नेपाल का हिन्दी साहित्य और साहित्यकार : डॉ. श्वेता दीप्ति
मीडिया पर Dr.Shweta Deepti
डॉ. श्वेता दीप्ति, हिमालिनी 2021 जनवरी अंक | विश्व के सर्वोच्च हिमशिखर ८८४८ मीटर ऊँचे सगरमाथा जैसे अलौकिक सम्पदा से परिपूर्ण विलक्षण सौन्दर्य से भरे देश नेपाल में हिन्दी का व्यवहार मुख्यतया तीन रूपों में होता है । प्रथम तो तराई के लगभग अस्सी–पचासी लाख लोगों की यह पहली भाषा है । अर्थात् भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा से लगे आबादी की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण नेपाल के इस तराई क्षेत्र में हिन्दी उसी रूप में प्रथम भाषा है, जिस रूप में बिहार और उत्तर प्रदेश में है ।
द्वितीय, हिन्दी यहाँ पहाड़ों एवं पहाड़ी नगरों में निवास करने वाले उन बहुसंख्यक लोगों की द्वितीय और संपर्क भाषा है, जिनकी मातृभाषा नेपाली है । इस प्रकार देश की आबादी के लगभग नब्बे प्रतिशत लोगों की हिन्दी प्रथम और द्वितीय एवं संपर्क भाषा है । सच तो यह है कि हिन्दी के इस व्यापक प्रयोग ने ही उसे सर्वप्रथम १९५०÷६० के दशक और फिर बाद के दशकों में कुछ राजनीतिक पेचीदगी में जकड़ दिया । विदित है कि नेपाल–तराई–कांग्रेस तथा उसके प्रमुख नेता बेदानंद झा ने तो इसे ही अपनी पार्टी का मूल मुद्दा बनाया था और हिन्दी को संवैधानिक स्तर प्रदान करने का हर संभव प्रयास किया था । नेपाली कांग्रेस के कई प्रमुख नेता मातृका प्रसाद कोइराला, सूर्य प्रसाद उपाध्याय, रामनारायण मिश्र तथा प्रजा परिषद के भद्रकाली मिश्र आदि महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों ने भी हिन्दी को संविधान में द्वितीय राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मांग की थी । नेपाली कांग्रेस सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री बी. पी. कोईराला तो हमेशा हिन्दी से संबद्ध ही नहीं रहे वरन् उसके अच्छे लेखक भी थे । उस समय संविधान में हिन्दी को उपर्युक्त द्वितीय स्थान देने का निर्णय लगभग हो चुका था । हिन्दी को संवैधानिक स्तर तो आज तक यहाँ नहीं मिल सका, लेकिन जनस्तर पर यह उसी रूप में आज भी विकसित हो रही है, भले ही सरकारी आंकड़ों में हिन्दी भाषियों की संख्या चाहे कितनी भी कम करके क्यों ना दिखाई जाए किन्तु यहाँ की नींव में हिन्दी भाषा हमेशा से रही है और आज भी मौजूद है ।
एक दृष्टि अतीत पर
इतिहास में नेपाल की संस्कृति समृद्ध और अनन्य रूप में वर्णित है । इसकी सांस्कृतिक विरासत शताब्दियों से क्रमशः विकसित हुई है । नेपाल की संस्कृति पर भारतीय, तिब्बती और मंगोली संस्कृतियों का प्रभाव है । जहाँ तक नेपाल में हिन्दी या हिन्दी साहित्य का प्रश्न है तो, प्राचीन समय से नेपाल का अध्ययन स्थल हिन्दी प्रदेश रहा है । नेपाल के राजनीतिक विशारद, कलाकार, साहित्य निर्माता तथा न्यायशास्त्री भारत के सीमावर्ती क्षेत्र से शिक्षा प्राप्त करते आए हैं । त्रिभुवन विश्वविद्यालय के अस्तित्व में आने से पहले पटना विश्वविद्यालय द्वारा यहाँ की शिक्षा संचालित होती थी । आज भी विशेष शिक्षा हेतु छात्र भारत जाते हैं । काशीपूरी प्राचीन काल से नेपाली नागरिक का अध्ययन स्थल रही है । बौद्ध काल में नालन्दा, विक्रमशिला विश्वविद्यालयों में नेपाली शिक्षार्थी अध्ययन करते रहे हैं ।
वाणीविलास पाण्डेय, पद्मविलास पन्त, तेजबहादुर राणा, ऋषिकेश उपाध्याय, हरिदयाल सिंह हमाल, पद्मप्रसाद ढुँगाना, देवीदत्त पराजुली इन सबकी शिक्षा दीक्षा काशी में हुई है । नेपाल के शासक ही नहीं शासित भी भारत में जाकर शिक्षा ग्रहण करते आए हैं जो आज भी कायम है ।
अनुसंधान एवं अध्ययन ही नहीं बल्कि अन्य भी कई दृष्टियों से नेपाल हिन्दी का एक ऐसा विशाल क्षेत्र है, जिससे हिन्दी जगत् अब तक लगभग अपरिचित सा रहा है । शुरुआती समय में यहाँ के हिन्दी साहित्य का थोड़ा परिचय सर्वप्रथम महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने दिया, जब उन्होंने विद्यापति की कीर्तिलता एवं कुछ पदों को यहाँ से ढूँढ निकाला था । राहुल सांकृत्यायन ने भी उन व्यक्तियों की थोड़ी–बहुत चर्चा की है, जिन्होंने वहाँ हिन्दी के भंडार में योगदान दिया है । उनमें राजगुरु हेमराज शर्मा उल्लेखनीय हैं । सच कहा जाए तो नाथ संप्रदायी योगियों से लेकर जोसमनी संतों तक, मल्लकालीन राजाओं से लेकर शाहवंशीय नरेश एवं राजकुल के अनेक सम्मानित व्यक्तियों, सदियों से तिब्बत और भारत के साथ समान रूप से व्यापार करने वाली वहाँ की विशिष्ट नेवार जाति से लेकर पर्वतीय प्रदेश में रहने वाले विद्वान् ब्राह्मण वर्ग और वहाँ के शूरवीर श्रेष्ठ क्षत्रीय वर्ग तथा सेना आदि में काम करने वाली अन्य कई जातियों ने हिन्दी की साहित्य धारा और भाषायी प्रवाह को यहाँ सदा गतिशील बनाये रखा । दो करोड़ की आबादी वाले इस देश में लगभग पचहत्तर प्रतिशत लोग हिन्दी का किसी न किसी रूप में प्रयोग करते हैं । बाकी आबादी में उन निरे अशिक्षित हिमालय की ऊपरी या सुदूर उत्तरी सीमा पर रहने वाले तिब्बती या उनके मिश्रित नस्ल के लोगों को ले सकते हैं, जिनका कोई संपर्क निचले भाग या तलहटी के लोगों से नहीं हो पाता । परंतु ऐसे लोग भी सामान्य व्यवहार की हिन्दी समझ जÞरूर लेते हैं ।
विगत में नेपाल के इतिहास में हिन्दी अपनी पूर्ण प्रतिष्ठा के साथ स्थापित थी । शिक्षा के विकास तथा प्रजातान्त्रिक पुनर्जागरण में हिन्दी भाषा साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है । पुरानी पीढ़ी के नेपाली नेताओं तथा विद्वानों के लिए आधुनिक शिक्षा के प्रमुख स्रोत हिन्दी क्षेत्र में वाराणसी, पटना, लाहौर और कलकत्ता के विश्वविद्यालय रहे हैं । भारत के नेपाल मित्र हिन्दी विद्वान तथा कवियों ने नेपाल में नव–जागरण लाने में अद्वितीय योगदान दिया । इनमें महापंडित राहुल सांकृत्यायन तथा फणीश्वरनाथ रेणु का नाम अविस्मरणीय है ।
किसी भी राष्ट्र की उन्नति वहाँ की जनता और शिक्षा पर निर्भर करती है । शैक्षिक विकास के क्रम में नेपाल के इतिहास में हिन्दी भाषा के योगदान को तो चाहकर भी नकारा नहीं जा सकता है । भारत की स्वतन्त्रता के साथ ही उसका प्रभाव नेपाल में भी पड़ा । विक्रम सं. २००७ में विगत १०४ वर्षों से चले आ रहे राणा शासन का अन्त हुआ । इसके बाद ही देश में विकास हेतु कुछ कदम परिचालन हुए, इसी के तहत वि. सं. २००९ में शिक्षा समिति का गठन किया गया । सरदार रुद्रराज की अध्यक्षता में ४६ सदस्यों का एक आयोग गठन किया गया और यह तय हुआ कि पाँच वर्षों के भीतर देश में एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी । राजा त्रिभुवन की यह हार्दिक इच्छा थी कि ऐसा हो पर
विभिन्न कारणवश यह परिकल्पना मूत्र्त रूप नहीं ले पाई । उनके इस स्वप्न को साकार करने हेतु बडा महारानी कान्तिराज लक्ष्मी देवी ने वि. सं. २०१२, चैत्र महीने के १८ गते को त्रिभुवन विश्वविद्यालय योजना आयोग की घोषणा की जिसमें ८ सदस्य शामिल थे । इस आयोग ने त्रिभुवन विश्वविद्यालय सम्बन्धी पहले चरण का कार्य राजा त्रिभुवन के १२वें जन्मोत्सव पर शुरु किया । तत्पश्चात् ५३वें जन्मोत्सव पर स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरु हुई । विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले एस. एल. सी बोर्ड और स्नातक तह की परीक्षा बिहार के पटना बोर्ड से संचालित होती थी । काठमान्डू स्थित त्रि–चन्द कालेज भी पटना विश्वविद्यालय से ही सम्बन्धन प्राप्त था । प्रायः सभी शिक्षक भी भारतीय मूल के ही थे । तराई के सभी विद्यालयों में अध्ययन का माध्यम हिन्दी ही थी ।
सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक, साहित्यिक और शैक्षिक क्षेत्र के साथ ही नेपाल में हिन्दी का सबसे अधिक प्रभाव रहा है मनोरंजन के क्षेत्र में । शास्त्रीय एवं हिन्दी सुगम संगीत का नेपाल में प्रसार बहुत पहले से रहा है । भक्तिकालीन संतों के मधुर संगीत का प्रभाव पूरे दक्षिण भारत तक पहुँचा था ऐसे में पड़ोसी देश नेपाल इससे कैसे अछूता रह सकता था । भजनाश्रमों में ये भजन नियमित रूप में गाए जाते थे । यहाँ के राजदरबार में तो विशुद्ध हिन्दी उर्दु के गीत गाए जाते थे ।
यों तो हर भाषा की अपनी महत्ता होती है इसलिए किसी भी भाषा के प्रति दुराग्रह की भावना नहीं होनी चाहिए । भाषा वह सरिता है जिसमें व्यक्ति जितनी डुबकी लगाता है उसकी गहराई से उतनी ही मोती खोज निकालता है । नेपाल में हिन्दी के अस्तित्व का अगर सवाल है तो भारत के बाद नेपाल ही विश्व का एक मात्र देश है जहाँ हिन्दी पढ़ने, लिखने एवं बोलने वालों की सर्वाधिक संख्या है । नेपाल में हिन्दी का एक हजार वर्षों से अधिक का इतिहास है और आज भी इसकी महत्ता कायम है । हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा अवश्य है, किन्तु वह नेपाल की प्राचीन भाषा भी है । “सन् ८४० ई. में कपिलवस्तु में जन्में कुक्कुरीपा और साढ़े छः सौ वर्ष पूर्व दांग में हुए राजा रतन, जो पीछे रत्ननाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए और साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व जनकपुर धाम जानकी मंदिर के संस्थापक रहे महात्मा सूरकिशोर दास जी से आज तक का क्रमबद्ध इतिहास है ।” (नेपाल में हिन्दी की अवस्था, राजेश्वर नेपाली)
नेपाल के कवि मोदनाथ प्रश्रित ने ‘मैं तुम्हें बुद्ध देता हूँ’ जैसी कविता लिखी । इनकी इस कविता के माध्यम से नेपाल–भारत के अन्तरसम्बन्धों को देखा परखा जा सकता है– ‘मैं तुम्हें सगरमाथा की ऊँचाई देता हूँ÷तुम मुझे महासागर की गहराई दो÷मैं गर्वोन्नत स्वाभिमानी जागरूक सिर देता हूँ ÷तुम प्रेमोन्मत्त भाव भीना गंभीर हृदय दो÷…….. मैं तुम्हें अपना बुद्ध देता हूँ ÷तुम मुझे शान्ति और अनाक्रमण दो । यह कविता आम नेपाली के अन्र्तमन की मुक्त पीड़ा का बयान तो करती ही है साथ ही स्पष्ट रूप से यह संकेत देती है कि राजनीतिज्ञ दोनों देशों के बीच चाहे जितनी भी दरारें पैदा करने की कोशिश करें पर साहित्यकारों की लेखनी नेपाल–भारत की धड़कनों को जोड़ने की ही कोशिश करती है । इसी का परिणाम है कि इन दो देशों के बीच समय–समय पर साहित्यिकारों की संगोष्ठियाँ, कवि सम्मेलन होते रहते हैं ।
नेपाल में हिन्दी का प्रयोग एवं साहित्यिक रचनाओं की प्राचीन लम्बी परम्परा अद्यावधि जीवित है । नेपाल में हिन्दी भाषा और साहित्य विद्वेष का शिकार होते हुए भी स्वाध्याय और व्यक्तिगत रुचि के आधार पर हरेक क्षेत्र के लोग (सन्त, राजा, मन्त्री, नेता, कवि, लेखक, पत्रकार आदि) ने भाषण, सम्बोधन, उपदेश, कविता, साहित्यिक कृतियाँ आदि हिन्दी में लिख कर हिन्दी भाषा और साहित्य में योग दान दिया है । हिन्दी में शोध की दृष्टि से नेपाल में प्राप्त सामग्रियाँ महत्त्वपूर्ण हैं । सिद्धों, नाथों की कविता का सकंलन नेपाल में प्राप्त हुआ, जो उनकी दीर्घकालीन परम्परा और प्रभाव क्षेत्र रहा है । यही आगे जाकर ‘जोशमणि’ नामक योग सम्प्रदाय पहले हिन्दी तथा बाद में नेपाली कवि परम्परा को विकसित किया । जोशमणि साहित्य में उद्धारक श्री जनकलाल शर्मा के मतानसुार ८४ सिद्धों में से अधिकांश नेपाल के ही थे । मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ आदि महापुरुषों की जन्मभूमि नेपाल तो नहीं रही पर इनका कर्मक्षेत्र दीर्घकाल तक नेपाल भूमि ही रही । नाथ संतो की अधिकांश रचनाएँ नेपाल के अनेक स्थानों,तथा अनुयायियों के पास मौखिक या लिखित रूप में संरक्षित हैं । नाथपंथी साहित्य में रतननाथ का उल्लेख हुआ है । दाङ जिला के रतननाथ मठ से प्राप्त इनके उपदेशों का कुछ अंश अत्यन्त परिष्कृत शैली के सुन्दर पुराने हिन्दी–गद्य का नमूना है । नाथ सिद्धों की परम्परा में ही जोशमणि निर्गुण सम्प्रदाय का विकास नेपाल में ही हुआ है । जोशमणि सम्प्रदाय को व्यापकता प्रदान करने वाले संत शशिधर को ही संस्थापक माना जाता है । इस सम्प्रदाय में अनेकानेक संत हुए हैं । धरनीदास, ज्ञान दिलदास, प्रेम दिलदास धर्म दिलदास आदि इन सभी ने हिन्दी साहित्य लेखन परम्परा को आगे बढ़ाया है । शशिधर ने हिन्दी में कई रचनाएँ की हैं– सच्चिदानन्द लहरी, पाखण्ड–अखण्ड शब्द, गुरूपञ्जा भजनमाला आदि । नेपाल में १९वीं शताब्दी का ‘बड़ा पंडित’ वाणी विलास पाण्डे ने नारायणहिटी शिलालेख में व्रजबोली हिन्दी में ही पदों की रचना की है ।
विद्यारण्य केशरी ने तो नेपाली के साथ–साथ मुख्य रूप से हिन्दी में ही काव्य रचना की है ।
आधुनिक नेपाल के निर्माता पृथ्वीनारायण शाह ने अपने गुरु की स्तुतिपदों की रचना हिन्दी में की है–‘बाबा गोरखनाथ सेवक सुख दाये भजहूँ तो मन लाये ।’ नेपाल के लिए ही नहीं भारत के लिए भी ऐतिहासिक मिथिला नगरी जनकपुर का महत्त्वपूर्ण स्थान है जहाँ का भक्ति साहित्य को नेपाल के हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । यहाँ रामभक्ति शाखा की काव्य रचनाएँ विगत ३०० वर्षों से साधु–सन्तों द्वारा अनवरत रची जा रही है । महात्मा ‘सूर किशोर’ जनकपुर के संस्थापक माने जाते हैं । इन्होंने कई धार्मिक ग्रन्थों का प्रणयन किया है, किन्तु इनका संरक्षण नहीं किया जा सका । इनका एक ही लघु काव्य ‘मिथिला विलास’ उपलब्ध है । ‘सीतायन’ प्रबन्ध काव्य रचना का सम्बन्ध ‘सूर किशोर’ से ही मानते हैं । दूसरे संतो में श्री किशोरी शरण, महन्थ गोकुल गिरि, पं. जानकी रामाचार्य, सिया रघुनाथशरण, महन्थ अवध किशोर दास ‘उमंग’, स्वामी रामप्रिया शरण, श्री गुरुदेव स्वामी प्रेमनिधि आदि हैं । इन साधु–संतो की रचनाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि हिन्दी भाषा का प्रयोग यहाँ अविरल रूप से हुआ है । मध्यकालीन काठमांडू उपत्यका में तत्कालीन मल्ल राजा कला–साहित्य प्रेमी थे । उस समय यह उपत्यका भारत से आनेवाले पंडितों एवं कवियों की आश्रयस्थली थी । आनेवाले पंडितों में सर्वाधिक संख्या मैथिलों की थी । आश्रित पंडितों, कवियों द्वारा रचित मल्लकालीन साहित्य नाटकों की हस्तलिखित पाण्डुलिपियों से राष्ट्रीय अभिलेखालय भरा पड़ा है ।
नेपाल में नेपाली भाषा के अनेक कवियों और लेखकों ने हिन्दी भाषा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है । अतीत से वर्तमान तक साहित्यप्रेमियों की मनपसंद भाषा हिन्दी रही है और यही कारण है कि हिन्दी में छोटी–छोटी कविताएँ, लघु काव्य, निबन्ध, गीत, गजल रचने वाले अनगिनत हिन्दी प्रेमी यहाँ मौजूद हैं । सभी को यहाँ समेटा नहीं जा सकता इसके बावजूद कुछ नाम उल्लेखित करने की कोशिश की जा रही है
मोतीराम भट्ट– नेपाली साहित्य आधुनिक युग प्रवर्तक मोतीराम भट्ट भारतेन्दु मण्डल के कवि थे । भारतेन्दु की प्रेरणा से भट्ट ने ‘निज भाषा उन्नति’ का व्रत लिया था । ये हिन्दी में समस्या पूर्ति करते थे । इनकी कई चिट्ठियां हिन्दी में उपलब्ध हैं । इनकी दो रचनाएं ‘गलम शनोवर’ (आख्यान) ‘ हुश्न अफरोज आराम दिल’ (नाटक) हैं । इन्होंने हिन्दी,उर्दू में ४०० शेर लिखे थे, जो उपलब्ध नहीं हैं ।
शम्भुप्रसाद ढुंग्याल– ये आशु कवि के रूप में जाने जाते हैं । देवकीनंदन खत्री से प्रभावित हो प्रेमकान्ता एवं प्रेमकान्ता सन्तति, दो उपन्यास तथा ‘दानवीर कर्ण नाटक हिन्दी में लिखे हैं ।
देवीप्रसाद शर्मा– हिन्दी में इन्होंने बहू अम्बालिका देवी, राजपूत रमणी, सुन्दर सरोजिनी (उपन्यास) हृदयोद्गार (शोक काव्य) लिख कर हिन्दी साहित्य की सेवा की है ।
गिरीश बल्लभ जोशी– ये नेपाली हिन्दी भाषा में समान रूप से रचना करते दिखाई देते हैं । हिन्दी में गिरीशवाणी (उपन्यास), गोलो चरित (नाटक), सीताराम विलाप (नाटक) जैसी रचनाएँ उपलब्ध हैं ।
रामप्रसाद सत्याल– इन्होंने नेपाली के अतिरिक्त हिन्दी भाषा में प्रेमलता, अनन्त तथा किरण शशि नामक किताबें लिखकर हिन्दी को आगे बढ़ाने का काम किया है ।
कविकेशरी चित्रधर ‘हृदय’– इनकी कई रचनाएं हिन्दी में उपलब्ध हैं । कलकत्ता की ‘तरंग’ पत्रिका में दो रचनाएँ ‘तरंग’ और ‘स्वागत होने आई है’ प्रकाशित हैं ।
लेखनाथ पौड्याल– नेपाली साहित्य में कवि शिरोमणि उपाधि से विभूषित पौड्याल ने संस्कृत(नेपाली के अतिरिक्त हिन्दी में ‘राधाकृष्णकेलि’ तथा ‘भवितव्य’ जैसी रचनाएं लिखी हैं ।
शुक्रराज शास्त्री– काशी के दूधविनायक महल्ले में जन्मे काठमांडू के सुसंस्कृत नेवार परिवार में पालित शुक्रराज शास्त्री हिन्दी के सिद्धहस्त लेखक हैं । इन्होंने हिन्दी भाषा में ‘नेपाल की झलक’ तथा ‘शहीद की कलम से’ जैसी दो रचनाएं लिखी थी । इनके अनुज वाकपति राज शास्त्री तथा बहन चन्द्रकान्ता देवी ने भी हिन्दी में रचनाएं की थी, ऐसा साक्ष्य है ।
युद्धप्रसाद मिश्र– नेपाली साहित्य में लब्ध प्रतिष्ठित लेखक कवि मिश्रजी ने हिन्दी में कोई स्वतन्त्र रचना नहीं की है, पर हिन्दी में फुटकर कविताओं का सृजन किया है ।
रमाकान्त झा– प्रजातन्त्रवादी एवं सेनानी झा सुप्रसिद्ध हिन्दी कवि हैं । ओजपूर्ण इनकी कविता पढ़ने से देशभक्ति की भावनाएँ जाग उठती हैं,‘आज देख लो जगत भरा है, क्रन्दन अत्याचारों से ।’
लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा– महाकवि उपाधि से विभूषित देवकोटा नेपाली–पश्चिमी साहित्य के साथ–साथ हिन्दी साहित्य का भी अच्छा ज्ञान रखते थे । आपको राहुल सांकृत्यायन ने पन्त, प्रसाद एवं निराला का समवेत रूप माना है । इनकी हिन्दी में सृजित कविता का नाम है, मृत्यु शैय्या से ।
सिद्धिचरण श्रेष्ठ– नेपाली साहित्य के ख्यातिप्राप्त लोकप्रिय छायावादी कवि हैं । हिन्दी में ‘अकेला चलने का मन करता है’ नामक कविता इन्होंने लिखी है ।
गोपालसिंह नेपाली– हिन्दी गीतिकाव्य के इतिहास में कवि नेपाली का स्थान अद्वितीय है । हिन्दी सिनेमा में इन्होंने कई गीत लिखे हैं । पंछी, रंगीनी, उमंग, नीलिमा आदि अनेक कृतियाँ प्रकाशित हैं ।
भवानी भिक्षु– भिक्षु ने हिन्दी से ही लेखन परम्परा का शुभारम्भ किया था । इनकी हिन्दी कहानियाँ आज, माधुरी, हंस, प्रताप, एवं सुधा आदि पत्रिका में प्रकाशित हैं । इनकी हिन्दी कृति का नाम है, नेपाल–पहाड़ और तराई ।
विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला– यह नाम साहित्य क्षेत्र में आख्यानकार के रूप में प्रसिद्ध है । कोईराला की सर्वप्रथम रचना हिन्दी में रची गई, जो ‘हंस’ पत्रिका में प्रकाशित हुई । कई कहानियाँ ‘हंस’ और सरस्वती पत्रिका में छपी हैं । इनकी हिन्दी रचनाएं इस प्रकार हैं– पथिक, अपनी ही तरह, मैयादाई और विशाल भारत ।
केदारमान व्यथित– व्यथितजी नेपाली, नेवारी और हिन्दी में समान रूप से लिखते थे । हिन्दी में इन्होंने हमारा देश, हमारा स्वप्न, अग्नि श्रृंगार, त्रयी और तेवर । ‘कविता का संदर्भ आज का’ काव्य संकलन है । आपकी कविताओं में छायावाद की झलक मिलती है—
“जलते–जलते तम में हँसना
मैंने तारों से सीखा ।”
उमाकान्त लालदास– हिन्दी दैनिक पत्रिका के सम्पादक दासजी लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार थे । इनकी एक बड़ी ही सशक्त हिन्दी कविता है, कौन बिगाड़ सकता है तेरा ।
सरयुग चौधरी– जनकपुर निवासी चौधरी सत्याग्रह आन्दोलन (राणाविरुद्ध) के सहयात्री हैं । ये गीत–गजल भी हिन्दी में लिखते हैं, साथ ही इनकी एक कविता है( दुःखमयी कहानी ।
धुस्वाँ सायमी– ये नेपाली, नेवारी एवं हिन्दी में समान रूप से लिखते रहे । इनकी पहली हिन्दी कथा, ‘आज का इन्सान’ है । अन्य हिन्दी रचनाएँ कादम्बिनी, दिनमान, धर्मयुग एवं साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिकाओं में छपी हैं । मैं दासी मैं सराय, रेत की दरार, एक चिथड़ा आदमी और जलजला उपन्यास प्रकाशित हैं । शब्दों का आकाश’ और कविता का जंगल’ इनकी दो काव्य कृतियाँ हैं ।
डॉ. कृष्णचन्द्र मिश्र– डॉ. मिश्र हिन्दी विकास के अथक योद्धा थे । हिन्दी इनकी आजीविका थी और हिन्दी भाषा–साहित्य के विकास के लिए आप समर्पित थे । हिन्दी,संस्कृत और अँग्रेजी भाषा पर समान अधिकार रखने वाले डॉ. मिश्र आजीवन हिन्दी भाषा की सेवा और विकास के लिए प्रवृत रहे । डॉ.मिश्र की स्मृति में उनके पुत्र ईं.सच्चिदानन्द मिश्र ने डॉ.कृष्णचन्द्र मिश्र प्रकाशन की स्थापना की जहाँ से हिन्दी की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और ‘हिमालिनी’ मासिक पत्रिका पिछले तेईस वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही है ।
रामहरि जोशी– ये भाषायी एकता के पक्षधर एवं ईमानदार राजनीतिज्ञ हैं । इनकी हिन्दी रचनाएँ हैं– रैन वसेरा (कविता संग्रह), नेपाल हिन्दी गद्य संग्रह, नेपाल हिन्दी गद्य पराग, नेपाल के अमर शहीद, देवकोटा रचित अंग्रेजी में बापू का हिन्दी अनुवाद ।
सुन्दर झा शास्त्री– ये मैथिली, नेपाली एवं हिन्दी के समान रूप से कवि–लेखक थे । इनकी काव्यकृति हिन्दी में ‘परवशता’ प्रकाशित है । इनकी ‘तुलसी–चतुष्पदी’ बहुत प्रसिद्ध है । आपने लिखा है कि—“मित्र हों या हों विरोधी÷रंक या धनवान हों÷बन्धु हों या दुष्ट हों÷मुर्ख या विद्वान हों÷चाल मेरी एक है सब के लिए अनुकूल हूँ मैं ।”
बुन्नीलाल सिंह– हिन्दी में विशेषाधिकार प्राप्त लेखक हैं । इनकी दो हिन्दी कृतियाँ( नेपाल की हिन्दी कहानियाँ और नयन कर दरिभाव (उपन्यास) है । दो आने पैसे हिन्दी नाटक है तथा ‘परदेशी पिया की आस’ हिन्दी रचना प्रकाशित है । ‘सीकी की डलिया’ कविता संग्रह भी प्रकाशित है ।
डॉ. राजेन्द्र विमल– ये नेपाली, मैथिली एवं हिन्दी के लेखक हैं । ‘हिन्दी और नेपाली नाटकों का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया है । ये हिन्दी में गीत–गजल भी लिखते हैं ।
चन्द्रदेव ठाकुर– ये हिन्दी के सफल कवि थे । कुमारसम्भवम् के आधार पर इन्होंने हिन्दी में ‘शैलवाला’ खण्डकाव्य लिखा है, जो प्रकाशित है ।
लोकेन्द्रबहादुर चन्द– राजनीतिज्ञ होते हुए भी नेपाली सााहित्य में आख्यानकार हैं । इनकी हिन्दी कृतियाँ इन्द्र धनुष, बाह्रौं खेलाड़ी (हास्य निबन्ध संग्रह) तथा नेता का साथी प्रकाशित हैं ।
मोहनराज शर्मा– नेपाली साहित्य के समीक्षक, कथाकार, उपन्यासकार शर्मा की १५ हिन्दी कविताएँ ‘ऋचाएं’ नामक कृति में संग्रहित हैं । इन्होंने विनियोग पत्रिका का सम्पादन भी किया है ।
मोदनाथ प्रश्रित– प्रश्रित नेपाली साहित्य तथा वामपंथी राजनीति के चर्चित व्यक्तित्व हैं । इनकी हिन्दी कविता,नेपाली बहादुर है । फुटकर हिन्दी कविताएं भी इन्होंने लिखी हैं ।
डॉ. सूर्यनाथ गोप– हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व गोपजी की महत्वर्पूण कृति है( नेपाल में हिन्दी और हिन्दी साहित्य । इनकी कविता है– पीड़ा का साम्राज्य ।
राजेश्वर नेपाली– नेपाली हिन्दी सेवा में समर्पित कर्मठ व्यक्तित्व हैं । ये ‘लोकमत’ पत्रिका के सम्पादक हैं । इनकी हिन्दी की कई कृतियाँ प्रकाशित हैं ।
शेषराज शर्मा रेग्मी– इन्होंने मल्लिनाथ टीका कृत कुछ संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दी में सशक्त टीका सहित अनुवाद प्रकाशित किया है । हिन्दी में इनकी अनेक अनूदित कृतियाँ हैं ।
कृष्णप्रसाद घिमिरे– घिमिरे ने नेपाली एवं हिन्दी में कई ग्रन्थ लिखे हैं । इनकी हिन्दी कृतियाँ हैं, श्री कृष्ण चरितामृत हिन्दी टीका गतिविधियों की रूपरेखा, श्री रामविलाप तथा नचिकेताम् हिन्दी टीका सहित ।
डॉ. रामदयाल राकेश– राकेश हिन्दी, मैथिली, नेपाली भाषा में लिखनेवाले प्रसिद्ध लेखक, कवि हैं । इनकी हिन्दी कृतियाँ तुलसी दिवस की कविताएँ, काला सूरज, लाल सूरज हैं, सुनो शांता आदि हैं । अनुवाद के क्षेत्र में आपका महत्तवपूर्ण योगदान है ।
डॉ. कृष्णजंग राणा— आपकी हिन्दी गजलों और कविताओं की कई कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं और आप आज भी रचनाकर्म में सतत् प्रवृत हैं ।
निर्मल रिमाल— हिन्दी भाषा के प्रेमी निर्मल रिमाल की कई हिन्दी मुक्तक और कविताओं की कृतियाँ प्रकाशित हैं ।
बसंत चौधरी– नेपाल के प्रसिद्ध व्यवसायी घराने से आने वाले बसंत चौधरी ने साहित्य जगत में अपनी एक अलग और महत्तवपूर्ण जगह बनाई है । पिछले पैतीस वर्षों से आप लगातार रचना प्रवृत हैं । नेपाली साहित्य के साथ ही हिन्दी में आपकी ‘मेघा’, ‘बसन्त’, ‘चाहतों के साये में’, ‘आँसुओं की सियाही से’, ‘अनेक पल और मैं’, ‘वक्त रुकता नहीं’(दो भाग) आदि कई महत्तवपूर्ण काव्य संग्रह प्रकाशित हैं । आपने देश–विदेश में एकल काव्य पाठ भी किया है ।
डॉ. शिवशंकर यादव— आपके तीन उपन्यास और पाँच कविता संग्रह प्रकाशित हैं ।
चन्द्रशेखर उपाध्याय— हिन्दी भाषा में आपकी रुचि रही है । हिन्दी में आपकी कई कृतियाँ प्रकाशित हैं जिसमें एक खण्ड काव्य भी है ।
डॉ. उषा ठाकुर– आप हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाने में सफल नाम हैं । हिन्दी भाषा के अध्यापन के साथ ही आपकी कई कृतियाँ प्रकाशित हैं ।
डॉ. श्वेता दीप्ति– आपकी सात कृतियाँ–‘अनुभूतियों के बिखरे पल’, ‘आधुनिक कविता एक अनुशीलन’, ‘भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र’, ‘विविधा’, ‘नारी जीवन ः विगत से वर्तमान’, ‘उषा प्रियम्बदा के साहित्य में नारी त्रासदी’,‘मोदिआइन’, ‘शेष होते शब्द’ कृतियाँ प्रकाशित हैं ।
डॉ.संजीता वर्मा– आपका एक उपन्यास, कविता संग्रह और कहानी संकलन प्रकाशित है ।
गोपाल अश्क– नेपाली भाषा और भोजपुरी भाषा के साथ ही आप नेपाल के हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में चिरपरिचित नाम हैं । आपकी कई कृतियाँ प्रकाशित हैं तथा आप निरन्तर रचनाशील हैं ।
ध्रुवचंद गौतम– चेतन कार्की, महेश्वर शास्त्री हलवे, उमानाथ शर्मा, सीतारानी श्रेष्ठ, डॉ.आशा सिन्हा, उपेन्द्रप्रसाद कमल, रामस्वरूप प्रसाद, काशी राज उपाध्याय, योगेन्द्र प्रसाद अर्याल, मुरारी अधिकारी, किशोर नेपाल, डॉ. सूर्य देव सिंह प्रभाकर, डॉ. ईश्वर बराल, हेमचन्द्र पोखरेल, प्रेमा शाह, सुश्री भन्द्रा घले, राजाराम पौडेल, दुर्गाप्रसाद श्रेष्ठ ‘उपेन्द्र’,गोविन्द भट्ट आदि कई नाम हैं जिन्होंने नेपाल में हिन्दी साहित्य की परम्परा को आगे बढ़ाया और इसे समृद्ध किया है । वर्तमान में भी हिन्दी में लिखने वाले कई नए नाम जुड़ रहे हैं, जो अपनी रचनाओं के माध्यम से इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं । निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि जहाँ हिन्दी कृतियाँ भारत में प्रचुर मात्रा में प्रकाशित हो रही हैं, वहीं नेपाल भी इसमें पीछे नहीं है और लगातार हिन्दी भाषा में अपना महत्तवपूर्ण योगदान दे रहा है और यह बात इस तथ्य को सिद्ध करती है कि, हिन्दी न तो पहले यहाँ कभी विदेशी भाषा मानी गई और न ही आज यह विदेशी भाषा है । हिन्दी भाषा को लेकर विवाद अगर कहीं है तो वह सिर्फ और सिर्फ राजनीति में है और कहीं नहीं


