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*नमामि: अटल जी* : विवेकानंद झा

 
*नमामि: अटल जी* 

वह छन मेरा जीवन का अद्भुत पल था,जब खड़ा था मैं उनके चरणों में।

अश्रु बरस रहा था नैनों से, ह्रदय द्रवित हो रहा था क्रंदन से।

वह पल ऐसा था जो जीवन में कभी नहीं आया,जिसके लंबे इंतजार में जीवन लगभग बीत चुका।

 वह छन ऐसा था जिसको बया वह अर्जुन ही कर सकता था, जब खड़ा था वह पितामह के बाणों की शैया पर फूट फूट कर रो रहा।

कैसा था वह विधि का विधान, देश प्रेम पर दोनों थे कुर्बान।

 एक हस्तिनापुर का सरताज था, दूसरा हिंद का खासम खास था।

 नाम था जिसका अटल, पाया था उसने व्यक्तित्व सरल।

ह्रदय में उमड़ रहा था देश प्रेम, चेहरे पर था मुस्कान गजब।

 अल्प आयु के सीमा में, जिस ने संसद में हुंकार भरा।

खदेड़ दो दुष्ट चीनियों को, नेहरू को आगाज दिया। 

दंग था जवाहर इस नव युवक की प्रतिभा से, जो ललकार रहा था उनकी अस्मिता को, धिक्कार रहा था उनकी दूरदर्शिता को।

 ठगा गया जवाहर हिंदी-चीनी-भाई-भाई का नारा से, झुका दिया सर हिंद का दुष्ट चीनियों के आगे।

बिगुल बजा जब इंदिरा ने ,आपातकाल का जयघोष किया ।

लोकनायक जयप्रकाश ने, जमकर उसका प्रतिकार किया ।

चल पड़े अटल आडवाणी भी इंदिरा के विरोध में,मिलकर जयप्रकाश के संग देश के उद्धार में।

 बनकर विदेश मंत्री भारत का, संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंद का जयघोष किया ।

अपनी अद्भुत हिंदी में भाषण से, पूरा विश्व को मोह लिया ।

 जब बने प्रधानमंत्री 13 दिन के,  देश को ऐतिहासिक पाठ पढ़ाया था, अपनी अविस्मरणीय भाषण से भारत के लोकतंत्र को जगाया था ।

अपनी नेतृत्व की दूरदर्शिता से, पाकिस्तान से दोस्ताना हाथ बढ़ाया था ।

बदले में मिला था कारगिल, फिर भी पाकिस्तान को ना ठुकराया था ।

 अपनी इतिहास बदल सकते, हम भूगोल नहीं बदल सकते ।

 पाकिस्तान की नापाक हरकतों को, हम इंसानियत में बदल देंगे।

कारगिल के रचयिता मुशरफ को, आगरा शिखर सम्मेलन का न्योता दे डाला, विश्व में शांति और भाईचारे का फिर से उद्घोष किया ।

 जब कंधार के घटना ने, सबका दिल दहला दिया ।

अपनी अद्भुत राजनीति कौशल से, मानवता को बचा लिया।

 कर देता मैं बलिदान अपने परिजनों का देश के बल बेदी पर, पर कर नहीं सकता मैं अपने देशवासियों को बलिदान कर ।

छोड़ दूंगा आतंकियों को,  देश का सम्मान खंडित कर, पर नहीं मिटने दूंगा मानवता को विश्व के मानस पटल पर ।

जब बामियन बुद्ध की मूर्ति को, तालिबान ने विध्वंस किया । याद दिलाया अटल ने विश्व को,  मानवता शर्मसार हुआ ।

पोखरण परीक्षण में, विश्व को बतला दिया।

अहिंसा परमो धर्म की सीमा तब तक है, जब वीर भोग्या वसुंधरा का आगाज नहीं गुंजा ।

जब कश्मीर के अलगाववादी ने,  कश्मीर छोड़ो का आगाज किया ।

 अपनी कश्मीरियत, जम्हूरियत, इंसानियत किनारे से, कश्मीरियों का मन मोह लिया ।

इतिहासिक लाहौर बस यात्रा ने, एक विश्व शांति का संदेश दिया ।

 हम लड़ करके भी एक है,या विश्व को बतला दिया ।

खड़ा था मैं उस युगपुरुष के सामने,  लेटा था आज वह सैया पर, अपनी मृत्यु के अगुवाई में ।

 अटल बिहारी बाजपाई आज इस शैयां पर,  उसी भीष्म पितामह की तरह, सोच रहे होंगे क्या होगा इस देश का, उनके चले जाने पर ।

 चरण छू रहा था मैं उनका,  दिल में अरमान लिए ।

आशीर्वाद दे इस देश को, कभी ना मिटे अस्मिता इसका ।

हाथ जो मैंने प्रणाम किया इस युग का भीष्म पितामह को, आंखों से अश्रुधारा, दिल में क्रंदन, होठों पर सिर्फ एक ही धुन गुनगुना रहा था ।

 "आप है वही हिंद ने जिसे अपना कहा, अपना कहा" । 

– *विवेकानंद झा*

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विवेकानंद झा, रांची

 

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