*हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद* : अजय तिवारी
आज संपूर्ण भारत कोरोना वायरस से त्रस्त है। अति विकसित व अविकसित सभी देश एक ही समस्या से जूझ रहे हैं।कोरोना संक्रमण के प्रभाव से कोई भी राष्ट्र अछूता नहीं है। भारत भी अपनी सामर्थ्य भर इस संकटकालीन असामयिक परिस्थिति से जूझ रहा है। विगत वर्ष इस संकट ने संसार को सोचने,समझने,सहने और सराहने का अवसर दिया कि हम कहांँ खड़े हैं और क्या कर रहे हैं तथा हमें क्या करना है ???
इस भयावह परिस्थिति ने सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक,पारिवारिक सभी क्षेत्रों पर कठोर प्रहार किया है।इस आपदा ने समस्त सांसारिक ढांँचे को ध्वस्त किया और हमें पुनश्च भविष्योन्मुखी चिंतन करने के लिए प्रेरित ही नहीं मजबूर भी किया है।इस चिंतन,मनन की प्रक्रिया में भारतीय परिस्थितियों को यदि केंद्र में रखकर देखा जाए तो पत्रकारिता का बहुत बड़ा उत्तरदायित्व परिलक्षित होता है।
आज वैश्विक स्तर पर प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया,सोशल मीडिया का प्रभुत्व दृष्टिगोचर होता है। कोई भी *प्रभुत्व तभी तक सुरक्षित रहता है जब तक वह निरपेक्ष भाव से अपने कर्तव्य का निर्वहन करे*।प्रिंट मीडिया,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का किसी भी देश में जनता का मार्गदर्शन करने के लिए निष्पक्ष एवं निर्भीक होना अत्यावश्यक है।देश की राजनीतिक,सामाजिक,सांस्कृतिक,आर्थिक गतिविधियों की सही तसवीर प्रस्तुत करना इनका कर्म ही नहीं धर्म भी है।
मीडिया जनसंचार का एक सशक्त माध्यम है।निष्पक्षता,निर्भीकता के साथ-साथ प्रामाणिकता के कारण इसकी विश्वसनीयता में तेजी से वृद्धि हुई है।विस्तृत रूप में देखें तो *मीडिया का कार्य लोकमत का निर्माण,सूचनाओं का प्रसार,भ्रष्टाचार एवं घोटालों का पर्दाफाश तथा समाज की सच्ची तसवीर प्रस्तुत करने* के लिए जाना जाता है। *मीडिया के अभाव में स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती है*।आम जनता भी अपनी समस्याओं से सभी को मीडिया के माध्यम से अवगत करा सकती है।
पत्रकारिता/मीडिया( प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक) भारतीय लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।इसकी महती भूमिका को किसी भी रुप-स्वरुप में अनदेखा नहीं किया जा सकता।आज मीडिया के रूप में चाहे समाचार पत्र हो या कोई भी टीवी चैनल अपनी शक्ति,सामर्थ्य प्रसार-प्रचार,अधिकार को बढ़ाने में कहीं सकारात्मक संस्कारों को तिलांजलि दे नकारात्मक विचारधारा से ओतप्रोत दिखते हैं। टीवी चैनल चाहे कोई भी हो 100 खबर देखें या 50,दस हों अथवा पांँच विशेष खबर अधिकता नकारात्मकता से ही भरी-पूरी खबरों की दिखती है।
समाचार पत्र पढ़ते व न्यूज़ चैनल पर खबरें देखते हुए मन व्यथित होता है। क्या हमारे देश में मात्र आगजनी,लूट,भारत बंद,बलात्कार,हत्या,आत्महत्या जैसी खबरें ही बची हैं जो नकारात्मकता से भरपूर हैं। यह खबरें पूरे मिर्च मसाले के साथ परोसी जा रही हैं।डॉक्टर,वकील ,शिक्षक,इंजीनियर,राजनेता,पुलिस,व्यापारी किसी भी वर्ग,धर्म,समुदाय की कोई एक भी कमी दिख जाए या मिल जाए तो प्रस्तुतिकरण इस तरह किया जाता है मानो पूरा समाज भ्रष्ट हो गया है।अब कहीं कुछ भी उन्नति, उत्थान, विकास की बात है ही नहीं। सकारात्मकता से परिपूर्ण ऊर्जावान,निष्ठावान अब इस देश में कोई बचा ही नहीं।
आइए अब आपको देश के वर्तमान हालात पर मीडिया में प्रस्तुत खबरों के ढंग का एक नमूना दिखाते हैं जो यह दर्शाता है कि हम क्या देख,समझ रहे हैं और क्या दिखा रहे हैं ???
*एम्स में फटा कोरोना बम, वेंटीलेटर पर अंतिम सांँसें गिनता देश,भरे हॉस्पिटल,परेशान परिजन,धधकती चिताएं,देश में नहीं बची ऑक्सीजन,दिल्ली में सांँसों की इमरजेंसी,ऑक्सीजन सिलेंडर की हुई लूट,डॉक्टर बने हैवान,दवाओं पर अंधाधुंध कालाबाजारी,ऑटो पर ले जाता कोरोना शव,कूड़ा गाड़ी में ले जाई जा रही लाशें,आहें भरता भारत,कराहता देश,चारों तरफ लगे लाशों के ढेर,शमशान में नहीं बची जगह,हर घंटे गिर रही सैकड़ों लाशें,शवों को जलाने वाली भटि्ठयाँ भी पिघली* आदि।
संक्रमण कालीन इस दौर में देश भयावह परिस्थिति से जूझ रहा है ऐसे में उपरिलिखित वाक्य विन्यास जो टीवी पर,अखबारों में प्रकाशित और प्रसारित किए जा रहे हैं।उन्हें देखकर,पढ़कर ऐसा लगता है मानो सब कुछ खत्म हो गया अब शेष कुछ नहीं बचा।मैं निवेदन करना चाहूंँगा अपने मीडिया कर्मियों से,पत्रकार बंधुओं से वह इस परिस्थिति में *आत्म बल से परिपूर्ण मरीजों का सकारात्मक साक्षात्कार दिखाएंँ* जो इस महामारी से जूझ कर स्वस्थ हुए हैं उस उजले पक्ष को दिखाएँ।भारत में लाखों मरीज स्वस्थ हुए हैं।कितने अवकाश प्राप्त चिकित्सक, पुलिसकर्मी,सेना कर्मी समाजसेवी जो निरंतर सेवा कार्य में लगे हैं उन्हें और उनके कार्यों को आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जाए तो लोगों में सकारात्मक संदेश प्रसारित होगा।कहांँ निशुल्क ऑक्सीजन दी जा रही है, कहाँ प्लाज्मा डोनर,स्वयंसेवक अपनी सेवाएं देने को तैयार हैं यह बताया जाए। बहुत सी कंपनियांँ, विभाग निशुल्क सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं उन्हें समर्पित नागरिक के रूप में दर्शाया जाए।कितने ही लोग इस विकट परिस्थिति में निस्वार्थ सेवा भावना से जुड़े हुए हैं उन्हें और उनके कार्य को महत्ता दी जाए।माना समाज में कुछ लोग भ्रष्ट हो सकते हैं,कालाबाजारी कर सकते हैं ,लूट मचा सकते हैं लेकिन पूरा समाज नहीं।
पत्रकारिता को अपना सकारात्मक पक्ष मजबूत बनाना चाहिए।अपनी टीआरपी,निहित स्वार्थ के वशीभूत या विज्ञापन द्वारा धनार्जन को केंद्र में रखकर नकार भावना की खबरों से बचना ही होगा।संपूर्ण समाज आशा भरी दृष्टि से मीडिया के कार्य व्यवहार को देखता है।खबर देखकर,पढ़कर या जानकर जागरूक होने की अपेक्षा जनमानस में भय व्याप्त होना या भयातुर करना कहीं से भी उचित नहीं है। *ICMR द्वारा सफदरजंग अस्पताल दिल्ली में करवाए गए सर्वे के अनुसार 78% मरीज कोरोना के भय से डिप्रेशन के शिकार हुए हैं*।
*मीडिया ने सदैव समाज का नेतृत्व किया है।अतीत में देखें तो पत्रकारिता ने देश में क्रांति खड़ी की है।देश की आजादी में मीडिया की सराहनीय ही नहीं अविस्मरणीय भूमिका रही है।सच दिखाना,बताना परम आवश्यक है परंतु भयावह सच जो नकारात्मकता को जन्म दे,मानसिक यंत्रणा दे,अवसाद और पीड़ा की ओर ले जाए उससे बचना और बचाना ही होगा।*
*हंगामा खड़ा करना पत्रकारिता का आधार नहीं हो सकता। आज के दौर में पूरा देश भयाक्रांत है*। ऐसी अवस्था में व्यवस्था का सकारात्मक पहलू अधिक उजागर किया जाना चाहिए। *अवस्था और व्यवस्था के तालमेल को सतर्क,सजग और सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।* इसी अपेक्षा,आशा और विश्वास के साथ……………
*कुछ ही दिन की बात है,फिर से खुशहाली आएगी ।*
*यह वीर भोग्या वसुंधरा, फिर हरी-भरी हो जाएगी।।*

वरिष्ठ शिक्षाविद
सामयिक लेखक,विचारक
प्रसिद्ध लोकोपकारक
राज्य शिक्षक सम्मान प्राप्त

