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आज 29 सितंबर को दो नवरात्र एक साथ पड़ रहे हैं। तंत्र मंत्र विद्या से युक्त है मां ब्रह्मचारिणी

 

आज 29 सितंबर को दो नवरात्र एक साथ पड़ रहे हैं। आज दूसरा व तीसरा नवरात्र एक साथ है। नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के दूसरे रूप ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना की जाती है। क्योंकि तीसरा नवरात्र भी आज ही है, इसलिए मां के तीसरे रूप चंद्रघंटा की भी उपासना आज ही की जानी चाहिए।

ब्रह्मचारिणी : नव दुर्गाओं में दूसरी दुर्गा का नाम ब्रह्मचारिणी है। इसकी पूजा अर्चना द्वितीया तिथि के दौरान की जाती है। इसका स्वरूप श्वेत वस्त्र में लिपटी हुई कन्या के रूप में है, जिसके एक हाथ में अष्टदल की माला और दूसरे हाथ में कमंडल विराजमान है। यह अक्षयमाला और कमंडल धारिणी ब्रह्मचारिणी नामक दुर्गा शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को यह अपनी सर्वज्ञ संपन्न विद्या देकर विजयी बनाती है।

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सर्वमंगलमांगल्ये, शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि, नारायणि नमोऽस्तु ते।।

ब्रह्मचारिणी का रूप बहुत ही सादा और भव्य है। इनके एक हाथ में कमंडल है और दूसरे हाथ में चंदन माला है। अन्य देवियों की तुलना में यह अतिसौम्य, क्रोध रहित और तुरंत वरदान देने वाली देवी हैं। नवरात्र के दूसरे दिन सायंकाल में देवी के मंडपों में ब्रह्मचारिणी दुर्गा का स्वरूप बनाकर उसे सफेद वस्त्र पहनाकर हाथ में कमंडल और चंदन माला देने के उपरांत फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करके आरती करने का विधान है। इस देवी के लिए भी वही जगदंबा की आरती की जाएगी, जो पहली देवी शैलपुत्री के अर्चना और पूजन के दौरान की गई थी।

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चंद्रघंटा : मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचंद्र है। इसी कारण इस देवी का नाम चंद्रघंटा पड़ा। नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं का पूजन किया जाता है। इनका स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है और इनका वाहन सिंह है।

पिण्डजप्रवरारूढ़ा , चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं , चंद्रघंटेति विश्रुता ।।

यह देवी जन्म जन्मांतर के कष्टों से मुक्त कर इहलोक और परलोक में कल्याण प्रदान करती है। देवी स्वरूप चंद्रघंटा बाघ की सवारी करती है। इसके दस हाथों में कमल , धनुष , बाण , कमंडल , तलवार , त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र हैं। इसके कंठ में श्वेत पुष्प की माला और रत्नजडि़त मुकुट शीर्ष पर विराजमान है। अपने दोनों हाथों से यह साधकों को लंबी आयु , आरोग्य और सुख संपदा का वरदान देती हैं। चंद्रघंटा की पूजा अर्चना देवी के मंडपों में बड़े उत्साह और उमंग से की जाती है। इसके स्वरूप के उत्पन्न होने से दानवों का अंत होना आरंभ हो गया था। मंडपों में सजे हुए घंटे और घडि़याल बजाकर चंद्रघंटा की पूजा उस समय की जाती है , जब आकाश में एक लकीरनुमा चंदमा सायंकाल के समय उदित हो रहा हो। इसकी पूजा अर्चना करने से न केवल बल और बुद्धि का विकास होता है , बल्कि युक्ति शक्ति और प्रकृति भी साधक का साथ देती है। उसकी पूजा अर्चना के बाद जगदंबा माता की आरती की जाती है।
– पं . केवल आनंद जोशी

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