शक्ति हूँ, सौन्दर्य हूँ, हुँकार हूँ, संहार हूँ, नीर भी हूँ, नेह भी, वजूद भी, विश्वास भी, हाँ मैं नारी हूँ : श्वेता दीप्ति
डॉ.श्वेता दीप्ति
हाँ मैं नारी हूँ
वामा हूँ, जाया हूँ
औरत हूँ , प्रमदा हूँ
वनिता हूँ, मानिनी हूँ
माता हूँ और भगिनी भी
पत्नी और संगिनी भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
साथ हूँ पर कमजोर नहीं
अलग हूँ पर कुलटा नहीं
धरती हूँ, ग्रहीता हूँ
तुम्हें वहन करती हूँ
तुम्हें सहन करती हूँ
मैं सत्य हूँ, मैं सृष्टि भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
मैं चुप हूँ, धैर्य हूँ
कदापि तुम्हारी तरह
असंयमित नहीं
मैं भोग नहीं, मैं भोग्या नहीं
दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य हूँ
सुख हूँ, समृद्धि भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
इज्जत का लिबास पहनाकर
तुमने ही तार–तार किया
और कहा इज्जत मेरी लुटी
एक सवाल करुँ ?
हैवान तुम, वहशी तुम
असंयमित तुम, अधैर्य तुम
अशुद्ध तुम असामान्य तुम
फिर बेइज्जत मैं कैसे हुई ?
अब कोई अग्नि परीक्षा नहीं
अब कोई चीर हरण नहीं
मैं ईमान हूँ, इंसान हूँ
और खुद की पहचान भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
गलित नहीं, दलित नहीं
अशुद्ध नहीं शोषित नहीं
मैं वरदान हूँ, और मान भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
वह जो समाहित करती है
स्वयं में, तुम्हारा अधैर्य
तुम्हारा शक, तुम्हारा क्रोध
जो देती है अपने आँचल में
तुम्हारे हारे–थके मन को
प्रश्रय और शांति
तुम्हें जिन्दा रखा है
खुद को मार कर भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
पूर्ण हूँ, सम्पूर्ण हूँ
कमजोर नहीं, बेचारी नहीं
आधी नहीं अधूरी नहीं
स्वतंत्र हूँ, समर्थ हूँ
शक्ति हूँ, सौन्दर्य हूँ
हुँकार हूँ, संहार हूँ
नीर भी हूँ नेह भी
वजूद भी विश्वास भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
आँगन हूँ, घर हूँ
दर हूँ, दीवार हूँ
उमंग हूँ, बहार हूँ
सुकून और करार भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
गर्व हूँ, गरिमा हूँ
गहन हूँ, सहन हूँ
पूर्ति हूँ, पूरक हूँ
दिग् हूँ, दिगन्त हूँ
आदि हूँ, अन्त हूँ
सर्व हूँ, सर्वत्र भी
हाँ मैं नारी हूँ ।
सृष्टि का वरदान हूँ
क्योंकि मैं प्रकृति हूँ
आकार हूँ, साकार हूँ
प्राप्य हूँ, अप्राप्य हूँ
दान हूँ, प्रतिदान हूँ
भिन्न हूँ, अभिन्न हूँ
जगत हूँ और जहान भी
हाँ मैं नारी हूँ, सर्वमान्य हूँ ।


