राजनीति के खेल में कराहती जिन्दगी : डॉ. श्वेता दीप्ति
नेपाल में राजनीतिक संकट पिछले साल २० दिसंबर को तब शुरू हुआ जब राष्ट्रपति भंडारी ने प्रधानमंत्री ओली की अनुशंसा पर संसद को भंग कर ३० अप्रैल और १० मई को नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दिया था । ओली ने यह अनुशंसा सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में सत्ता को लेकर चल रही खींचतान के बीच की थी । ओली सरकार का संसद भंग करना असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक, सत्तावादी और प्रतिक्रियावादी था । यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था । ऐसे में बेहतर होता कि ओली प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देते और संसद को सुचारू रूप से चलाने का मार्ग प्रशस्त करते । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी, वह अपनी जिद पर अड़े रहे । सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत, अपनी पिछली संसद के विघटन को तथा मध्यावधि चुनाव पर जोर देते हुए लगातार उसे संवैधानिक कदम कहते रहे हैं जबकि उनकी यह पूरी प्रक्रिया संविधान की भावना के खिलाफ थी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भी अवहेलना करती थी ।
प्रधानमंत्री ओली द्वारा अपनाई गई पूरी प्रक्रिया से यह समझना मुश्किल नहीं है कि, वह अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और सत्ता के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करने के साथ अपनी सभी नीतियों और गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं न कि देश और जनता के व्यापक हितों की उपलब्धियों को ध्यान में रख कर । उनकी यह कार्यशैली देश को कहां ले जाएगी फिलहाल इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है ।
हालाँकि पिछले समय में नेपाल की राजनीति ने यह बता दिया है कि, यहाँ की राजनीति जनता के लिए नहीं है बल्कि, यह उन चंद राजनेताओं के लिए है, जिनके स्वार्थ सिद्धि की सीढ़ी यह बनती रही है । विश्व महामारी से जूझ रहा है, नेपाल की स्थिति भी हमारे सामने है जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत से बदतर नेपाल की स्थिति का आकलन विशेषज्ञ कर रहे हैं । नेपाल के पास इस महामारी से लड़ने के लिए, जनता की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए संसाधनों की कमी है, चारो ओर हाहाकार मचा हुआ है । मौत का तांडव अपना क्रुर रूप दिखा रहा है । परन्तु हमारे राजनेता कुर्सी की लड़ाई और खींचातानी में व्यस्त हैं । यह परिदृश्य आगे भी जारी रहने वाला है यह स्पष्ट है ।
पिछले कई महीने से वर्तमान प्रधानमंत्री के पी ओली को कुर्सी से उतारने के लिए उनके सहयोगी दल लगातार प्रयत्नशील हैं । शायद इसके अलावा उनके पास कोई काम ही नहीं है । हर बार कोशिश होती है और फिर एक नाटकीय परिदृश्य के साथ ओली जी की कुर्सी बच जाती है । इस बार भी यही हुआ । विपक्ष भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री ओली राजनीति के मंजे हुए और चालाक खिलाड़ी हैं । और यह लगातार सिद्ध हो रहा है । विश्वास मत प्राप्त करने का उनका निर्णय किसी क्षणिक सोच का परिणाम नहीं था । यह निर्णय पूरी जोड़–तोड़ और आँकड़ों के गणित के हिसाब के साथ लिया गया था । और उनकी दूरगामी सोच का परिणाम यह है कि पदमुक्त होने के तीन दिन के भीतर ही वो पुनः तीसरी बार प्रधानमंत्री का पद संभाल रहे हैं ।
केपी शर्मा ओली बेशक विश्वास मत हार गए थे, उन्हें सिर्फ ९३ सांसदों का साथ मिला लेकिन उनके सामने नेपाल की संसदीय स्थिति का खाका भी साफ था और वो अपने विरोधियों की ताकत के बारे में भी जानते थे । ऐसा नहीं है कि ओली पहले से जीत के लिए आश्वस्त थे, तभी विश्वास प्रस्ताव लेकर आए, करीब डेढ़ महीने पहले नेपाली सुप्रीम कोर्ट की संसद बहाली के आदेश–निर्देश के बाद ही वो समझ गए थे कि यह राह आसान नहीं है । प्रधानमंत्री पद पर बने रहना मुश्किल किन्तु उन्होंने अंकगणित का गम्भीरता से जायजा लिया और संविधान की धाराओं को बारीकी से समझने और परामर्श के बाद अपनी राह चुनी । वो जानते थे कि विपक्ष के लिए भी सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत जुटाना आसान नहीं होगा । मधेशी दलों को वो पहले ही दाना डाल चुके थे ।
पिछले एक महीने में उन्होंने मधेशी मुद्दों का हवाला और उसे समाधान करने का मौसमी वादा करते रहे और मधेशी दलों को अपने खेमे में लाने में सफल रहे । यह और बात है कि जसपा में इस विषय पर अन्तर्विरोध कायम रहा परिणामस्वरूप जसपा का एक खेमा तटस्थ रहा तो दूसरा काँग्रेस, माओवादी के साथ खड़ा हो गया । हालात ये बने कि राष्ट्रपति द्वारा सरकार बनाने के लिए दिए गए तीन दिन की अवधि में भी विपक्ष सरकार बनाने का दावा पेश नहीं कर पाई और एक बार फिर से कार्यवाहक प्रधानमंत्री के पी ओली सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते प्रधानमंत्रीपद की जिम्मेदारी संभाल ली ।। और अब वो कम से कम ६ महीने के लिए निश्चिंत हो गए । इतना वक्त उनके लिए काफी है जब वो अपने मनोनुकूल परिस्थिति बना सकते हैं । विश्वासमत हारने के बाद भी ओली काफी हद तक निश्चिंत नजर आ रहे थे क्योंकि कमोवेश वो परिणाम जान रहे थे । नेपाल पक्ष को अपने साथ लेने की लगातार उनकी कोशिश जारी रही और इसका रंग अंतिम समय में दिख ही गया । वैसे देखा जाए तो प्रधानमंत्री ओली शुरु से ही मध्यावधि चुनाव के पक्ष में प्रयत्नशील हैं । अगर दूसरी बार भी वो विश्वासमत प्राप्त नहीं करते हैं तो देश चुनाव की दिशा में जा चुका होगा ।
महत्त्वाकांक्षी के पी ओली के लिए उनके राजनीतिक सफर में तत्कालीन अधिनायकवादी पंचायत व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन में शामिल होना टर्निंग प्वाइंट माना जाता है । उनके अन्दर की ललक और आग को तत्कालीन राजशाही ने पहचान लिया था और यही वजह थी कि उन्हें मोहरे के तौर पर पंचायत व्यवस्था के खिलाफ लड़ने वाले चेहरे के तौर पर नेपाल की राजनीति में पेश किया गया था । यह उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत थी । ओली ने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी और खुद को कम्युनिस्ट आंदोलन का हिस्सा बना लिया था ।
सभी जानते हैं कि चीन उनके लिए तब से ही आदर्श रहा है । ७० के दशक में भारत समेत कई एशियाई देशों में कम्युनिस्ट आंदोलन उफान पर था । नेपाल में भी कम्युनिस्ट पार्टी राजशाही के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत कर चुकी थी, पंचायती व्यवस्था के अधिनायकवादी चेहरे के भी खिलाफ आवाज उठ रही थी और लोकतंत्र की मांग तेज होने लगी थी । भूमिगत तौर पर ओली बेहद सक्रिय थे और १९७४ में झापा विद्रोह की उन्होंने अगुवाई की थी । जमींदारों के खिलाफ भूमिहीनों के इस आंदोलन में जिले के कई जमींदारों का सिर काटकर हत्या की गई थी । इन्हीं आरोपों के तहत ओली को जेल जाना पड़ा । जेल में उन्होंने कम्युनिस्ट साहित्य पढ़ा और नेपाल की सियासत कई उतार चढ़ाव देखे । यह समय उनके राजनीतिज्ञ के रूप में मँजने का था, सियासी दाँवपेच सीखने का था । वाक्पटुता तो इनका प्रमुख गुण है जिसका रसास्वाद नेपाल की जनता समय–समय पर करती आई है ।
वो दौर था जब एक लम्बे संघर्ष के बाद अस्सी–नब्बे के दशक में ओली पूरी तरह से नेपाल की राजनीति में अहम चेहरा बन गए थे । सीपीएन–यूएमएल के अहम नेता के तौर पर स्थापित हुए । राजनीतिक तोहफे के तौर पर कोइराला सरकार में उप–प्रधानमंत्री भी रहे । उनकी व्यक्तिगत पहचान उनका अति आत्मविश्वास और अपनी कार्यशैली को लेकर उनकी जिद हमेशा से रही है । एक जिद्दी और अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी नेता के तौर पर उन्हें जाना जाता है । कुछ समय पूर्व जिस प्रचंड से उन्होंने हाथ मिलाया था, उनसे उनकी वैचारिक असहमति हमेशा से रही । बावजूद इसके नेपाल में काँग्रेस की नींव को हिलाने के लिए और उसके वर्चस्व का समाप्त करने के लिए नदी के दो किनारों ने मिलने का प्रयास किया जिसके फलस्वरूप कम्युनिस्ट पार्टी के एकीकरण का खेल २०१७ में खेला गया । परन्तु यह खेल लम्बे समय तक नहीं चला और परिणामस्वरूप आज का परिदृश्य नेपाल की जनता के समक्ष है । दाहल और ओली की वैचारिक जंग ने नेपाल की सियासत में पिछले करीब दो साल से एक भूचाल ला दिया है जब वादे के अनुसार ओली ने सत्ता प्रचंड को नहीं सौंपी और ओली के अडि़यल रवैये ने यहाँ की राजनीति की पूरी तस्वीर बदल दी । पार्टी को फिर से टुकड़ों में बांट दिया और जनता को दरकिनार कर इस भयानक कोरोना काल में सत्ता की इस घिनौनी जंग ने पूरी दुनिया के सामने दोनों नेताओं की सत्तालोलुपता का पर्दाफाश कर दिया ।
प्रचंड हर कदम पर चुनौतियां खड़ी करते हैं पर हर बार मुँह की खा रहे हैं, उनके हर दाँव का तोड़ ओली निकाल ले रहे हैं । शायद प्रचण्ड को माधव नेपाल के भरोसे पर राजनीति की नाव पार लगाने का अनुमान गलत सिद्ध हो रहा है । ओली की चतुराई को कम आँकना प्रचण्ड की भूल साबित हो रही है । सत्ता को कैसे खींचना है, कैसे मनमानी चलानी है और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कैसे कुर्सी पर बने रहना है, इस खेल में ओली का कोई मुकाबला नहीं । खैर एक बार फिर कुर्सी की राजनीति में ओली जीत चुके हैं । जनता का भरोसा तो बहुत पहले खण्डित हो चुका है, परन्तु जनता जाएगी कहाँ ? मौत सामने है और जनता निवाला बन रही है । इस महामारी में बस एक ही अनुरोध जनता का है कि बस बहुत हुआ, अब तो राजनीति से हटकर कराहती और तड़पती जिन्दगी पर ध्यान दें महामहिम क्योंकि हम मर रहे हैं ।

