सुलगता नेपाल : अजयकुमार झा
हिमालिनी ,२०२० डिसेम्वर अंक | देश का अर्थ सिर्फ जनसंख्या और भौगोलिक क्षेत्रफल ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक ईकाइ भी है । किसी भी देश के निर्माण में सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय योगदान होता है । धार्मिक, सांस्कृतिक और सभ्य मानवीय धरोहर ही राष्ट्रवाद, देशभक्ति और राष्ट्रीयता का आधार होता है । संसार के सभी देश सांस्कृतिक आधार को बड़े गर्व के साथ अपने अंतस में स्वीकार किए होता है । जब किसी देश का सांस्कृतिक आधार नष्ट होता है तो समझो उस देश की पहचान, परिचय और राष्ट्रीयता भी स्वतः समाप्त हो जाती है ।
मजबूत सांस्कृतिक आधार, किसी भी देश और समाज के सबलता और सम्पन्नता का सूचक भी माना जाता है । आधुनिक युग में सांस्कृतिक आक्रमण ही साम्राज्यवादियों के लिए सबसे सरल और सम्मानजनक कदम है, जिसे नेपाल जैसे देश के बुद्धिजीवियों और नेताओं में समग्रता से समझने की क्षमता का अभाव देखा गया है । विकसित देशों के द्वारा अविकसित देशों के हित के लिए लाए गए ९९ प्रतिशत योजनाओं के पीछे उनकी अपनी दूरगामी विस्तारवादी योजना होती है, जिसे मछली की तरह तात्कालीन प्रलोभन में पÞmसकर हम सब भयानक भूल कर बैठते हैं, और इसका तिब्बतियों, इराकियों, अफगानियों की तरह भयानक मूल्य भावी पीढि़यों को चुकाना पड़ता है । आज हम नेपाली भीषण वैश्विक षडयंत्र का शिकार बनते जा रहे हैं । धर्मनिरपेक्षता के आड़ में गरीब नेपालियों को आर्थिक प्रलोभन देकर उनका धर्मपरिवर्तन करा देश में जातीय और सामाजिक विभेदकारी नीतियों को अपनाकर जातीय दंगा और गृहयुद्ध जैसे हालत सृजन करना, और अंत में अप्रत्यक्ष रूप में मनोवांछित शासन पद्धति स्थापित करना ही उनका परम उद्देश्य है ।
आदिम युग से ही वैदिक सनातन हिन्दू दर्शन की आधारभूमि तथा युगद्रष्टा महान ऋषिमुनि, तपस्वी, देवीदेवता और साधु सन्तों के तपोस्थली के रूप में अस्तित्ववान नेपाल को षडयंत्र पूर्वक धर्मनिरपेक्ष घोषित कर देश के प्राण को ही नेस्तनाबूत करने में हमारे मूढ़ बुद्धिमान और धृतराष्ट्र पुत्र नेताओं ने विदेशियों के इशारों पर बड़े उत्साह और उमंग के साथ नपुंसकों की तरह तालियाँ बजाकर अपने पूर्वजों के सम्मान को उखाड़ फेकने में बहादुरी दिखाइ । वि.सं.२०६३÷६४के आन्दोलन में कहीं किसी भी पार्टी के द्वारा नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की बात ही नहीं चलाई गई थी, फिर एकाएक यह घोषणा हुई कैसे ? क्या हमारे तथाकथित नायकों को इस शब्द के मौलिक अर्थ का ज्ञान था ? क्या आम नागरिक को इस शब्द से होने वाले दूरगामी बहुआयामिक दुष्परिणाम के बारे में जानकरी दी गई है ? धर्मनिरपेक्ष शब्द का सामान्य अर्थ है धर्म के प्रति किसी प्रकार के पक्ष–विपक्ष का कोई भाव नहीं । जबकि हमारे वैदिक शास्त्रों के अनुसार धर्म की जो व्याख्या की गई है, उसमे सत्य, दया, अहिंसा, सदाचार,सब के प्रति समभाव रखना, समान दृष्टि होना, सहयोगी भाव होना, सत्य बोलना, परोपकार करना, किसी को पीड़ा न पहुँचाना । इन्हें ही धर्म के आचरण के रूप में मान्य कहा गया है ।
इन सुन्दर आचरणों के स्वामी को धार्मिक कहा गया है । उपरोक्त धर्म निरपेक्ष के भाव को विश्लेषण करने पर यह प्रमाणित होता है कि अब नेपाल में निर्मला जैसे हत्या काण्डों का कोई मुल्य नहीं, खुल्लम खुल्ला भ्रष्टाचार करना कोई गुनाह नहीं, कंश, रावण, हिटलर, किमजोङ्ग, की तरह जनता को कर के चक्की में पीसकर दीन–निरीह बनाकर कोरोना जैसे महामारियों के चपेट में मरते छोड़ देना कोई अन्याय नहीं, डा. केसी जैसे दयावान समाजसेवियों की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं । डा, सन्दुक रूइत जैसे वैज्ञानिकों के प्रति आदरयुक्त भाव का कोई मुल्य नहीं । अन्नदाता किसानों के जीवन के प्रति कोई उत्तरदायित्व नही । बलात्कारियों के जुर्म का कोई दण्ड नहीं, अर्थात, शक्तिशाली के सभी अपराध क्षम्य तथा आम नागरिकों का जीवन कीड़े मकोड़े की तरह होता है की मान्यता रखना ही धर्मनिरपेक्षता का भावार्थ निकलता है । सरकार को न मानवता से प्रेम है और न दानवता से घृणा । देश और जनता को कोमा के हालत में छोड़कर खुद मौज में मस्त रहना ही सरकार का एकमात्र धर्म रह गया है ।
हिन्दू वैदिक शास्त्र में स्पष्ट किए गए व्याख्या के अनुसार नेपाल देश का नामकरण, सत्ययुग में सत्यावती, त्रेतायुग में तपोवन, द्वापरयुग में मुक्तिसोपान और वर्तमान कलियुग में नेपाल नाम से ख्याति प्राप्त रहेगा ।
जो आज अपने ही लोगो के कारण अस्तित्वहीन होने को मजबूर है । पाश्चात्य विचारधारा से प्रभावित नेपाली विद्वानों को इतना तो समझना ही चाहिए कि विश्व का विधान ‘वेद’ पुराण, उपनिषद्, गायत्री का रहस्योद्घाटन, योग, तन्त्र, ज्योतिष और आयुर्वेद जैसे परम शास्त्रों का उद्भव इसी हिमवत्खण्ड ‘नेपाल’ के ऋषि मुनि तथा तपस्वी महापुरुषों के साधना का उपहार है । जो स्वयं में विश्व है, और विश्व के ज्ञान का ही नहीं वैदिक सभ्यता का केन्द्र भी है ।
सिर्फ हिन्दू धर्म ही है जो चराचर विश्व को अपना मानता है । सबका कल्याण और अपनत्व को आदर्श मानता है, जबकि इस्लाम में अन्य धर्मी को कापिÞmर और ईसाइ में शैतान माना जाता है । अतः इनके साथ वही सुरक्षित रह सकते हैं जो खुद भी उनके धर्म को स्वीकार करले अन्यथा जो कापिÞmर और शैतान के साथ किया जाता है वही सलूक आपके साथ भी होगा । यह एक विचारणीय पहलू है जिसे मैं आपके ऊपर छोड़ रहा हूँ । विद्वान् लेखक कनकमणि दीक्षित का मानना है कि नेपाल में २० प्रतिशत अन्य धर्म के लोग हैं, अतः नेपाल को हिन्दू देश कैसे बनाया जा सकता है !
मेरे आदरणीय ! वास्तव में हिन्दूत्व ही नेपाल की राष्ट्रीय पहचान है । नेपाल करोड़ो हिन्दूओं के आस्था का केन्द्र है और पवित्र स्थल है । जैसे इब्राहिमी (इसाईंइश्लाम) मतावलम्बियों के लिए जेरुसेलम (इजरायल) पवित्र भूमि है, वैसे ही समस्त सनातनी हिन्दूओं के लिए नेपाल आस्था का केन्द्र है । इसकी अस्मिता और वैदिक पहिचान अक्षु००ा रखना हमारा परम कर्तव्य है । विगत ८०० वर्ष के इतिहास को देखा जाय तो मुस्लिमों के निरंतर आक्रामण में करोड़ो हिन्दूओं की हत्या की गई, संस्कृति को नष्ट किया गया और जबदस्ती मुस्लिम बनाया गया है । इसीप्रकार इसाईयो ने विश्व में इसाई साम्राज्य फैलाने के अभियान में करोड़ो अन्य संस्कृति के लोगो की हत्या की है । उनके धर्म और संस्कृति को नष्ट कर दिया । आज भारत इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । इधर नेपाल में भी वही षडयंत्र सफलता पूर्वक पाँव पसारता दिख रहा है । नेपाल के सन्दर्भ में धर्मनिरपेक्षता के पीछे भोलेभाले हिन्दूओं को हिंदुत्व के प्रति घृणा और वैमनष्य पैदा कर इब्राहमिक पन्थ को स्थापना करने का दूरगामी षडयंत्र है । नेपाल जबतक हिन्दू राज्य था तबतक बौद्ध, किरात और इस्लाम सभी सम्मानित ढंग से अपने अपने धर्म और संस्कृति में खुश थे, परन्तु आज का परिदृश्य ऐसा है कि बुद्धिष्ट और किँराती लोग इसाई बनाए जा रहे हैं । यह उनकी मौलिकता के साथ–साथ नेपाल की राष्ट्रीयता और क्षेत्रीय अखण्डता के ऊपर भीषण संकट का संकेत भी है ।
समझने योग्य तथ्य यह है कि ८,५२२ वर्ग माइल में फैले कुल ८२ लाख जनसंख्या बाला इजरायल यहूदियों का देश है । बुद्धिष्टों के लिए लगभग ९ देश है । मुस्लिमों के लिए ५५ से ज्यादा देश है । इसाईयों के लिए ८० से ज्यादा देश है । लेकिन विश्व के लगभग १५ प्रतिशत जनसंख्या वाले हिन्दुओं के लिए एक भी देश नहीं है । धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होता है । हमारी भौतिक और बौद्धिक दिवालिया हमें हमारी आत्मा तक को गिरवी रखने पर मजबूर कर दिया है । क्या हमें अपने धर्म और संस्कृति के संरक्षण करने के लिए भी दूसरों के निर्देशन की आवश्यकता है ! क्या अमेरिका और यूरोप के बताने पर ही हम धार्मिक या अधार्मिक होंगे ? क्या हमारे पूर्वज हमें इतना निरीह छोड़ गए थे ? क्या हम कायर भगोड़े के वंशज हैं ? अगर नहीं, तो इसपर विचार कौन करेगा ? इतिहास प्रमाणित है कि, नेपाल के राजा को दुनियां के हर देश में सर्वोच्च राजनैतिक स्थान और सम्मान दिया जाता था । क्या आज वह स्थान हमें प्राप्त है ? या हमने गंवा डाला ! जिस देश के प्रमुख व्यक्तियों पर ही भ्रष्टाचार का वैश्विक आरोप लगे उस देश को दुनिया किस नजर से देखेगी यह सोचनीय प्रश्न है । इतना ही नहीं किसी भी देश के सरकार उस देश के सम्पूर्ण नागरिकों के भावना और संस्कारों का प्रतिनिधित्व करती है । आज हम नेपालियों का संस्कार विश्व मंच पर कितना पतीत हो गया है यह एक संस्कारवान देशभक्त व्यक्ति ही समझ सकता है ।
राष्ट्रीय गरिमा के साथ खिलबाड़ करनेवालों का समर्थन करना अपने पूर्वजों की अस्मिता और देश के साथ बेईमानी मानी जाएगी । जो भविष्य में आत्मघाती कदम प्रमाणित होगा । प्रज्ञावान उसे कहते हैं जो भविष्य में होनेवाली दुर्घटना के संभावना को भाँपकर वर्तमान में सुधार के लिए तैयार रहते हैं । तिब्बतियों के नासमझी और अफगानियों के मूढ़तापूर्ण सोच के कारण ही एक अस्तित्वहीन है और दूसरा आतंकाधीन है ।
वर्तमान में दिखाई दे रहे राजनैतिक÷ संवैधानिक उहापोह, जो कि एक नई राजनैतिक घटना की ओर संकेत करता है, तथा समाचार माध्यमों के लिए एक नई ऊर्जा का विषय बना हुआ है, वह है गणतंत्र के खÞारेजी की मांग और संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना । वास्तव में यह राजावादियों की मांग नही है । इसे तथाकथित लुटेरे गणतंत्रवादियों ने अपनी अदूरदर्शिता और भ्रष्टाचारी संस्कार के कारण राजावादियों को सक्रिय होने के लिए अभिप्रेरित किया है । उधर राजावादियों ने इनके दुष्कर्म और राष्ट्रघाती कÞदमों को लेकर आम आदमी तक पहुंचाने का भरपूर प्रयास किया है । सोशल मीडिया के कारण हर एक घटना से लोग परिचित होने लगे हैं ।
हरेक घटना के कारण और राष्ट्रीय÷अंतरराष्ट्रीय दवाव तथा प्रभाव को सहजता से समझने का प्रयास कर रहे हैं । समझदारी अनुसार प्रतिक्रिया स्वाभाविक होने के कारण आम जनमानस में राजा के प्रति एक कोमल भाव का जन्म होना राजा विरोधियों के लिए एक चुनौती सी बनती जा रही है । नेताओं के द्वारा पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के प्रति व्यक्त किए जा रहे आक्रोश भरे वाक्यों का वृहद विश्लेषण किया जा रहा है और उन्हें इस बात का थोड़ा भी ख्याल नही है कि उनके इसी वाक्यों से पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह के प्रति आम लोगों का रुझान बढ़ने लगा है, जो हमारे इस तरह के कठोर प्रतिक्रिया के कारण और तीब्र हो सकती है ।
सञ्चारमाध्यम में सत्तावादी, गणतंत्र वादी और राजावादी के बीच बहस तीब्र होती जा रही है । देश में हो रहे नई घटनाओं से जनता और सरकार को अवगत कराना संचार माध्यमों को प्रमुख दायित्व है । हिन्दूवाद या कहें हिंदुत्व के छाया में राजतंत्र को पुनर्जीवित करने का काम भी तेजी से होता दिख रहा है । सभी संचार माध्यम में इस तरह के समाचारों को स्थान अथवा समय मिलना आम नागरिक के हृदय में इसके आधारभूत अस्तित्व के होने को प्रमाणित करता है । देशभर में हिन्दुत्व के समर्थन में हो रहे नारा, जुलूस अब जनता के लिए आकर्षण के केन्द्र और समाचार माध्यमों के लिए प्रमुख विषय बनता जा रहा है । इसे हम सहजता से लेने की भूल न करें तो ही शुभ होगा । मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखने पर ही इसके भावी स्वरूप को समझा जा सकता है । आज नेपाल का एक भी शहर नही है जहां हिन्दू राज्य के लिए विशेष प्रदर्शन न हुआ हो । ध्यातव्य हो ! जब ८८ प्रतिशत जनता के भावनाओं को कुचलते हुए जनआंदोलन के आँधी के साये तले धर्म निरपेक्षता रूपी षड़यंत्र को पारित किया जा सकता है, तो वर्तमान के हिन्दुत्व वादियों के आंदोलन से बहुत कुछ खारिज और स्थापित भी किया जा सकता है । परिवर्तन के संकेत परिणाम का भी संकेत करता है ।
वर्तमान नेपाल सरकार को अपनी पार्टी और नेताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करने और भ्रष्टाचार को व्यवस्थित करने में ही चार साल बीत गए । आम नागरिक इनके कुकृत्यों से आजित हो गए हैं । इधर रा प्र पा के तीनों नेता कमल थापा, प्रकाश चंद्र लोहनी और पशुपति शमशेर जी गणतंत्रवादियों के कमर तोड़ने और २०४६ साल के संविधान को पुनःस्थापित कराने के लिए ऐक्यवद्धता जता चुके हैं । इन तीनों दलों की एकता इसी ओर इशारा करती है । जबकि इस आंदोलन में या कहें जुलूस में इनका कहीं कोई स्थान नही दिखाई दे रहा है । ऐसा लगता है कि आम लोग इन्हें भी दरकिनार कर विशुद्ध ईमानदार और भद्रभलादमी को ही देश का बागडोर सौपना चाहतें हो,और उनके भावनाओं को ये लोग भीतर से समझ रहे हो । आखिर जो हो ! विश्व मानवता को आज मोदी रूपी महान नेतृत्व की खोज जरूर है । हमें नही लगता की इन त्रिदेवों के प्रति आम लोग समर्पण का भाव दिखाएंगे । वैसे इन राजावादियों के नजर में कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनो असफल हो गए हैं, अब हम ही देश को सम्हाल सकते हैं, ऐसी मानसिकता है । राजतन्त्र और हिन्दुराष्ट्र को हर हाल में पुनस्र्थापित करना तथा संघीयता खारिज कर आम नागरिक को अनावश्यक कर के दबाव से मुक्ति दिलाने के वादों के कारण इन्हें जनबल प्राप्त होने का भरोसा है, जो बहुत दूरतक सत्य दिखाई देता है । इनकी सड़क सफलता, आम नागरिक के बीच सम्मानजनक उपस्थित और वहुआयामिक रूप में वैचारिक समर्थन उनके हौसले को बुलंद करते दिख रहा है । परन्तु २०४६ साल से अबतक के सभी नेता तथा कर्मचारियों की संपत्तियों की छानवीन कर भ्रष्टाचार विरुद्ध विहंगम अभियान के तहत इन त्रिदेवों की हालत भी कांग्रेसी, कम्युनिस्ट और माओवादी लगायत मधेसवादियो की हालत भी गंभीर ही नजर आती है ।
वैसे आम नागरिक को किसी वाद से कोई खास दिलचस्पी नही होता, बल्कि उसे सामाजिक सुरक्षा और जीवनशैली में सहजता की विशेष चाहना होती है । आज नागरिक अपने को असुरक्षित अनुभव करते हैं । बेटियाँ पूरी तरह असुरक्षित हो गई हैं । किसानों का हाल बेहाल है । व्यापारी मार में है । खिलाड़ी मायूस हैं । छोटे ओहदों वाले कर्मचारी अपने अंधकारमय भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं । वैदेशिक रोजगारियों का जीवन जोखिÞम में पड़ा हुआ है । शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र लुटेरों का अड्डा बन गया है । आखिर लोग करे तो क्या करे ! भूखे पेट चिल्लाने की आजादी के सिवा इस गणतंत्र ने लोगों को दिया ही क्या है ! यह उन आम नागरिकों का उद्गार है, जो नेपाल के नेताओं और राजनीतिक कार्यकताओं से कहीं अधिक विद्वान और ईमानदार देशभक्त हैं । जिन्हें वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अपना ही नही समग्र नेपाल और नेपालियों का भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा है । और इस गहन अंधकार में टिमटिमाते दीये की तरह वर्तमान आंदोलन में सुरक्षित भविष्य के दीप दिखाई दे रहा है । आखिर डूबते के लिए तिनका भी तो महत्व ही रखता है ।
आज से एक वर्ष पहले देश के विभिन्न स्थान में राजतन्त्र पुनसर््थापना के माँग को लेकर शुरु किया गया श्रृंखलाबद्ध प्रदर्शन अब राष्ट्रव्यापी रूप लेने लगा है । इसका नेतृत्व किसी खास पार्टी के हाथों में न होकर नए विचारों और आदर्शों को लेकर नए लोगों के द्वारा किया जा रहा है । इसे आम नागरिक के द्वारा स्वतःस्फूर्त किया जा रहा आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है । ‘राष्ट्रीय नागरिक आन्दोलन’ के संयोजक बालकृष्ण के अनुसार ‘यह नागरिकों के द्वारा स्वतःस्फूर्त ढंग से किया जा रहा आन्दोलन है । वैसे इस आंदोलन में खुलकर आम नागरिकों की सहभागी तो नही है, परन्तु आंदोलनकारियों का विरोध न कर अप्रत्यक्ष समर्थन माना जा सकता है । ‘राजसंस्था और हिन्दू राष्ट्र’ पुनस्र्थापना के मांग सहित के इस आंदोलन में देश बचाने के लिए राजा को आगे आने के लिए आह्वान किया जा रहा है ।
आश्विन २४ गते के दिन काठमांडू में हुए कार्य ‘वीर गोर्खाली अभियान’ के अभियंता सौरभ भंडारी के अनुसार सरकार के विरोध के बावजूद भी है विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे । कार्तिक १७ गते को बुटवल में मोटरसाइकिल रैली निकाला गया । राष्ट्रवादी नागरिक समाज, नेपाल विद्वत् परिषद्, स्वतन्त्र देशभक्त नेपाली नागरिक, पश्चिमाञ्चलवासी नेपाली जनता, नेपाल राष्ट्रवादी समूह, ‘राष्ट्रीय नागरिक आन्दोलन’ विश्व हिन्दू महासंघ, राष्ट्रीय शक्ति नेपाल, २०४७ के संविधान पुनस्र्थापना, अभियान आदि की अगुवाई में प्रदर्शन किए जा रहे हैं ।
नेपाल में राजसंस्था के आवश्यकता की वकालत करते आ रहे पत्रकार तथा लेखक युवराज गौतम का कहना है कि ‘इस आन्दोलन में नेता में नेता नहीं नीति है, जो सर्वजन हिताय है । विश्व हिंदू महासङ्घ अन्तर्राष्ट्रीय समिति के महासचिव अस्मिता भण्डारी ने कहा कि, ‘हिन्दू अधिराज्य और हिन्दू अधिराज के लिए हो रहे आन्दोलन में हमारा समर्थन और सहकार्य दोनो है ।’
राष्ट्रवाद को शिरोधार्य कर युवाओं के द्वारा संचालित इस आंदोलन में देशभर युवाओं के उल्लेखनीय उपस्थिति देखी जा रही है । विदेशियों के क्रीड़ास्थली नेपाल को बचाने के लिए अब किसी नेता की प्रतीक्षा की बजाय युवा स्वयं सक्रिय भूमिका निर्वाह कर रहे हैं ।
पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने कहा कि वर्तमान के परिस्थितियों से त्रस्त नेपाली जनता उन्मुक्ति चाहती है, क्योंकि वो अपने को अभिभावक विहीन अवस्था में देख रही है । जिससे हमें पीड़ा बोध हो रहा है । परंतु उनके स्वकीय सचिव सागर तिमिल्सिना ने स्पष्ट करते हुए कहा कि देशभर हो रहे इस आन्दोलन में पूर्वराजा की कोई संलग्नता नहीं है ।
‘राजा ने जिस शालीनता के साथ शासन छोड़ा, ‘जनता के संपत्ति को जनता के हाथों में सौप कर खुद नागार्जुन के जङ्गल में रहे । हमेशा नेपाली राष्ट्रीयता के पक्ष में आवाज उठाया । एक उच्च राजनैतिक मर्यादा स्थापना की । इन सारी बातों से राजा के प्रति नागरिक का रुझान बढ़ना स्वाभविक है । विभिन्न उतार चढ़ाव के बीच बेल्जियम, स्पेन और क्याम्बोडिया में राजसंस्था को पुनस्र्थापित किया जाना नेपाल के लिए भी एक प्रेरक उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है ।

