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अंतरराष्ट्रीय पितृ दिवस पर सभी पिताओं को समर्पित : मुकेश भटनागर

 

अग्नि में तप के सोना, है और भी निखरता
पिता के तप से परिवार, है और भी संवरता

मुकेश भटनागर । शुभांगी रोज़ अपने स्कूल जाया करती थी। उसके गांव से स्कूल 4-5 किलोमीटर की दूरी पर था। फिर भी उसे स्कूल जाना बहुत अच्छा लगता। जब वह बहुत छोटी थी तो उसके पिता साइकल पर बैठा कर उसे स्कूल छोड़ आते दोपहर में छुट्टी के बाद उसके दादा जी उसे बैलगाड़ी में बैठाकर वापस घर ले आते। जब शुभांगी छठी कक्षा में आई तो उसने अकेले स्कूल जाने-आने का फैसला लिया। उसके इस फैसले को सबने सराहा और उसे जाने की इजाजत दे दी। वह अपनी सहेलियों के संग जाया करती। लम्बा रस्ता हंसते खेलते मस्ती में बीत जाता। पढ़ाई में तो वह होशियार थी पर साथ साथ अपने चारों तरफ़ का भी ध्यान रखती, कहीं से भी कुछ भी सीखने की लालसा उसमें हमेशा बनी रहती। धर में भी वह यथासंभव अपनी अम्मा का हाथ बंटाती और सबका कहना मानती। उसे अपने दादा से कहानी सुनने का बहुत शौक था। दादा जी की कहानियां बहुत व्यवहारिक और गुणकारी होती थी। वह उनका मनन करती और अपनी सहेलियों को भी सुनाती। इस प्रकार स्कूल के पूरे रास्ते, कभी स्कूल की तो कभी पढ़ाई की, कभी दादा-दादियों की कहानी सुनते सुनाते सब जाते। समय कब बीत जाता पता ही नहीं चलता।

शुभांगी अब दसवीं कक्षा में पहुंच चुकी थी। वह समझदार और बढ़ी भी हो गई थी। काबिलियत के कारण वह अपनी कक्षा की मोनिटर और स्कूल की ‘हैड गर्ल’ भी नियुक्त हो गई।

एक दिन की बात है उसे किसी कार्य वश स्कूल में देरी हो गई। उस दिन उसे अकेले घर आना पड़ा। रास्ते में गर्मी बहुत थी तो कुछ देर के लिए एक पेड़ नीचे आ कर खड़ी हो गई। अभी वह सुस्ता ही रही थी कि अचानक उसने एक आवाज़ सुनी। वह आवाज़ उसको, उसका नाम ले कर पुकार रही थी। वह चौंक गई ! उसे आस पास कोई दिखाई नहीं दिया, फिर यह आवाज़ कैसी! उसने मन ही मन सोचा कोई भूत प्रेत तो नहीं आ गया जो मेरा नाम भी जानता है। इस पेड़ को तो बचपन से मैंने बड़ा होते देखा है । पूरे रास्ते में यही तो एक अकेला वट वृक्ष है जो हमेशा से कितना शांत दिखता है पर मजबूती से खड़ा है। हरे भरे लहलहाते खेतों में वह और भी मनोहर लगता है। तभी वहीं आवाज़ फिर सुनाई पड़ी – “शुभांगी – डरो मत मैं तुम्हारा दोस्त वट वृक्ष हूं, जिसके नीचे तुम खड़ी हो।” शुभांगी की जान में जान आई, उसकी हिम्मत बढ़ गई और दोनों में वार्तालाप शुरू हो गया।

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वट वृक्ष बोला – “मैं तुम्हें तब से जानता हूं जब से तुम साइकल पर अपने पिता के साथ स्कूल जाया करती थी। मैं तुम लोगों की सब बातें सुनता । जब तुम अकेले स्कूल जाने लगी तब मैं तुम सब पर, पिता समान नज़र रखता था बोलता कुछ नहीं था पर ध्यान पूरा रखता। बहुत दिनों से इच्छा थी तुम कभी मेरे पास आओ और मुझसे बात करो। आज भगवान ने मेरी सुन ली – तुम्हें अपने पास देख कर मैं बहुत खुश हूं।” पेड़ आगे बोला – “कितने राहगीर इस रस्ते से गुजरें, मेरी छाया में विश्राम किया और आगे चल दिए। इतने वर्षों मे न जाने कितने पक्षियों ने मुझ पर घौंसले बनायें, अण्डे दिए, अपने बच्चों को बड़ा किया और आशियाना छोड़ कर उड़ गए। आंधी तुफान हो या अंधेरी रात मैं अपनी जगह से कभी नहीं डिगा। मैं इस धरती का अहम् हिस्सा हूं लोग मुझे पर्यावरण का मुखियां कहते हैं पर मैं सब को साथ लेकर चलता हूं। कभी अपने पर गुमान नहीं करता। वायु, जल, सुर्य की किरणें मेरी ताक़त है।”

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शुभांगी की जिज्ञासा बढ़ी उसने भी पेड़ से कुछ सवाल पूछने की हिम्मत जुटाई। शुभांगी ने पूछा – “वट महाराज आप में मुझे अपने पिता दिखते है। वह भी शान्त स्वभाव के दिखते है, परिवार में सब के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं। अपने लिए कुछ नहीं मांगते सब को हमेशा कुछ देते रहते है।” शुभांगी ने फिर एक अहम् सवाल पूछा – “तुम एक तरफ से इतने हरे भरे हो पर दूसरी तरफ एक भी पत्ता नहीं दिखाई देता केवल टहनियां ही टहनियां है, ऐसा क्यों ?

वट वृक्ष बोला तुमने अच्छा सवाल पूछा, अब मेरी बात ध्यान से सुनो -“मुझे अपने पिता से तुलना कर के तुमने मेरा मान बढ़ाया। जिस प्रकार पर्यावरण के संगी जैसे जल, वायु, किरणें, मिट्टी में पड़ा बीज अदृश्य हो कर भी मेरा पोषण करतें हैं ऐसे ही उनके सभी गुण तुम्हारे पिता में विद्यमान है वह पूरे परिवार का आजीवन पोषण करतें हैं। यह जो बिना पत्तों की टहनियां हो गई यह मेरा शरीर का वो भाग है जिस पर छोटे बच्चे लटक कर झूलते हैं जैसे बचपन में तुम अपनी पिता की बाहों में झूलती थी।समझने की असली बात यह है त्याग के बिना कुछ भी हासिल नहीं होता जैसे तुम्हारे पिता ने त्याग ओर तपस्या से परिवार को सुन्दर सलोना बनाते हैं। अपने को भूलकर, सूर्य की तपिश की परवाह न करते हुए वे हमेशा सब के लिए फल और खुशहाली देते रहते हैं।”

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अचानक शुभांगी की आंख खुली, अपने सामने पिता को देखती है और उनकी बाहों में झूल जाती है उसकी आंखों में आंसुओं की झड़ी लग जाती है। पिता कहते है शुभांगी बेटे अब तुम बड़ी हो गई हो स्कूल को देरी हो रही है। जल्दी उठों और तैयार हो जाओ।

स्कूल जाते हुए उसने उसी वटवृक्ष को बड़ी करूणा भरी नज़रों से देखा और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गई। उसे वृक्षों की अहमियत और पिता की असलियत का आभास हो चुका था।

वर्षों बीत गए शुभांगी का विवाह हो गया वह विदेश में जाकर बस गई। जब भी वह कोई पेड़ देखती उसे उसमें अपने पिता की छवि दिखती। हमेशा किसी न किसी को कुछ देने वाला बिना कुछ अपेक्षा किए हुए।

सदा याद रखें पिता के कारण ही तो स्त्री मां बनती है। पिता से ही तो परिवार को पता मिलता है। पिता ही तो उस छतरी की छड़ी है जिसके कारण परिवार के ताने बाने जुड़े हुए हैं। कभी इस छतरी की छड़ी को कांपते हाथों की लाठी मत बनने देना।

मुकेश भटनागर*
*वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं समाज सेवी*
*दिल्ली, भारत से*

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