नारी के विभिन्न रूप : सुलोचना धनावत

(छ.ग.)
आज के समय में नारी के कई रूप कई स्थितियाँ सामने आरही है।कहीं नारी का बेचारगी का रूप है तो कहीं विकराल,सोम्यता,असहिष्णुता।कहीं सास-बहू माँ-बेटी के स्वरुप में उभर कर आरही है तो कहीं आपसी ताल-मेल बिल्कुल नहीं है ।पति-पत्नी मेंआपसी सामंजस्य नहीं है ।परिवार बिखरते जा रहे हैं । हर तरफ आपसी समझदारी लुप्त हो रही है ।
हर तरफ प्राय: एक ही आवाज उठ रही है कि ससुराल में लड़कियों पर अत्याचार हो रहा है ,परन्तु कहीं से ये आवाज नही आती की किस तरह बहु सास-ससुर परिवार वालों के साथ कैसा व्यवहार कर रही है । उम्र की सीढिय़ां लाँघते साठ साल की उम्र पार करते हुए बुजुर्ग किस तरह की मनोस्थिति में और तकलीफ में जी रहे हैं इसका अन्दाजा लगाना मुश्किल है।
पहले जैसी शक्ति ना तन में है ना मन में है ,फिर भी बेटे की गृहस्थी बचाने के लिये हर हालात में सहन करते हैं। ना घर छोड़ सकने की स्थिति ना रह सकने की स्थिति ।अच्छे-अच्छे घरों के बुजुर्ग जो कल तक जागरुक,कर्मठ,संगठित रहे हुए हैं ,अब हर हाल में चुप रहकर सब सहने को मजबुर है। बहुत तकलीफ की बात है यह ।
क्या पहले भी नारी का यही रूप था ?आज पढ़ी-लिखी महिलाओं को जहाँ अपने अन्दर सोम्यता लानी चाहिये ।उसकी जगह कुछ स्त्रियाँ स्वभाव से उग्र,हो रही हैं,उच्छृंखलता,उदण्डता की ओर जा रही है।इसे वो अपनी स्वतन्त्रता मानती है।वो यह नही समझ पारही है कि हमारे इस तरह के व्यवहार से पुरानी पीढ़ी तकलीफ पा रही है,नई
पीढ़ी बिगड़ रही है।

