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सरकार स्वतंत्र लेखकों, पत्रकारों एवं कलाकारों का भी संज्ञान ले

 


(अरविंद कुमार सिंह) चुनाव में राजनेताओं को सबसे अधिक याद आते हैं लेखक, पत्रकार, लोक कलाकार। सरकारें भी उनकी काफी बात करती हैं। लेकिन कोविड-19 के दौरान इनमें से जो लोग स्वतंत्र तौर पर काम करते रहे हैं औऱ जिन पर आश्रित लोगों की संख्या बहुत बड़ी थी क्या किसी ने उनको याद किया। दिल्ली में अपने एक साथी पत्रकार को मैं जानता हूं जो हमारे दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं और स्वतंत्र पत्रकारिता से आजीविका चलती थी वे आज बुरी दशा में है। उनकी मदद की फाइल सरकार में एक साल से जूझ रही है। तमाम लोक कलाकारों का कामकाज एक साल से बंद पड़ा है। आनलाइन में कुछ मिलता नहीं है। इन श्रेणियों में जिनको रोजगार मिला था उनमें भी जाने कितने बेरोजगार हो गए हैं। मीडिया की दुनिया में इस बात की गणना होनी अभी बाकी है कि कितने बेरोजगार हुए। जब पब्लिक ब्राडकास्टर लोगोंं को बाहर कर रहे हैं तो बाकियों का क्या कहना। लेकिन कहीं भी सरकार ने इस बात की तरफ नहीं सोचा कि इनके लिए 20 लाख करोड़ के पैकेज मेंं से दो तीन करोड़ रख दिया जाये। इस बात का अंदाज करना भी मुश्किल है कि इसमें से कितने स्वाभिमानी लोगों ने भूख से दम तोड़ दिया हो या फिर दवाओं के अभाव में। अभी भी समय है कि इनकी तरफ भारत सरकार औऱ राज्य सरकारें ध्यान दें। स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन से जुड़े लोगों के साथ लोक कलाकारों और ऐसे अन्य तबकों के लिए हर माह एक सीमित अवधि के लिए 10 हजार रुपए महीने के एक सांकेतिक प्रावधान कर दें तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा।

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*अरविंद कुमार सिंह हिन्दुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं । जो पिछले चार दशकों से भी अधिक समय में हिंदी पत्रकारिता की अनेक विधाओं प्रिंट व इलैक्ट्रोनिक में सक्रिय रूप से निरंतर योगदान देते रहे हैं। अपने साथी पत्रकारों-लेखकों-कलाकारों के प्रति संवेदनशीलता उनकी लेखनी -व्यवहार में साफ झलकती है। इसी बिंदास अभिव्यक्ति या सरकारी तंत्र से की गई उक्त गुहार एकदम तरोताजा उदाहरण है।

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