अवैध शरणार्थियों का स्थल बनता नेपाल, ब्रैक (BRAC) की भूमिका क्या ? : डा.विजय दत्त
डा.विजय दत्त, 8 अगस्त ।पिछले कुछ वर्षों से रोहिंग्या, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, सोमालियाई सहित अन्य अवैध लोग नेपाल के भीतर सुरक्षा संवेदनशीलता का प्राथमिक कारण बन गए हैं, यह नेपाल पुलिस के IG के बयान से स्पष्ट होता है। विभिन्न संचार माध्यमों से यह खुलासा हुआ है कि BRAC नामक संस्था नेपाली दलालों के साथ मिलकर इन अवैध लोगों को नेपाल में प्रवेश करा रही है। इस संबंध में देखा जाए तो (BRAC – Bangladesh Rural Advancement Committee) एक अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन (INGO) है, जिसकी स्थापना वर्ष 1972 में बांग्लादेश में फज़ले हसन आबेद ने की थी। यह मूल रूप से ग्रामीण गरीबी निवारण, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में काम करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक संस्थाओं में से एक है।
*रोहिंग्या शरणार्थी और भारत/नेपाल प्रवेश संबंधी विवाद-*
रोहिंग्याओं को शरणार्थी बनाकर जानबूझकर भारत या नेपाल में प्रवेश कराना ब्रैक (BRAC) की आधिकारिक या संस्थागत नीति नहीं है। हालाँकि, इस विषय पर विभिन्न दावे और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण किए जाते रहे हैं:-
*मानवीय सहायता और शिविर संचालन:*
म्यांमार (बर्मा) के रखाइन राज्य से विस्थापित होकर बांग्लादेश के कॉक्स बाजार पहुंचे लाखों रोहिंग्याओं को भोजन, स्वास्थ्य और आश्रय प्रदान करने वाली प्रमुख संस्थाओं में से ब्रैक एक है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की सहायता रोहिंग्याओं को दीर्घकालिक रूप से उसी क्षेत्र में टिके रहने या अन्य जगहों पर विस्थापित होने के लिए अनुकूल वातावरण बनाती है।
*अनौपचारिक सीमा पार आवागमन:*
बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों से रोहिंग्या दलालों (Traffickers) के नेटवर्क, खुली सीमा और फर्जी दस्तावेजों का उपयोग करके भारत और नेपाल तक पहुंच रहे हैं। इसमें मानवीय संस्थाओं के पहचान पत्र या दस्तावेजों का दुरुपयोग दलालों द्वारा किए जाने की आशंका है, लेकिन यह कहा जाता है कि ब्रैक स्वयं मानव तस्करी का काम नहीं करता है।
*सुरक्षा चिंताएँ*:
भारत और नेपाल की सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, बांग्लादेश के शिविरों में आर्थिक या अन्य जीवन स्तर में सुधार की कोई संभावना नहीं देखने के बाद, दलाल खुली सीमाओं का फायदा उठाते हुए रोहिंग्याओं को भारत और नेपाल,विशेष रूप से काठमांडू के शरणार्थी शिविरों तक, पहुंचाते हैं।
नेपाल में ब्रैक (BRAC) की कोई औपचारिक स्थायी शाखा, सदस्यता ढांचा या आधिकारिक कार्यालय नहीं है।
इस संस्था की संरचना और नेपाल के साथ इसके संबंधों को निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट किया जा सकता है:-
*अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व:*
ब्रैक का मुख्य कार्यालय बांग्लादेश (ढाका) में है और इसका अंतर्राष्ट्रीय निकाय BRAC International एशिया और अफ्रीका के विभिन्न देशों में काम करता है। इसके प्रमुख नेतृत्व में कार्यकारी निदेशक आसिफ सालेह (BRAC) और शामेरान आबेद (BRAC International) हैं।
नेपाल में उपस्थिति: नेपाल में ब्रैक की कोई नियमित सदस्यता, स्थानीय संचालक समिति (Board of Directors) या राष्ट्रीय शाखा नहीं है। *वर्ष 2015 के भूकंप के बाद, ब्रैक ने मानवीय सहायता और पुनर्वास कार्यों के लिए नेपाल में कुछ समय* के लिए तत्कालीन परियोजना स्तर पर काम किया था, लेकिन यहां कोई स्थायी सदस्य या संगठनात्मक नेटवर्क नहीं देखा गया है।
*सदस्यता प्रणाली का न होना:*
ब्रैक कोई साधारण सदस्य-आधारित संघ/संगठन (Membership Organization) नहीं है बल्कि एक पेशेवर अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन (INGO) और विकास बैंक/सामाजिक उद्यम समूह है। इसलिए, आम जनता या व्यक्तियों के इसका “सदस्य” बनने की कोई व्यवस्था नहीं होती है।
नेपाल में शरणार्थियों या तीसरे देश के नागरिकों के अवैध रूप से प्रवेश करने के मुख्य कारण और तरीके इस प्रकार हैं: –
*खुली और अनियंत्रित सीमा:*
नेपाल और भारत के बीच लगभग 1,880 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। म्यांमार या बांग्लादेश से भारत पहुंचे शरणार्थी (जैसे रोहिंग्या) भारत के साथ इसी खुली सीमा का फायदा उठाकर आसानी से नेपाल में प्रवेश कर जाते हैं।
*दलालों और मानव तस्करी का नेटवर्क:*
संगठित दलाल आर्थिक प्रलोभन या आश्रय का आश्वासन देकर शरणार्थियों को गुप्त रास्तों या अनधिकृत चौकियों के माध्यम से नेपाल में प्रवेश कराते हैं।
भारतीय फर्जी दस्तावेजों का दुरुपयोग: कई शरणार्थी भारत में भारतीय ‘आधार कार्ड’ या फर्जी पहचान पत्र बनाकर सीमा पर सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर खुद को भारतीय नागरिक बताकर नेपाल में प्रवेश करते/कराते हैं।
*निगरानी और तकनीक की कमी:*
नेपाल की सीमा चौकियों पर तकनीक आधारित डिजिटल बायोमेट्रिक प्रणाली और आधुनिक निगरानी उपकरणों का अभाव है। इसके साथ ही, दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लोगों की शारीरिक बनावट और पहनावा एक जैसा होने के कारण सीमा सुरक्षा बल (APF) को उन्हें पहचानने में कठिनाई होती है।
नेपाल में प्रवेश करने के बाद, वे मुख्य रूप से काठमांडू (कपन, लसुनटार, राममंदिर) और ललितपुर (सुनकोठी) जैसे क्षेत्रों में शहरी शरणार्थियों के रूप में रहते हैं, ऐसा पुलिस के आंकड़े दर्शाते हैं।
नेपाल में रोहिंग्या शरणार्थियों की अवैध उपस्थिति और वृद्धि ने बहुआयामी चुनौतियां पैदा की हैं। इन *चुनौतियों* को मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:-
१. *राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन*
खुली सीमा का दुरुपयोग: नेपाल-भारत खुली सीमा का उपयोग करके अवैध रूप से घुसपैठ बढ़ने के कारण सीमा सुरक्षा प्रबंधन पर भारी दबाव पड़ा है।
पहचान और प्रमाणीकरण में कठिनाई: अधिकांश शरणार्थियों के पास आधिकारिक दस्तावेज नहीं होते हैं और कुछ द्वारा फर्जी भारतीय या नेपाली दस्तावेज बनाने का प्रयास करने से आपराधिक गतिविधियों की निगरानी करना मुश्किल हो जाता है।
२. *सामाजिक और आर्थिक बोझ*
स्थानीय संसाधनों पर दबाव: काठमांडू घाटी के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे कपन, सुनकोठी) में मलिन बस्तियों या अस्थायी आश्रयों में रहने से पेयजल, स्वच्छता, बिजली और खुली जमीन जैसे स्थानीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ा है।
अनौपचारिक श्रम बाजार: कम मजदूरी पर काम करने के लिए तैयार होने के कारण, स्थानीय कम-कुशल श्रमिकों के रोजगार और मजदूरी दर पर असर पड़ा है।
३. *कानूनी और नीतिगत अस्पष्टता*
शरणार्थी संबंधी नीति का अभाव: नेपाल 1951 के ‘शरणार्थी सम्मेलन’ (Refugee Convention) का पक्षकार नहीं है और नेपाल में शरणार्थियों से संबंधित कोई स्पष्ट राष्ट्रीय कानून नहीं है। इससे उन्हें ‘अवैध घुसपैठिए’ माना जाए या ‘मानवीय आधार पर आश्रय दिया जाए’, इस बात पर नीतिगत भ्रम है।
स्थानीय एकीकरण (Local Integration) का जोखिम: लंबे समय तक निवास करने से उनके स्थानीय समाज में घुलमिल जाने और दीर्घकालिक रूप से नागरिकता या स्थायी निवास की मांग उठने का जोखिम रहता है।
४. *अंतर्राष्ट्रीय और कूटनीतिक दबाव*
नेपाल-भारत संबंध: भारत से प्रवेश करने के कारण, सीमा सुरक्षा और घुसपैठ नियंत्रण के मुद्दों पर भारत के साथ कूटनीतिक समन्वय में संवेदनशीलता पैदा होती है।
UNHCR के साथ समन्वय: यद्यपि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग (UNHCR) मानवीय सहायता और संरक्षण की वकालत करता है, लेकिन नेपाल सरकार ने और अधिक ‘शहरी शरणार्थियों’ (Urban Refugees) को स्वीकार नहीं करने का अपना रुख कायम रखा है।
नेपाल में गैरकानूनी प्रवेश और अवैध शरणार्थी आवागमन को नियंत्रित करने के लिए बहुपक्षीय रणनीति, आधुनिक तकनीक और कड़े प्रशासनिक कदमों की आवश्यकता है। इसे प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के मुख्य उपाय इस प्रकार हैं:-
१. *सीमा सुरक्षा और तकनीक संवर्धन*
डिजिटल बायोमेट्रिक प्रणाली: प्रमुख सीमा नाकों पर भारतीय या अन्य यात्रियों का रिकॉर्ड रखने और पहचान की पुष्टि करने के लिए डिजिटल और बायोमेट्रिक (फिंगरप्रिंट/फेशियल रिकग्निशन) प्रणाली लागू करना।
*सशस्त्र पुलिस बल (APF) की उपस्थिति में वृद्धि:* खुली सीमा क्षेत्रों में बीओपी (BOP – Border Outpost) की संख्या बढ़ाना और गश्त को और अधिक सख्त बनाना।
आधुनिक तकनीक का उपयोग: दुर्गम और गुप्त रास्तों की निगरानी के लिए ड्रोन (Drone) और सीसीटीवी कैमरे जैसी तकनीक का उपयोग करना।
२. *आंतरिक निगरानी और कानूनी सख्ती*
मानव तस्करी (Human Trafficking) दलालों पर कार्रवाई: शरणार्थियों को अवैध रूप से सीमा पार कराने और काठमांडू तक लाने वाले दलालों के नेटवर्क की पहचान करके कड़ी कानूनी सजा देना।
शहरी निगरानी और मकान मालिक का दायित्व: काठमांडू सहित प्रमुख शहरों में किराए पर रहने वाले विदेशी नागरिकों का अनिवार्य पंजीकरण (Registration) रखने की व्यवस्था करना। यदि मकान मालिक या नियोक्ता बिना पहचान पत्र के किसी विदेशी को रखता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई करना।
*फर्जी दस्तावेजों पर नियंत्रण:*
सीमा चौकियों पर उपयोग किए जाने वाले फर्जी ‘आधार कार्ड’ या अन्य नकली दस्तावेजों की गहन जांच और परीक्षण करना।
३. *कूटनीतिक और क्षेत्रीय पहल*
द्विपक्षीय सहयोग (नेपाल-भारत): खुली सीमा के दुरुपयोग को रोकने के लिए सीमा प्रबंधन और खुफिया जानकारी (Intelligence Sharing) के आदान-प्रदान में भारत के साथ कूटनीतिक सहयोग बढ़ाना।
अंतर्राष्ट्रीय निकायों के साथ समन्वय: UNHCR (संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायोग) के साथ समन्वय करके अवैध रूप से रह रहे लोगों के पुनर्वास या स्वदेश वापसी के लिए बातचीत करना।
*निष्कर्ष*
ब्रैक एक मानवीय सहायता संस्था है। रोहिंग्याओं का भारत या नेपाल में प्रवेश करने का मुख्य कारण क्षेत्रीय सीमा सुरक्षा की कमजोरी, दलालों का गिरोह और शरणार्थी शिविरों की दयनीय स्थिति है। किसी संस्था की योजनाबद्ध रणनीति का कानूनी रूप नहीं दिखता है, लेकिन शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए इन अवैध लोगों को तुरंत निर्वासित (Deport) किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है।

vijay.dutta2011@gmail.com

