उपन्यास “धनंजय” पर एम्बेसडर अखिलेश मिश्र जी के समीक्षात्मक विचार
अर्जुन के आत्मवृतांत पर आधारित उपन्यास “धनंजय” के लोकार्पण के अवसर पर मुझे समीक्षा करने का अवसर मिला।इसके लेखक मेधावी हिंदी साहित्यकार प्रताप नारायण सिंह की भाषा-शैली, कथा का प्रवाह, नैतिक संदेश और कथ्यविषयों का संवेदनशील प्रतिपादन सभी प्रशंसनीय हैं। इस पठनीय उपन्यास की मेरी समीक्षा प्रस्तुत है🙏

महाभारत भारत का महान इतिहास-ग्रन्थ है, जो कि विश्व-मानव के इतिहास में न भूतो न भविष्यति कोटि की अद्वितीय रचना है। पाश्चात्य इतिहास लेखन का मुख्य उद्देश्य रहता है युद्धादि प्रधान घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करना। परन्तु भारतीय परम्परा में घटना-वैचित्र्य स्वयं में विशेष महत्त्व नहीं रखता। हमारे इतिहासग्रन्थ रामायण और महाभारत केवल युद्धों के वर्णन मात्र नहीं, बल्कि धर्म, समाज और सभ्यता का सांगोपांग अभिलेख हैं। महाभारत तो अपनी विशालता और विस्तार के कारण वस्तुतः ज्ञान का एक अनंत, असीम महासागर तुल्य है, जिसमें जिस भी दिशा में गोता लगाओ, जितनी भी गहराई तक जा सको, अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष, ऐहिक, दैविक सिद्धियों, राजनीति, धर्म-नीति विविध ज्ञान-रत्न अपनी अंजलि में भर कर ले आओ। महाभारत इतना महान अक्षुण्ण रत्नागार है कि सहस्त्रों वर्षों से असंख्य कवियों, लेखकों, कलाकारों, साधकों को उसमें आनी-अपनी रूचि के अनुसार अपनी रचनाओं और कला-कृतियों का विषय मिलता रहा है। इसी परम्परा में गोता लगाने वालों में से एक प्रताप नारायण सिंह भी हैं।
प्रताप नारायण सिंह के द्वारा “धनंजय” उपन्यास के लेखन का निर्णय और इस अनुष्ठान को सफलतापूर्वक सम्पादित करना अवश्य ही चुनौतीपूर्ण भरा रहा होगा। महाभारत जैसे विशालकाय ग्रन्थ में से कहाँ से प्रारम्भ करें, क्या रखें और क्या छोड़ें कि कथा को एक उपन्यास में समेटा जा सके, यह अपने आप में बड़ी दुविधा रही होगी। फिर उससे भी बड़ी चुनौती यह कि कथानक चिर-परिचित और सर्व-विदित होने पर भी पाठक की रूचि को कैसे बाँधे रखें। इसके लिए लेखक बधाई के पात्र हैं कि महाभारत के कथानक का अविचलित अनुगमन हुए भी अपने उपन्यास को अत्यंत रोचक और स्वतःस्फूर्त प्रवाहवान बनाया है। मेरी सीमित सूचना और अनुभव में किसी हिंदी उपन्यासकार के द्वारा महाभारत की कथा को अर्जुन के आत्मवृत्तांत रूप में प्रस्तुत करने का यह प्रथम प्रयास है। संजय की दृष्टि से महाभारत देखने की अभ्यस्त हमारी आँखों को अर्जुन के परिपेक्ष्य में जैसा परिदृश्य “धनंजय” ने दिखाया है वह लेखक की प्रतिभा की विलक्षणता है।
उपन्यास की परिष्कृत भाषा और गंभीर, सुगढ़ शैली तो प्रशंसनीय है ही, साथ में विवध विचारों और भावों की सूक्ष्मता तथा जटिल मनोवैज्ञानिक विषयों का विश्लेषण भी अत्यंत प्रभावशाली है। विषयवस्तु में लेखक का गंभीर शोध और अध्यवसाय स्पष्ट लक्षित होता है। योद्धाओं द्वारा प्रहार के आधार पर आयुधों और दिव्यास्त्रों के प्रकारों, धनुर्विद्या, गदायुद्ध, रथ-सञ्चालन और व्यूह निर्माण के भेदों और जटिल प्रक्रियाओं का सरल ढंग से वर्णन बहुत ही ज्ञानवर्धक है।

अच्छे साहित्य का उद्देश्य केवल दर्पण दिखाना या सूचनाएँ देना नहीं होता। या यूँ कहें कि कोई भी साहित्य तब तक उत्तम और महत्वपूर्ण नहीं हो सकता, जब तक वह मूलतः लोक कल्याण का प्रतिपादक न हो। समाज को मंगलमय पथ पर प्रेरित न करता हो, “शिवेतर क्षतये” में सहायक न हो। धनञ्जय में भी मेरी दृष्टि में अनेक जीवनोपयोगी सन्देश और सुनीति की प्रस्तुति उल्लेखनीय है। इस उपन्यास के पात्रों का चरित्र-चित्रण ऐसी दक्षता से हुआ है कि वे इस तरह जीवंत लगते हैं जैसे हम उनसे दैनिक जीवन में सम्बंधित रहे हों और वे हमसे ही कुछ कहते प्रतीत होते हैं। जैसे इन उदाहरणों को देखें –
युधिष्ठिर के विषय में – सभी भाइयों पर उनका असीम स्नेह था। प्रत्येक भाई को यही लगता था की वही उनको सबसे अधिक प्रिय है। सामजिक व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को बहुआयामी और बहुसूत्री सम्बंधों का निर्वाह करना होता है। युधिष्ठिर का यह गुण वैयक्तिक संबंधों के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय राजनयिक सम्बंधों के परिपेक्ष्य में अनुकरणीय है।
इसी प्रकार दुर्योधन के स्वभाव के चित्रण से उपन्यास हमें वाणी और कर्म में आत्मसंयम की महत्ता को रेखांकित करता है – “अत्यंत ही उदंड, अविवेकी और मूर्ख व्यक्ति है। उसका मन अस्थिर था। यूँ लग रहा था कि कोई बात सहसा उसके मन में एक ज्वार सी उठती और उसे बोलकर वह स्वयं को खाली कर लेता। विचार की क्षमता की उसमें अत्यंत कमी थी।“
युवा अर्जुन अपने प्रतिस्पर्धी कर्ण के विषय में कहते हैं – “निःसंदेह वह एक बहुत अच्छा धनुर्धर और योद्धा बनने वाला था। एक महारथी होने वाला था। परन्तु साथ ही उसके अंदर आवेश और दम्भ प्रचुरता में विद्यमान था जो एक धनुर्धर के लिए विष के समान कार्य करता है। वह प्रतिक्षण अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए उद्यत रहता था। “ कर्ण के आगामी जीवन की दुर्गति हमें दम्भ, अहंकार और सतत शक्ति प्रदर्शन की वर्जनीय प्रवृत्तियों से बचने की शिक्षा देता है।
विभिन्न पात्रों के माध्यम से समसामयिक जीवन की अनेक पहेलियों और गंभीर प्रश्नों का उत्तर दिया गया है इस उपन्यास में-
“एकलव्य से गुरु द्रोण ने अँगूठा ही गुरु-दक्षिणा में क्यों माँगा?”- इस प्रश्न से अर्जुन विचलित हैं कि क्या उन्होंने मेरे प्रति स्नेह के कारण ऐसा किया ? कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे सामर्थ्य पर उन्हें विश्वास नहीं है? वे द्रोण से कारण पूछ ही डालते हैं। द्रोण कहते हैं – तुम्हारे लिए एकलव्य न तो कभी प्रतिस्पर्द्धा था और न ही चुनौती। क्या जब मैं तुमसे अपनी गुरु-दक्षिणा माँगूँगा तब भी तुम उसका प्रयोजन पूछोगे? क्या मुझे अपनी माँग को उचित ठहराने के कारण बताने होंगे ? गुरु-दक्षिणा के रूप में जो कार्य मैं तुमसे संपन्न करवाना चाहता हूँ यदि तुम उसमे विफल हो गए तो क्या तुम्हारी पीड़ा अँगूठा कटने से कम होगी? एकलव्य मेरा स्वघोषित शिष्य है। मैं उसके कथन की परीक्षा लेना चाहता था। अँगूठा न होने से एकलव्य के जीवन में कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है। मैं उसे बिना अँगूठे के बाण चलाने की शिक्षा दूँगा जो कि अपने आप में एक विलक्षण कला है। आने वाले समय में इसी तरह से बाण चलाने की पद्धति प्रचलित होगी। धनुर्विद्या में शर-संधान के लिए कोई अँगूठे का प्रयोग नहीं करेगा।
महाभारत के मूल पाठ के पाठकों के मन में एक प्रश्न बारम्बार उभरता है कि भीष्म जैसे धर्मज्ञ और ज्ञानी शूरवीर दुर्योधन, शकुनि और धृतराष्ट्र के कुचक्रों, षड़यंत्रों और अशोभनीय कृत्यों से परीचित होने पर भी उन्हें रोक क्यों नहीं पाते। हस्तिनापुर की राजसभा में द्रौपदी चीरहरण तक विवशतापूर्वक चुपचाप देखते रह जाते हैं। पितामह भीष्म हस्तक्षेप क्यों नहीं करते अन्यायपूर्ण दुष्कर्मों को रोकने के लिए? क्या उनके लिए उनकी व्यक्तिगत प्रतिज्ञा का मान वृहत्तर समाज के कुशल-मंगल से अधिक महत्व रखता था? उपन्यास धनंजय ने विदुर के मुख से इस गूढ़ और जटिल प्रश्न का अत्यंत सारगर्भित और तर्कसंगत उत्तर दिया है- “यदि लोगों को परिस्थितयों के अनुरूप अपने वचन को बदलने की सुविधा प्राप्त हो जाए तो क्या होगा?..लोग वचन तोड़ने के लिए तर्क गढ़ने लगेंगे। किसका कारण उचित है और किसका अनुचित इसका निर्धारण कौन करेगा? जीवन में अनेक बार ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जब मनुष्य को लगता है कि नीति का पालन करना वावश्यक उन्हीं है या नीति के पालन से हानि हो रही है। किन्तु पूरे समाज को चलाने के लिए नीतिगत आचरण करना अत्यंत आवश्यक होता है। अन्यथा व्यवस्था चरमरा जाएगी।“
विश्व भर में शांति, सौहार्द्र और सद्भाव के प्रतीक भारत के लिए “धनंजय” में धर्मराज युधिष्ठिर के मुख से एक बहुमूल्य समसामयिक संदेश प्रेषित है – “शांति की स्थापना के लिए शक्ति का होना अनिवार्य है। इस धरा पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की शक्तियाँ विद्यामान हैं। नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध बल प्रयोग करना ही पड़ता है।“
शक्ति की विशद विवेचना करते हुए गुरु द्रोणाचार्य शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा का सम्बंध आत्मशक्ति से जोड़ते हैं और शक्ति की सार्थकता और उसकी सफलता का व्यक्ति व राज्य के चरित्र और आचरण पर निर्भरता का स्पष्ट प्रतिपादन करते हैं- “धनुर्वेद की शिक्षा हमें शक्तिशाली बनाती है। मात्र धनुर्वेद की ही नहीं , अपितु प्रत्येक शिक्षा हमें शक्तिशाली बनाती है। धनुर्वेद की शिक्षा का उद्देश्य शक्तिशाली होकर दूसरों से युद्ध करना नहीं, अपितु धर्म और न्याय के रक्षार्थ प्रतिकार करना है। जब कोई व्यक्ति धर्म और न्याय की रक्षा के लिए युद्ध करता है तब उसका आत्मबल अत्यधिक होता है। इसलिए शक्ति जब धर्म के मार्ग में प्रयुक्त होती है तभी फलित होती है। अन्यथा कितना भी बलशाली व्यक्ति हो उसे एक न एक दिन पराभव का मुँह देखना ही पड़ता है।
गुरुद्रोण अपने आश्रम में कर्ण का तिरस्कार इसलिए नहीं करते कि वह सूतपुत्र राधेय है, अपितु उसके आचरण के कारण कहते हैं- ” तुम्हारा आचरण यहाँ रहने योग्य नहीं है। तुम एक अच्छे धनुर्धर हो। किन्तु अच्छा धनुर्धर होना ही सब कुछ नहीं होता है। सबसे महत्वपूर्ण होता है चरित्र। मनुष्य का चरित्र ही उसके उत्थान और पतन का कारण होता है।“ हालाँकि फिर भी द्रोणाचार्य अपने आश्रम में कर्ण को शिक्षा देते हैं और यहाँ जनधारणाओं में लम्बे समय से चल रही एक भ्रांति का निवारण भी होता है कि द्रोणाचार्य ने सूतपुत्र होने के कारण कर्ण को शिक्षा देने से मना कर दिया था। द्रोणाचार्य और कृपाचार्य दोनों ही कर्ण के गुरु थे।
चरित्र का निर्धारण जन्म से नहीं होता है। चरित्र का निर्माण और विकास पुरुषार्थ, कर्मठता और तप से होता है। अर्जुन का जन्म कुटिया में हुआ था। चौदहवें जन्मोत्सव के दिन ही उनके पिता पाण्डु और छोटी माता माद्री का निधन हो जाता है। इतने वीर, पराक्रमी और महान कुलोत्पन्न होने पर भी अर्जुन का जीवन निरंतर संघर्ष, चुनौतियों और सतत साधना से परिपूर्ण रहा। किंतु उनके मानस में कभी विषाद या हताशा प्रभावी नहीं हुई। हर चुनौती को उन्होंने एक अवसर के रूप में परिवर्तित किया और हर संकट से वे निकले अधिक परिपक्व, समर्थ और शक्ति व यश संपन्न।
द्रौपदी और सुभद्रा का वर्णन तो अन्यत्र भी मिलता है, किंतु अर्जुन की पत्नियों उलूपी और चित्रांगदा तथा भीम की पत्नी हिडिम्बा के प्रेम, त्याग और मनःस्थिति का सूक्ष्म विवरण उपन्यास “धनंजय’ की एक विषयगत नवीनता है। उलूपी और हिडिम्बा दोनों ने हस्तिनापुर आने से मना कर दिया था, किंतु अपने पुत्रों इरावान और घटोत्कच को युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र भेज दिया था। दोनों नें युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी।
मनुष्य के जीवन में संगति का कितना गंभीर प्रभाव हो सकता है, इसका जवलंत उदाहरण कर्ण का जीवन है। अर्जुन और कर्ण दोनों एक ही माता के पुत्र, दोनों के पिता तेजस्वी देव, पर जहाँ अर्जुन के पथप्रदर्शक कृष्ण, युधिष्ठिर और विदुर जैसे धर्मात्मा थे, वहीं कर्ण घिरा था दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि जैसे दुश्चरित्रों से और उनके कुचक्रों में सहभागी होकर निरंतर पाप के दलदल में धँसता ही चला जाता है। उपन्यास में धनुर्वेद कौशल-प्रदर्शन के उत्सव के प्रसंग में अर्जुन सोचते हैं – “कर्ण ने मात्र मुझसे युद्ध कर पाने के लिए आज दुर्योधन का दान स्वीकार कर लिया था। वह दुर्योधन के उपकारों के बोझ तले दब गया था। उस पर दुर्योधन का अनुग्रह इसलिए नहीं था की वह उसे प्रेम करता था, अपितु इसलिए था कि कर्ण के रुप में उसे एक शक्ति मिल गयी थी, जिसका प्रयोग वह हमारे विरुद्ध कर सकता था। दुर्योधन किसी से प्रेम नहीं कर सकता।“ इसीलिए भारतीय मुनियों ने दुराचारियों और दुश्चरित्रों से बचने की शिक्षा दी हैऔर कुपात्रों से दान लेना और उन्हें दान देना दोनों ही वर्जनीय बताया है।
क्षणिक आवेश में किया गया एक भी अविवेकपूर्ण कृत्य कभी कभी आजीवन त्रासदी का कारण बन जाता है- यह भी धनंजय में कर्ण (दुर्योधन से अंगराज का दान ग्रहण करना) और कुंती (कर्ण के जन्म का प्रसंग) के चरित्रों के विवरण में स्पष्ट दीखता है। महाभारत के युद्ध के पश्चात कुंती कर्ण को अपना पुत्र घोषित करती हैं और कहती हैं कि कर्ण दुर्योधन के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। वह विवश था।“ तब अर्जुन मन ही मन विचार करते हैं- वे विवश तो उसी दिन हो गए थे जब उन्होंने मात्र मुझसे युद्ध कर पाने के लिए अंग प्रांत का दान स्वीकार कर लिया था। सत्य जानकर माँ के प्रति सहानुभूति तो उभरी किंतु भ्रातृत्व प्रेम नहीं उपज सका। हमारे विरुद्ध पितामह और गुरु भी लड़े थे। वे भी विवश थे किंतु उनकी आँखों में मैंने कभी अपने पप्रति घृणा नहीं देखी और न ही कभी उनके मन में मुझे मारने की उतनी आतुरता ही दिखी जितनी कि मेरे अपने भाई के मन में थी। पता नहीं वह किस विवशता से उपजी थी।
धनंजय के कर्ण यदि कुमित्र और कुसंगति प्रेरित दुराचरण से ग्रस्त हैं तो युधिष्ठिर स्व-प्रेरित धर्माचरण के उदात्त उदाहरण। युधिष्ठिर की शांत, संयमित और क्षमाशील व्यवहार के प्रति उलाहना देती हुई द्रौपदी उनसे कहती हैं- आपकी दयालुता से आपको आजतक क्या प्राप्त हुआ ? भीमसेन को विष दिया गया आपने क्षमा कर दिया…वारणावत में आपको जलाने का प्रयत्न किया गया फिर आपने क्षमा कर दिया। आपके क्षमा का क्या प्रतिफल मिला आपको? तब युधिष्ठिर उत्तर देते हैं – पांचाली मेरा कर्म एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें प्रतिफल की कोई इच्छा नहीं होती। देना मेरा कर्तव्य है इसलिए देता हूँ। मैं धर्म का फल पाने के लोभ में धर्मसम्मत आचरण नहीं करता। दया और क्षमा मनुष्य के उत्तम धर्म हैं।
आधुनिक भारतीय साहित्य में इस प्रकार के शाश्वत, उदात्त मूल्यों वाले विचारों द्वारा प्राण और जिजीविषा का सम्प्रेषण भारत देश और उसकी संस्कृति के लिए अत्यंत शुभ और सुखद लक्षण हैं। एक बार पुनः इस उपन्यास से लेखक श्री प्रताप नारायण को इस उत्कृष्ट सृजन हेतु बधाई और निरंतर उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए शुभाशीर्वाद।

