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नया अध्यादेश- सवालों के घेरे में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी २०२० डिसेम्वर अंक |  गम्भीरता से परे वर्तमान सरकार के हर कदम पर सवाल उठने लगे हैं । इतना ही नहीं उनका विरोध करने वाले उनके सहयात्री भी अवसाद और अनिश्चितता में नजर आ रहे हैं । न तो उन्हें अपने फैसले पर यकीन है, न ही अपनी स्थिति पर । क्या चाहते हैं और क्या होना चाहिए, शायद उन्हें यह पता ही नहीं है, हाँ नेपाल की जनता को पिछले कई महीनों से तमाशा जरूर दिखाया जा रहा है, और पूरे मनोयोग से जनता तमाशा देख भी रही है । इसी तमाशे का असर आज कल सड़कों पर दिखने लगा है, ‘राजा लाओ, देश बचाओ के नारे के रूप में’ । यह दीगर है कि आगे चल कर इस नारे का असर क्या होने वाला है, किन्तु वस्तुस्थिति यह जरूर बता रही है कि जनता का विश्वास अपने प्रतिनिधियों से उठता जा रहा है । विकास और शांति के सपने दिखाने वालों की असलियत भ्रष्टाचार, तानाशाही और घोटालों के शोर में कहीं दफन हो चुके हैं ।

वर्तमान परिदृश्य की बात करूँ तो एक कहावत है ‘जब सैंया भए कोतवाल फिर डर काहे का’ अर्थात जब शक्ति और पद आपके पास है तो फिर दुनिया की परवाह क्यों करनी । फिलहाल नेपाल की राजनीति इसका सुन्दर उदाहरण बनती नजर आ रही है । किसी भी राष्ट्र में कोई भी अध्यादेश को राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर लाया जाता है, जिसमेें राष्ट्रीय दलों की आम सहमति होती है इस प्रक्रिया में राष्ट्रपति कार्यालय की भूमिका औपचारिकता मात्र होती है । किन्तु यहाँ कभी तो ऐसा होता है कि बलात्कार जैसे संवेदनशील और गम्भीर मसले पर बना अध्यादेश राष्ट्रपति कार्यालय में महीनों अटका रहता है मुहर लगने के लिए किन्तु, चौबीस घंटे में वापस हो जाने वाले अध्यादेश पर राष्ट्रपति की मुहर लगने में घंटे भी नहीं लगते । इसे किस तरह से लिया जाए ? क्या राष्ट्रपति का पद किसी एक दल से प्रभावित है जहाँ उन्हें किसी भी विषय पर सोचने, समझने या तर्क करने की आवश्यकता नहीं है, बस मुहर लगाने की आवश्यकता है ? और अगर सच्चाई यही है तो निःसन्देह देश की राजनीति और देश का अस्तित्व दोनों ही खतरे में माना जाएगा ।

बात अधिक पुरानी नहीं है जब वर्तमान सरकार की अध्यादेश प्रकरण में अच्छी खासी किरकिरी उड़ी थी । पिछले अप्रैल में, सरकार दो विवादास्पद अध्यादेश लेकर आई थी । सरकार द्वारा राजनीतिक दलों (दूसरा संशोधन अध्यादेश २०७७) और संवैधानिक परिषद (कार्य, कर्तव्य, अधिकार और प्रक्रिया) पर पहला संशोधन अध्यादेश २०७७ की सिफारिश के तुरंत बाद राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने इसे मंजूरी दे दी थी । इन दोनों अध्यादेशों में से एक का उद्देश्य राजनीतिक दलों के विभाजन के लिए अनुकूल माहौल बनाना था और दूसरे का उद्देश्य संवैधानिक परिषद की बैठक में मुख्य विपक्षी दल के नेता की भूमिका को कमजोर करना था । दोनों अध्यादेशों का सत्ता पक्ष और अन्य दलों ने कड़ा विरोध किया था । सरकार पर यह आरोप लगा कि उसने अपनी पार्टी के भीतर भी अध्यादेश पर कोई चर्चा नहीं की थी । व्यापक विरोधों का सामना करने में असमर्थ, सरकार ने कुछ ही दिनों में दोनों अध्यादेशों को वापस ले लिया था ।

और एक बार फिर अनेक प्रकरणों से घिरी सरकार द्रुतगति में नया अध्यादेश लेकर आई जिसका विरोध हर तरफ से हुआ और फिर प्रधानमंत्री तथा प्रचण्ड नेपाल गुट ने आपसी समझदारी और सहमति जिसमें ‘एक हाथ लो और एक हाथ दो’ की नीति अपनाते हुए अध्यादेश वापस लेने के लिए प्रधानमंत्री को मना लिया । यानि आवेदन प्रक्रिया और अध्यादेश दोनों ही वापस लिए जाने की बात तय हुई । वैसे भी देखा जाए तो स्वयं प्रधानमंत्री भी समझते होंगे कि, अध्यादेश को संवैधानिक रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता और विरोध और आलोचना बढ़ने का खतरा तो है ही, साथ ही इस अध्यादेश के सहारे वो कोई नियुक्ति करते भी हैं तो उसे अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा । बावजूद इसके जो कदम प्रधानमंत्री के द्वारा उठाया गया वह निश्चय ही धमकी देने वाली स्थिति दर्शाती है । हालाँकि इस आलेख के लिखे जाने तक कोई स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आया फिर भी यह वाकया कई सवालों को जन्म जरूर देता है ।

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प्रधानमन्त्री अध्यक्ष रहने वाले परिषद में सभामुख, राष्ट्रीयसभा के अध्यक्ष, प्रधानन्यायाधीश, विपक्षी दल के नेता और उपसभामुख सदस्य रहने की व्यवस्था है । अगर नया अध्यादेश जारी होता तो संवैधानिक परिषद के बहुमत सदस्य उपस्थित होने पर बैठक की जा सकती है । हालांकि, पिछली व्यवस्था के अनुसार, गणपूरक संख्या को केवल तभी माना जा सकता था जब अध्यक्ष और कम से कम चार सदस्य उपस्थित होते थे । बालुवाटार में बुलाए गए बैठक में सभामुख का उपस्थित ना होना और इसके परिणामस्वरूप आननफानन में नया अध्यादेश (जिसकी जानकारी सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं को भी नहीं है) लाया जाना स्वेच्छाचारी व्यवहार को ही दर्शाता है । माना जा रहा है कि मनोनुकूल नियुक्ति करने के लिए यह कदम उठाया गया । जबकि सभी जानते हैं कि, संवैधानिक परिषद कार्यपालिका का हिस्सा नहीं है । ऐसे में सरकार की राजनीतिक नियुक्तियाँ करने के लिए संवैधानिक परिषद कोई स्थान नहीं है । इसकी रचना यह स्पष्ट करती है कि संवैधानिक परिषद कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच एक सेतु है । इसके अलावा, चूंकि विपक्षी दलों के नेताओं की भागीदारी अनिवार्य है, जो बताता है कि संवैधानिक परिषद एक संवैधानिक निकाय है जो सर्वसम्मति से निर्णय लेती है । इसीलिए संवैधानिक परिषद में प्रधानमंत्री, अध्यक्ष, मुख्य न्यायाधीश, अध्यक्ष और राष्ट्रीय सभा के उपाध्यक्ष होते हैं । यह उपस्थिति संवैधानिक परिषद की गरिमा और वजन को दर्शाती है ।

संवैधानिक परिषद की जिम्मेदारी भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । परिषद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से लेकर लोक सेवा आयोग, प्राधिकरण, चुनाव आयोग, महालेखा परीक्षक, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और वित्त आयोग के अधिकारियों का चयन करती है । उसी संवैधानिक परिषद ने संविधान के तहत परिकल्पित महिला आयोग, दलित आयोग, समावेशी आयोग, आदिवासी जनजति आयोग, मधेसी आयोग, थारू आयोग और मुस्लिम आयोग के प्रमुखों और सदस्यों की नियुक्ति की सिफारिश की है । इन संवैधानिक अंगों को राष्ट्रपति द्वारा परिषद की सिफारिशों के आधार पर संसदीय सुनवाई के माध्यम से नियुक्त किया जाता है ।

यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री केपी ओली ने राजनीतिक गुटों के लक्ष्य के रूप में, राज्य के ऐसे प्रतिष्ठित निकायों के पदाधिकारियों का चयन करने के लिए जिम्मेदार संवैधानिक परिषद को निशाना बनाया है । ओली सरकार के ऐसे कार्यों को देखकर पूरा देश शर्मसार है । प्रधानमंत्री केपी ओली को नेपाली राजनीति में एक चतुर खिलाड़ी माना जाता है । लेकिन दो बार सत्ता में आने के बाद जिस तरह उन्होंने राजनीति में ईमानदारी, कार्यप्रणाली और प्रचलित मूल्यों की बार–बार अवहेलना की है उसमें उनकी चतुराई से अधिक अदूरदर्शिता नजर आती है ।

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अपने कार्य क्षमता से अधिक वाक्पटुता के द्वारा अपनी राजनीतिक ऊंचाई बढ़ाने के लिए दूसरों को अपमानित करके खुद को उच्च दिखाने की कला प्रधानमंत्री जी को बखूबी आता है । नतीजतन, शक्तिशाली सरकार का नेतृत्व करने के बावजूद, वह लोगों के लिए यादगार काम करने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाए हैं, न ही पार्टी के भविष्य को सुनिश्चित करने में कोई भूमिका निभा पाए हैं । हां, अपने वर्तमान कार्यकाल में कई अनियमितताओं और घोटालों और भ्रष्टाचारियों के संरक्षक के रूप में जनता के समक्ष उनकी छवि अवश्य बनी है ।

कोरोना काल मे सरकार द्वारा लिए गए कई निर्णय सवालों के घेरे में आज भी है । जब सारा विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा था उस समय भी वर्तमान सरकार पर भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का आरोप लगा । कोरोना महामारी के बीच सरकार ने संक्रमण रोकथाम तथा नियन्त्रण में प्रयोग होने वाली स्वास्थ्य सामग्री खरीदने की जिम्मेदारी ओमनी बिजनेस कर्पोरेसन इन्टरनेसनल को दिया था । सरकार समय से जिस चीज को सस्ते में खरीद सकती थी उसे बाद में ओमनी से मँहगे दामों में खरीदा गया । ओमनी, जिनके पास स्वास्थ्य उत्पादों के आयात का कोई अनुभव नहीं था, उसे सरकार द्वारा महंगे सामान लाने के लिए जल्दबाजी में मंजूरी दे दी गई । सरकार ने सार्वजनिक खरीद अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए, ओमनी के साथ स्वास्थ्य उत्पादों की खरीद के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किया, जो विशेष परिस्थितियों में प्रत्यक्ष खरीद की अनुमति देता है । उसी तहर मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) समझौते को लेकर भी सरकार विवादों में है । बालुवाटार भूमि प्रकरण ने तो सारी हदें ही पार कर दी । ऐसे गम्भीर आरोपियों को मुक्त कर दिया गया जिन्हें सत्ता का वरदहस्त प्राप्त था । विशेषज्ञों का कहना है कि इस भेदभाव में सरकार की भूमिका है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है ।

बात वाइडबॉडी घोटाले की करूँ तो यहाँ भी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है । संसद की लोक लेखा समिति ने दावा किया है कि नेपाल एयरलाइंस कॉरपोरेशन के लिए दो वाइडबॉडी विमानों की खरीद पर ४.३५ अरब रुपये खर्च किए गए थे । यही नहीं, सांसद राजेंद्र कुमार केसी की अध्यक्षता में गठित उप–समिति ने पाया था कि वाइडबॉडी विमानों की खरीद पर अरबों रुपये खर्च किए गए थे और संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री सहित लगभग तीन दर्जन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई थी । जबकि सरकार शुरू से दावा करती रही है कि वाइडबॉडी मामले में कोई अनियमितता नहीं थी । सरकार द्वारा सार्वजनिक रूप से एक जांच प्रक्रिया शुरू की गई किन्तु सरकार मामले की जांच करने और इसे निष्कर्ष पर लाने की पहल आज तक नहीं कर पाई है ।

राजनीतिक हलकों में उस वक्त सरगर्मी फैल गई थी जब पूर्व प्रधान मंत्री डॉ बाबूराम भट्टराई ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि बूढ़ी गंडकी परियोजना में ९ अरब रुपये का गबन किया गया है । उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके पास अनियमितताओं के सबूत हैं । किन्तु डॉ भट्टराइ के आरोपों का न तो सरकार ने जवाब दिया है, न ही हितधारकों ने इस मामले की जांच की है । बूढ़ीगंडकी जलविद्युत परियोजना में प्रत्येक सरकार द्वारा अलग–अलग निर्णय लिए गए हैं । यह स्वाभाविक है कि एक सरकार द्वारा किए गए नीतिगत फैसले दूसरी सरकार द्वारा उलट दिए जाएंगे, और एक सरकार द्वारा निर्धारित निर्माण प्रक्रिया को दूसरी सरकार द्वारा खारिज कर दिया जाएगा ।

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ये सभी घोटाले आखिरकार सरकार की छवि को धूमिल ही कर रहे हैं । सरकार आलोचित हो रही है सरकार के साथ जो हैं वो भी सार्वजनिक रूप से सरकार की आलोचना कर रहे हैं । सरकार के साथ–साथ ये घोटाले लोगों के बीच सत्तारूढ़ पार्टी की छवि को भी धूमिल कर रहे हैं । प्रधानमंत्री ओली की कार्यशैली से पार्टी के भीतर के लोग ही असंतुष्ट हैं । उनका कहना है कि सरकार नियमों और विनियमों का पालन नहीं करती है और पार्टी के साथ किसी भी चर्चा के बिना महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय लेती है । ऐसा नहीं है कि उनके सहकर्मी उन्हें चेतावनी नहीं दे रहे किन्तु, प्रधानमंत्री को इनकी परवाह ही नहीं है वो किसी का भी हस्तक्षेप बर्दास्त नहीं कर पा रहे और न ही उन्हें अपनी अवहेलना सहन हो रही है । बैठक में सभामुख का शामिल नहीं होना और उसके तुरन्त बाद जिस तरह से प्रधानमंत्री द्वारा अध्यादेश लाया गया, वह शैली यही बताती है कि वो ‘दिखा देने वाली’ सोच के साथ अपने काम को अंजाम दे रहे हैं । उन्हें किसी की परवाह ही नहीं है चाहे वो पक्ष हो या विपक्ष, या फिर वो जनता, जिसने उन्हें यह शक्ति प्रदान की है । जनता एक बार फिर कुलमान घिसिंग को चाहती थी पर उन्होंने उन्हें दरकिनार किया, जबकि जनता इस मसले पर सड़कों और सोशल मीडिया पर लगातार अपना रोष दिखा रही थी । किन्तु नतीजा शून्य रहा । लेकिन इस बीच वो कुछ मसलों पर लोगों को खुश कर लोकप्रियता हासिल करने की भी कोशिश करते रहे हैं ।

 

मसलन डॉ. केसी की इलाज की जिम्मेदारी लेना या संघ विरोधियों को खुश करने के लिए ‘फेडरल डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ नेपाल’ के बजाय देश का नाम ‘नेपाल’ का उपयोग करने का निर्णय लिया है । इसके अलावा, सरकार ने अतीत में की गई कुछ गलतियों को सुधार कर लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश की है । हाल के उदाहरणों में पुस्तक आयात पर करों की वापसी और कोरोना संक्रमणों का सरकार द्वारा उपचार शामिल हैं । इन से यह जाहिर होता है कि वो कुछ छोटी–छोटी बातों को अहमियत देकर सस्ती लोकप्रियता भी हासिल करना चाहते हैं ।

जो भी हो यह तो तय है कि सरकार की और स्वयं प्रधानमंत्री की छवि निरन्तर धूमिल होती जा रही है । और इसी क्रम में राष्ट्रपति का पद और व्यक्तित्व भी विवादित हो गया है । फिलहाल के लिए अध्यादेश का वापस होना यह बताता है कि मामला नियंत्रित हो चुका है जो एक भ्रम मात्र है क्योंकि, विवाद पूर्व रूप में ही कायम है और जनता इंतजार कर रही है एक नए तमाशे का ।

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