तत्कालीन शासक चांग काई शेक ने ताइवान में अपनी निर्वासित सरकार बना ली थी । ताइवान खुद को आजाद देश मानता है और चीन दावे को खारिज करता रहा है ।
तजाकिस्तानः चिंग राजवंश (१६४४ से १९१२) के शासन के आधार पर चीन तजाकिस्तान पर भी अपना दावा करता रहा है ।
वियतनामः चीन के मुताबिक मिंग राजवंश (१३६८–१६४४) के समय वियतनाम चीन के अधीन था । इसके अलावा चीन वियतनाम के पारासेल द्वीप पर भी अपना अधिकार मानता है ।
दक्षिण कोरियाः पूर्वी चीन सागर के कई द्वीपों पर दक्षिण कोरिया का अधिकार है । लेकिन चीन इसे अपना मानता है ।
इतना ही नहीं चीन ने अपनी कर्ज नीति के तहत कई देशों को विवश कर दिया है अपनी बात मनवाने के लिए । चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह, एयरपोर्ट, कोल पावर प्लांट, सड़क निर्माण में ३६,४८० करोड़ रुपये का निवेश किया था । २०१६ में यह कर्ज ४५,६०० करोड़ रुपये हो गया । श्रीलंका यह कर्ज नहीं चुका सका । इस पर उसे हंबनटोटा बंदरगाह चीन को ढढ साल के लिए लीज पर देना पड़ा यानि श्रीलंका की कई पीढियाँ चीन की आर्थिक रुप से गुलाम हो गई है ।
पाकिस्तान की हालत भी कुछ ऐसी ही है । भारत से दुश्मनी निभाने के लिए चीन के करीब होता पाकिस्तान अपनी बदहाली को दस्तक दे चुका है । चीन ने पाकिस्तान के सीपीईसी प्रोजेक्ट में ४.५६ लाख करोड़ रुपये निवेश किए हैं । इसकी बड़ी रकम कर्ज के तौर पर है । इसकी ब्याज दर ७ फीसदी है । चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के पास नौसेना का बेस बनाना चाहता है । चीन पाकिस्तान को अपना सबसे अहम साझेदार मानता है । चीन की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं यहाँ चल रही हैं । लेकिन इनमें चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा सबसे अहम और बड़ी निवेश परियोजना है । जिसमें ६२ अरब डालर से अधिक का निवेश होने का अनुमान है । सीपीईसी बलूचिस्तान के बीचोबीच है । लेकिन वहां के नागरिक इस परियोजना को सरकार और चीन की दमनकारी नीति मानते हैं । पाकिस्तान चीन के भारी कर्ज से भी दबा हुआ है । बढ़ते कर्ज से परेशान पाकिस्तान कर्ज के लिए हमेशा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की ओर देखता रहता है ।
चीन ने बांग्लादेश से बीआरआई प्रोजेक्ट में समझौता किया था । चीन ने बांग्लादेश में द्द.डढ लाख करोड़ रुपये लगाए हैं और अब बंगला देश को भी चीन की मंशा का पता चल गया है ।
मालदीव ने २०१६ में १६ द्वीपों को चीनी कंपनियों को लीज पर दिया था । अब चीन इन द्वीपों पर निर्माण कार्य कर रहा है । ताकि हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के आसपास होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भारत पर नजर रख सके । जाहिर तौर पर यह सारे काम चीन अपनी मजबूती और भारत पर लगातार दवाब बनाने के लिए कर रहा है जिसका एक हिस्सा नेपाल भी बन रहा है हालांकि सरकार हमेशा यह कहती रही है कि नेपाल अपनी धरती का प्रयोग भारत विरोधी कार्यों के लिए नहीं होने देगा पर अनदेखा सत्य यह है कि यह हो रहा है ।
एक ओर कर्ज दो और फिर ऐसे हालात पैदा करो कि सामने वाला स्वतः घुटनों पर आ जाय दूसरी ओर अपने सभी सीमा से आबद्ध देशों के साथ विवाद पैदा करो और अपना वर्चस्व जताओ यही चीन की नीति है जिसका उदाहरण सामने है । बावजूद इसके अगर कोई देश स्वयं आगे बढकर उसे अपना हाथ पकडने का अवसर देता है तो यकीनन वह पूरे शरीर पर कब्जा अवश्य करेगा जमीनी हकीकत यही बयान करती है । ऐसे में हम अपनी सरकार से इतना तो अवश्य उम्मीद कर सकते हैं कि वह देश के विकास के नाम पर देश को गिरवी ना रखे और सीमा विवाद चाहे वह भारत के साथ हो या चीन के साथ अपना पक्ष मजबूती के साथ रखने के हालात पैदा करें ।

