निरुत्तर सीता : डॉ रजनी दुर्गेश
निरुत्तर सीता
धरा पुत्री सीता
सुनयना सुता सीता
छोड़ गयी हमें रीता।
क्यों निरूत्तर रही
क्यों अत्याचार सहा
जनक के त्याग और स्नेह का यही प्रतिकार दिया।
सुनयना के प्रेम का यही
उपहार दिया
बहनों के स्नेह का भी मान न दिया!
माना पति प्रेम में वनवास गईं
पति ने जब तुम्हें त्याग दिया
क्यों तुमने सभी को त्याग दिया?
हक़ के लिए क्यों न लड़ी
हक़ त्यागना क्या पाप न था?
लव कुश क्या राम के न थे
तुमने अकेले क्यों पालित किया
राजसुख से क्यों वंचित किया।
तुम त्याग देती राम को
लौट आती मिथिला धाम को
उत्तराधिकारी बनती जनक की
पुत्र बन कर्तव्य निभाती
मिथिला राज्य को चलाती
मायका को अपना घर बनाती
तब,आज मैथिलानी प्रताड़ित न होती
वह कदाचित् घर विहीन न होती
मेरे प्रश्नों का उत्तर मिल जाता
सीते! तुम निरूत्तर न होती।


