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हम सठिया गए हैं ? : वसन्त लोहनी

 

हम सठिया गए हैं ?

तन बीमार है
लेकिन मन बेकाबू
मेरी महत्वाकांक्षा
पतंग की तरह उड़ रही है
आकाश को कब्जा करने के लिए

पतंगबाजी में मुझसे आगे कौन?
दो चार पतंग जो सामने दिखे थे
उसे ऐसा पेंच लगाया मैंने
कि एक दो चक्कर पश्चात
सब के सब कट गए

मुझे याद है उन दिनों
जब मैं भिखारी की तरह भटकता था
दो वक्त की रोटी के लिए
मैं एक झुंड के पीछे था
जो अपने को कहते थे विचारबद्ध
वह भी केवल गरीब के लिए
गरीब तो मैं था ही
शिक्षा भी थी नहीं
कुछ-कुछ समझता था
भूख के मारे
कच्ची रोटी भी खा लिया
गरीबी के साथ
कमजोर पढ़ाई के बाद भी
उम्र के तकाजा में
मन में कुछ-कुछ हो रहा था
रोमांटिसिजम के शेर में
बहुत मजा आया रहा था मुझे

हां मैं गरीब था
क्या गरीब होना अपराध है?
बिल्कुल नहीं
तभी तो देखो
अब सब चीज मेरा है
मे वजीर-ए-आजम हूँ दिल का
धरती मेरा, आकाश मेरा
महत्वाकांक्षा की दुनिया में
मैं सिकंदर से कम नहीं हूं
मैं अकेला राज करना चाहता हूं
इसमें औरों को क्या परेशानी है ?
बाकी सब तो दे रहा हूं
बांट रहा हूं
सबको खुश रहना चाहिए

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लेकिन –
मेरी महत्वाकांक्षा की पतंग
सिर्फ एक धागे में उड़ती है
अगर टेंशन ना हो
तो उड़ नहीं सकता
इसलिए टेंशन लेना ही मेरा काम है
मैं अभ्यस्त हूं इसमें

मैं स्वयं एक प्रवाह हूं
इसीलिए मेरी महत्वाकांक्षा
उड़ती रहती है
जिस तरह प्रवाहों से पतंग उड़ता है
हवा का प्रभाव
उत्तर से हो या दक्षिण से
पूरब से या पश्चिम से
कहीं से भी हो दस दिशा में
जहां से उड़ता है
महत्वाकांक्षा के आसमान पर
मैं वहीं से उड़ान लेता हूं

उड़ते उड़ते गुम हो गई
नील गगन की गहराई में
पता नहीं कहां खो गई
क्या आकाश खा गई ?

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बीच में इतना तूफान उठा
फिर भी डोर मेरे हाथों में है
धागा भी मेरे पास बहुत ज्यादा है
लेकिन –
ना मैं धागा को ढीला कर सकता हूं
न पतंग खींच पा रहा हूं
संतुलन तो कायम है
लेकिन कब तक थाम पाऊँगा ?

यह मेरी अपनी बात, अंदर की
लेकिन मेरे सामने कोई कुछ कह नही सकता
है किसी की इतनी हैसियत ?
है किसके पास इतनी ताकत ?

सब अमूर्त है
मूर्त केवल मैं
सिर्फ मैं

कुछ सुनाई दिया दूर
नदी के किनारे
धूप सेंकने वाला एक व्यक्ति
कुछ फुस-फुसा रहा है
लगता है पागल है
अपने-आपसे कह रहा है
बाबू सठिया गए
पागल की बात को क्या ध्यान देना
लेकिन –
वह मेरे अंदर की बात कह गया
अब मेरा मन मुझसे प्रश्न कर रहा है
क्या सचमुच सठिया गया हूँ ?
शायद वह कह रहा है –
इन दिनों नौटंकी देख कर
बेलगाम बातें सुनकर
जिनमें न कुछ तमीज बची है
ना कुछ सार
सगरमाथा की बढ़ती ऊंचाई की तरह
बढ़ता चला जा रहा मेरा अहम्
सिर्फ मैं, मैं, और मैं की बात
ऐसे दिल दिमाग में
जहां मैं के अलावा कुछ उठता ही नहीं
मैं के अलावा कुछ सूझता नहीं
मैं के अलावा कुछ दिखता नहीं
मुझको क्या हो रहा है
कुछ गढ़वाली पैदा तो नही हुआ?
जो पैदा हो रहा है
कहीं एक भद्दा प्रहसन तो नहीं बना?
ऐसे संगीन वक्त पर
प्रहसन क्या कुछ कर पाएगा?
रत्न पार्क में दंत मंजन बेचने वाला
पहले बहुत करते थे
ब्रश करने के बाद
दांतो से लोहा को टेढ़ा करते थे
वह लोग सब लापता हो गए हैं
कहीं ऐसा ना हो जाए
हम बर्बाद हो जाएंगे
वह पागल वहीं पर है
अभी भी अपने-आप से
फुसफुस कर रहा है
क्या सचमुच सच है
हम अब सठिया गए हैं।

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वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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