पा सकूं कुछ पल सुकून के तेरी आँचल की छाया में, माँ बस तेरा आँचल चाहता हूँ : बसंत चौधरी
मातृ दिवस विशेष
माँ
माँ !
जिन्दगी की भाग–दौड़ में
किस मुकाम पर आ गया हूँ मैं
जहाँ नहीं है कहीं भी मेरे आसपास
तुम्हारी कोमल आवाज
नहीं सुन पा रहा तेरी लोरी की
मधुर स्वर–लहरी ।
माँ !
आजकल हो गया हूँ मैं आत्मकेंद्रित
इसीलिए तो अब कभी सपने में भी,
नहीं देख पाता तेरी ममता की छाँव
तेरी जीवन रस की बहती अमृतधार
माँ !
भुजाएं होने लगी हैं अब शिथिल
इसीलिए भर नहीं पाता
बाहों में तेरा अहसास
माँ !
मेरे पैर भी अब थकने लगे हैं
नहीं दौड़ पाता तत्परता से
इसीलिए यह पहुँचा नहीं पाते
मुझे तेरी छत्र–छाया तक
माँ !
थकना नहीं चाहता हूँ मैं
आज भी सतत जूझ रहा हूँ
जीवन चक्र से
किन्तु हर क्षण बस सोचता हूँ
पा सकूं कुछ पल सुकून के
तेरी आँचल की छाया में
भूल जाऊँ जीवन की हर
तप्त तीखे अनुभवों को
माँ बस तेरा आँचल चाहता हूँ ।


