39 प्रतिशत लोग अपना काम कराने के लिए रिश्वत देते हैं : वीरेन्द्र बहादुर सिंह
भ्रष्टाचार मे हम आगे क्यों ?
वीरेन्द्र बहादुर सिंह, कोरोना के इस समय में मास्क न पहनने वालों के लिए सरकार ने दो हजार रुपए का जुर्माना तय किया है। पुलिस अगर किसी को बिना मास्क के पकड़ती है तो ज्यादातर लोगों का रिएक्शन यही होता है कि ‘साहब 5 सौ रुपए ले लीजिए और जाने दीजिए। मुझे जुर्माने की रसीद नहीं चाहिए।’ कार में बिना सीट बेल्ट पहने, बाइक पर बिना हेलमेट पहने जब हमें पुलिस पकड़ती है तो हम सौ रफ़पए देकर मामला निपटा कर आगे बढ़ जाते हैं। उसके बाद चिल्लाते हैं कि हमारे देश में करप्शन बहुत बढ़ गया है। जबकि करपशन बढ़ाने वाले हम खुद हैं। अभी जल्दी ही ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल नामक एक ग्लोबल आर्गेनाईजेशन का डाटा सामने आया है, जिसमें पूरे एशिया में भारत को सब से भ्रष्ट देश के रूप में पहला नंबर दिया गया है। देश में 39 प्रतिशत लोग अपना काम कराने के लिए रिश्वत देते हैं। यह जानकर कितनी शरम आ रही है।
इसी दिसंबर महीने की 9 तारीख को पूरी दुनिया एंटी करप्शन के दिवस के रूप में मनाती है। ऐसे में हमेें सोचना चाहिए कि हम कितने भ्रष्टाचारमुक्त हैं। भ्रष्टाचार एक ऐसा राक्षस है जो हमारे सहयोग के बिना पलबढ़ नहीं सकता। हमें कार चलानी है, पर हम साथ में ड्राइविंग लाइसेंस नहीं रखना चाहते। बंद के दिन दुकान खोलनी है? जो मिल जाए धंधा कर लेना है। कोई भी नियम के अनुसार निर्माण कार्य नहीं कराता है, जब सरकारी अधिकारी या पुलिस जुर्माना लेने आती है तो सभी सब से पहले उन्हें पटाने की बात करते हैं। यही पटाने वाली बात समझ लीजिए कि भ्रष्टाचार को जन्म देती है।
करप्शन के कानून में रिश्वत देेना और लेना, दोनों ही अपराध माने जाते हैं। इस बात को हम सभी जानते हैं, पर हमेशा छोटा रास्ता ही पसंद करते हैं। कम से कम जुर्माना भरना पड़े इसके लिए हम पुलिस या सरकारी अधिकारी रिश्वत दे कर खुश होते हैं। ऐसा कर के हम सिस्टम को भ्रष्ट बना रहे हैं, यह भूल जाते हैं। बिगड़ चुका यह सिस्टम हमारे बच्चों को ही तकलीफ पहुंचाएगा, हम यह भी नहीं सोचते। आज देश मेें ऐसी स्थिति बन चुकी है कि जन्म प्रमाण पत्र सेे ले कर मृत्यु प्रमाण पत्र तक प्राप्त करने लिए रिश्वत देनी पड़ती है। ऊपर का पैसा दिए बगैर फाइल आगे नहीं बढ़ती। सरकारी साहबों को खुश करना पड़ता है। आरोपी का वारंट है तो आरोपी का वारंट ले जाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। स्कूल के डोनेशन से ले कर नौकरी पाने से ले कर अस्पतालोे में जल्दी हार्ट का ऑपरेशन कराने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है।
इन सभी परिस्थितियों को हम जानते हैं तभी तो साहस के साथ कहते हैं कि हमारे देश के लोग कितना करप्ट हो गए हैं। हमारे देश में ऊपर का पैसा दिए बगैर कोई काम होता ही नहीं है। ऐसे में ही हम विदेशों की याद करते हैं और भाषण देते हैं कि अमेरिका में रात 12 बजे भी चौराहे पर कोई न भी हो तब भी लाल लाइट होने पर लोग कार रोक देते हैं। लंदन में तो अगर रास्ते पर कोई कचरा फेंकता है तो उसे तुरंत जुर्माना भरना पड़ता है। हईवे पर स्पीड लिमिट क्रास करते ही तुरंत पुलिस आ जाती है। हमारे देश मेें तो कोई सिस्टम ही नहीं है। लोगों का जैसा मन होता है, वैसा करते हैं। यहां ‘लोगों’ शब्द का जो उपयोग किया गया है, उसमें हम भी शामिल हैं। दरअसल हमें हकीकत मेें आउट आफ टर्न काम करने की उतावल जो होती है। दुनिया में ऐसा कोई अधिकारी नहीं है जो आपको रिश्वत देने के लिए मजबूर कर सकता है। आप खुद अपना काम जल्दी कराना चाहते हैं, आउट आफ टर्न कराना चाहते हैं, गैरकानूनी कराना चाहते हैं, कम पैसा देकर कराना चाहते हैं, कोई लाभ लेना चाहते है, इसलिए रिश्वत देते हैं। रिश्वत लेने के आदी हो चुके अधिकारी, पुलिस, कर्मचारी बाद मेें सही काम करने के लिए भी पैसा मांगने लगते हैं।
ऐसे में हम मना करने की हिम्मत नहीं कर पाते। डर लगा है कि मनाउया पैसा न देने पर वह हमारा काम न बिगाड़ दे। परिणाम हमारे सामने है। भारत समग्र एशिया मेें सब से भ्रष्ट देश के रूप में आज हम सब के सामने है। पर हम सभी पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।
दरअसल रिश्वत-भ्रष्टाचार इतना माइक्रो लेबल तक हमारी जिंदगी में रचबस गया है कि घर में भी छोटेमोटे काम कराने लिए रिश्वत देने लगे हैं। बच्चे होमवर्क करने के पहले शर्त रख देते हैं कि पहले मुझे एक घंटे टीवी पर कार्टून शो देखने दो, उसके बाद हम होमवर्क करेंगे। दरअसल यह भी एक तरह की रिश्वत ही है। आखिर बच्चों ने यह बात कहां से सीखी? अगर हम इस बारे में विचार करें तो पता चलता है कि बच्चों को हमने ही यह सिखाया है। हम खुद ही बच्चोें से कहते हैें कि अगर तुम परीक्षा में 80 प्रतिशत नंबर ले आओगे तो तुम्हें घड़ी या बाइक दिलाएंगे। आखिर यह बात भी तो लालच देने की ही है न?
बच्चों को मोटिवेट करने के लिए तमाम रास्ते हैं। परंतु हम हमेशा आसान रास्ता ही खोजते हैं। बच्चे के नंबर के साथ हम उसकी मनपसंद चीज जोड़ देते हैं तो बच्चा खुद ही इक्वेशन बना लेता है कि कुछ चाहिए तो कुछ देना भी पड़ेगा और इस गलत इक्वेशंस द्वारा बच्चों को गलत सीख मिलने लगती है। आज बच्चे के पास जब ऑनलाइन एजूकेशन के लिए हाथ में स्माट फोन है तो बच्चे पैरेंट्स से शर्त रखने लगे हैं कि मुझे मेरे मोबाइल में गेम खेलने दोगे तभी मैं ऑनलाइन क्लास में बैठूंगा। पूरी बात हम जहां से शुरू करते हैं, लौट कर वहीं आ जाती है।
भारत में जहां 39 प्रतिशत लोग रिश्वत दे कर काम कराते हैं, वहीं जापान में करप्शन मात्र दो प्रतिशत है। इसके पीछे जापान का फेमिली डिसिप्लन और एजूकेशन सिस्टम जिम्मेदार है। जापान के स्कूलों में स्टूडेंट खुद सफाई करते हैं और कोई अभिभावक इसका विरोध नहीं करता। टेक्नोलॉजी में आगे होने की वजह से जापान के अपने सवाल है। परंतु जापान में सब से महत्वपूर्ण यह है कि वहां काम कराने के लिए रिश्वत नहीं देनी पड़ती। अगर हम सभी रिश्वत देना बंद कर दें तो हमारा देश भी रिश्वतखोर देश के कलंक से बाहर आ सकता है। रिश्वत कोई तभी लेता है या मांगता है, जब कोई उसे रिश्वत देता है। तो क्या हम रिश्वत देना बंद कर के अपने देश को रिश्वतखोर के कलंक से उबार सकते हैं?

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