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शर्तें और तजुर्बे : वसन्त लोहनी

 

शर्तें और तजुर्बे

अरे दोस्त ! जिंदगी सिर्फ जिंदगी है
क्या सुबह, क्या शाम
क्या दाम, क्या राम-राम
क्या शर्ते क्या तजुर्बे
खुद तो पानी में घूले चीनी की तरह मीठा
एक अनजान स्वादिष्ट लेकर
घूमता फिरता राहगीर
एकल चलने वाला इंसान को
न कोई शर्तें मंजूर है
न कभी तजुर्बे इकट्ठा करना है
नदी के पानी के तरह
एक प्रवाह बनकर चलना है
और चलते रहना है
चलते रहना है
दूर समुंदर दिखाई दिया तो
मुश्किल से क्यों ना हो
पेट के बल खिसकना क्यों ना पड़े
फिर भी चलते रहना है
समागम के लिए
तो कहां बचे है समय
शर्तें मानने की
और तजुर्बे इकट्ठा करने की
जीने की नशा लेकर
सिर्फ जिंदगी जियो दोस्त
प्रियसी के अनुराग में
वह उल्फत में
अपने आपको भूलने वाले भुलक्कड़ की तरह
नशा में मदहोश होने वाले पियक्कड़ की तरह
भोगो, जिंदगी को भोगो
कहां ऐसे फजूल बातों में उलझे हो
जिंदगी के शर्तें समझने की
और तजुर्बे इकट्ठा करने की

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वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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