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नेपाल की आदर्श रहित राजनीति : अजय कुमार झा

 
           देश की एकमात्र सबसे वरिष्ठ लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में सम्मानित नेपाली कांग्रेस अपनी 14 वी महाधिवेशन रूपी राजनीतिक महायज्ञ को संपन्न करने जा रही है।
वर्तमान में नेपाल के सभी संचार माध्यमों के सर्वाधिक आकर्षण का विषय भी बनी हुई है।
     राणाशासन समाप्ति के पश्चात २००७ साल से अब तक देश के शासनसत्ता को कोइराला परिवार ने अपने कब्जा में रखा है। कृष्णप्रसाद कोइराला के तीन पुत्र, मातृकाप्रसाद कोइराला, बिपी कोइराला और गिरिजाप्रसाद कोइराला प्रधानमन्त्री हुए। बिपी के बड़ा पुत्र प्रकाश कोइराला वंशाधिकार के कारण मन्त्री बने, शेखर कोइराला, शशांक कोइराला और सुजाता कोइराला के साथ ही चौथी पीढ़ी के सिद्धार्थ कोइराला भी राजनीति में सक्रिय हो गए हैं। इधर कांग्रेस के वरिष्ठ तथा विशुद्ध त्यागी नेताओं को अब कोइराला के चौथे पीढ़ी का निर्देशन मानने के लिए सज्ज होने की स्थिति बन रही है। उधर भरतशमशेर राणा, भूविक्रम नेम्वाङ , महेंद्र नारायण निधि के उत्तराधिकारी भी अपनी वंशाधिकर को सक्रिय किए हुए है। गणेशमान सिंह और उनकी पत्नी मंगलादेवी सिंह सक्रिय राजनीतिक भूमिका निर्वाह किए तो उनका पुत्र प्रकाशमान सिंह आज भी क्रियाशील हैं। साथही पीएल सिंह भी उसी परिवार से आते हैं। इसी तरह  शेरबहादुर देउवा और उनकी पत्नी आरजु राणा विगत में सांसद हो चुकी हैं। कांग्रेस नेता डा. रामशरण महत, प्रकाशशरण महत के परिवार, अर्जुननरसिंह केसी के परिवार सशक्त पारिवारिक राजनीति के उदाहरण है। ए तो केंद्रीय स्तर का उदाहरण है। जिला स्तर के बारे में तो कल्पना भी नहीं किया जा सकता की इस वंशवाद के चक्रव्यूह में कितने महान आत्माओं के त्याग, तपस्या, परिश्रम, चरित्र और योगदानों की बलि चढ़ा दी गई होगी। वैसे पार्टी के वर्तमान अवस्था को देखते हुए इतना तो साफ जाहिर होता है कि उन ईमानदार, सक्रिय, जुझारू और संस्कारवान नेता कार्यकर्ताओं के साथ किया गया दुर्व्यवहारों का ही प्रतिफलन है।
     वह ऐतिहासिक पार्टी, जिसने जहानियाँ राणाशासन और राजतंत्र (परिवारवाद) का अन्त्य करने और प्रजातन्त्र की स्थापना हेतु सफल वैचारिक और सशस्त्र  क्रान्ति कर एक उच्च राजनैतिक आदर्श को स्थापित किया था, आज खुद परिवारवाद तथा गुट उपगुटवाद के दलदल में धंसते जा रहा है। निरंकुशता के विरुद्ध शंखनाद करने वाला खुद ही जहानियां निरंकुशता का शिकार हो जाना उसके वैचारिक आधारभूमि से पतन होने का प्रमाण है। जो कि देश, कार्यकर्ता और पार्टी तीनों के अहित में है। संभवतः नेपाली कांग्रेस में वैचारिक व्यक्तित्व और निष्पक्ष समर्थकों का किनारा लगने के पीछे इन्हीं तत्वों का हाथ होना चाहिए।
     कांग्रेस के आगामी १४ वाँ महाधिवेशन में उपसभापति विमलेन्द्र निधि, महामन्त्री डा. शशांक कोइराला और पूर्वमहामन्त्री प्रकाशमान सिंह के संयुक्त सक्रियता को विशेष महत्व के साथ देखा जाना स्वाभाविक ही है। लेकिन इन तीनों के राजनीतिक धरातल पैतृक है। व्यक्तिगत नहीं; और विरासत मिले संपत्ति तथा सम्मान का कोई मूल्य नहीं होता जिसका प्रमाण महाभारत में दुर्योधन और अश्वत्थामा के चरित्र से लिया जा सकता है। वि पि कोइराला के साथ राजनीति में सक्रिय रहे व्यक्ति के प्रति जितना भरोसा और विश्वास उनको हो सकता था उनके संतानों में उससे कम ही होगा। अतः अब जबकि कांग्रेस तीसरे और चौथे पुस्ता के हाथों में जानेवाला है, तो बचे खुचे प्रथम और दूसरे पुस्ता के कार्यकर्ताओं को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने हेतु गंभीर होना चाहिए। यह आज के समय की मांग है।
     नेपाली कांग्रेस पार्टी के लिए व्यक्तिगत योगदान और क्षमता में  डा.अमरेश कुमार सिंह , गगन थापा और शशांक कोइराला के बीच तुलना की जाय तो  डा.अमरेश कुमार सिंह  और गगन थापा आगे हैं, परंतु साशांक कोइराला वंश के नाम पर महामंत्री में सहज ही निर्वाचित हो जाते हैं, वही गगन थापा बुरी तरह हार जाते हैं। यही पारिवारिक मनोविज्ञान का दुष्परिणाम है। और यह मनोविज्ञान हमें कब गुलामी के जंजीरों में जकड़ लेता है हमें पता ही नहीं चलता। विक्रम संवत 2052 में जब मैं अपने त्रिभुवन विश्वविद्यालय के साथियों के साथ निवेदन अर्पण हेतु गिरिजा बाबू से मिलने गया तो, वहां के दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित हो गया था। जिला स्तर में दबदबा रखने वाले नेताओं को गिरिजा बाबू के प्रांगण में राणा के चाकड़िया के तरह दुम हिलाते देख मन खिन्न हो गया, और एक प्रकार का नकारात्मक भाव ने भी घेर लिया। मन ही मन एक राजा के गुलामी के बदले अनेकों दूसरे नेताओं की गुलामी के महाजाल में  फसता हुआ दिखाई देने लगा। और आज कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को खुद भी महसूस होने लगा है।
     ध्यान रहे! परिवारवाद का पोषण और संरक्षण राजतंत्र के नवीनतम स्वरूप को स्वीकार करना है।
कोइराला परिवार नेपाली कांग्रेस को फिर से अपनी मुठ्ठी में लेना चाहता है। और इसके लिए विपी पुत्र डा.शशांक कोइराला, गिरिजापुत्री सुुजाता कोइराला तथा डा.शेखर कोइराला इन तीनों के बीच एक दीर्घकालीन आंतरिक समझदारी जरूर कायम हुआ होगा क्योंकि इसके बिना पार्टी का नेतृत्व असंभव है। और अगर ऐसा है, तो गगन थापा, डा.अमरेश कुमार सिंह और विश्वप्रकाश जैसे असंख्य पितृ सत्ता से दूर युवाओं को नेतृत्व पंक्ति से खुद ही दूर हो जाने में ही बुद्धिमानी है। क्योंकि कार्यकर्ताओं के मनोविज्ञान में परिवारवाद प्रति के आस्था अदृश्य रूप से हावी है। जिसको निर्मूल करने के लिए भीषण वैचारिक क्रांति और त्याग की आवश्यकता है। कुछ वरिष्ठ नेताओं को फिर से त्याग करना होगा। कृष्णप्रसाद भट्टराई के जैसे फिर से वंशवादियों के विरुद्ध एकजुट होना होगा। पार्टी के विधान में आमूल परिवर्तन करना होगा। पार्टी अध्यक्ष और संसदीय दल के नेता के हक में सिर्फ एक बार ही अधिकार सुरक्षित करना होगा। जनजाति, मधेसी और महिला के लिए सर्वोच्च पद तक का अधिकार सुनिश्चित करना होगा। तब जाकर यह लोकतांत्रिक पार्टी के रूप में नेपाल ही नही विश्वमंच पर देदीप्यमान लगेगा।
      जरा ध्यान से देखिए तो पता चलेगा कि नेपाल में राजतन्त्र अर्थात राजा के वंश को राजनीति से निकाल दिया लेकिन हजारों छोटे राजाओं का वंश स्थापित होने लगा है। परिवारवादी राजनीति के प्रमाण में  कृष्णप्रसाद कोइराला के तीन पुत्र मातृकाप्रसाद कोइराला, बीपी कोइराला और गिरिजाप्रसाद कोइराला प्रधानमन्त्री हुए। नेपाली राजनीति के संदर्भ में अत्यधिक आश्चर्य तब होता है जब एक सर्वहारा का पार्टी खुदको राजा के रूप में प्रस्तुत करने के लिए सभी जिर्लज्जता को पर कर जाता है।
वंशीय राजनीति में साम्यवादी पार्टी के पुष्पलाल की पत्नी सहाना प्रधान,
मदन भण्डारीकी पत्नी वर्तमान राष्ट्रपति विद्या भंडारी, पुष्पकमल दाहाल की तो पूरा परिवार ही राजनीति में सत्तासीन है। उधर डा. बाबुराम भट्टराई और पत्नी हिसिला यमी नेपाली राजनीति में अपना अलग ही अस्तित्व रखते हैं।
     इसीतरह मधेशी नेता भी अपनी अपनी वंश को नेपाली और मधेसी राजनिति में दबंग पकड़ बनाने के लिए पूरी तरह सक्रिय दिख रहे हैं। जसपा के नेता अनिल झा द्वारा अपनी पत्नी डिम्पल झा को समानुपातिक कोटा से प्रदेश २ के सांसद और भौतिक पूर्वाधार राज्यमन्त्री बनाना। दूसरे संविधानसभा निर्वााचन में पराजित होने पर समानुपातिक खाते से पत्नी डिंपल झा को सांसद बनाना। राजेन्द्र महतो और राजकिशोर यादव समानुपातिक खाते से अपनी अपनी पत्नी को सांसद बनाए थे। इन लोगों को अन्य कार्यकर्ता में अपनापन अथवा नेपालीपन नहीं दिखा था न दिख रहा है।
      कांग्रेस के पिछले तीन दशक के पार्टी सत्ता और राज्य सत्ता का मूल्यांकन किया जाय तो बस वही 12 से 15 लोग ही मिलेंगे, जो कोइराला और देउवा के शरणागत रहे हैं। जबकि इस तीस वर्ष में अमेरिका और भारत में राजनीति के पूरे चक्र ही बदल गए। परंतु हम गुलाम मानसिकता से पोषित नेपाली इस पर संवाद भी करना नही चाहते कि जो देउवा 2052 में प्रधानमंत्री बने थे, आज 2078 में भी वही दावेदारी कर रहे हैं। और पार्टी के लोग ताली बजा रहा है। इस तीस वर्ष में दो युवा पीढ़ी बृद्धावस्था को पार कर चुका, 2052 में जन्मे बच्चा आज 26 वर्षका युवा हो चुका है। लेकिन जंग बहादुर राणा के पदचिन्हों पर चलनेवाला कांग्रेस में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता।
      कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने राजनीति को अपना पैतृक पेशा बना रखा है। यही इसका दुर्भाग्य भी है। क्योंकि युवाओं को आकर्षित करने का क्षमता ही नहीं रहा अब। नेपाली युवा इन सड़ेगले भ्रष्ट विचारहीन के पीछे अपना जीवन गवाने को तैयार ही नहीं है। जहां विकास के लिए अवसर ही न हो वहां सक्रिय चेतना कैसे आकर्षित हो सकती है! आज अगर देउवा जी फिर से प्रधानमंत्री बनते हैं तो आम लोग भी बता देंगे की कौन कौन मंत्री बनेगा और किसको कहां स्थान मिलेगा। यह वैचारिक और व्यावहारिक रूप से लकवा की ओर संकेत करता है।
      शकुनियों के निर्देशन और दुर्योधनों के हाथोंमें सत्ता हो, तो सभ्य और ईमानदारों को बलि चढ़ाना पड़ता है। और विरोध करने पर गणेश मान जी और भट्टराई जी के तरह उन्हें बलि चढ़ाने में ए लोग तत्पर रहते हैं। क्योंकि उन्हें नैतिकवान और विचारवान व्यक्तित्व से कुछ लेना देना नही रहता है। इन्हे, नेता नही; इनके इशारों पर नाचने वाले गुलाम कार्यकर्ता चाहिए, जो की अब भारी मात्रा में सहज ही उपलब्ध है। और इन गुलाम कार्यकर्ताओं का सामना करना किसी भी आत्मस्वाभिमानी कार्यकर्ता तथा नेताओं के लिए मृत्यु से भी अधिक कष्टकारक होता है।
      हरेक क्रांति के पश्चात मौलिक विचारधारा को जनता के द्वारा खुलकर एकबार समर्थन दिया जाता रहा है। ता की वह अपने विचारधारा को व्यवहार में ला कर जनता के जीवन तथा समाज और राष्ट्र को उन्नति के पथ पर ले जाने में सफल हो सके। यह काम जनता करती है; यह दायित्व भी जनता का है। नेपाल के संदर्भ में कांग्रेस, एमाले, माओवादी और राजावादी सभी को यह अवसर प्रदान किया गया है। लेकिन पंचायती शासन के वाद आजतक किसी पार्टी और नेता ने पांच वर्ष व्यवस्थित सरकार चलाने की क्षमता प्रदर्शन नही कर पाया। इससे साफ जाहिर होता है की हमारे राजनीति कर्मी बुद्धिमान भी नहीं है, प्रज्ञावन होना तो दूर की बात है। संभवतः शकुनी, दु:शासन, दुर्योधन और भीम से ऊपर के समझवाले राजनेता नेपाल के मिट्टी ने पैदा करना छोड़ दिया है।
         आकंठ भ्रष्टाचार और निर्लज्ज कमीशनखोरी में डूबे उन्हें लगता ही नहीं कैंसर और हार्ट अटैक जैसे रोग षडयंत्रकारियों के लिए ही आविष्कार हुआ है। युवाओं में इन के प्रति घृणा और वितृष्णा की स्थिति ऐसी सृजना हो रही है की ऐसे लोगों को अब मरने के वाद भी लोग अभद्र शब्दों से श्रद्धांजलि देने में नही हिचकते। भविष्य में न कोई हमारे लिए आदर्श पुरुष बचेगा और न कोई प्रेरक पुरुष। न किसी शहीद के प्रति युवाओं के हृदय में कोई सम्मान बचेगा और किसी विभूतियों के प्रति श्रद्धा। और इसका दोषी भी आज के हमारे राजनेता ही सावित होंगे। इसका खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ेगा। हम देख रहे हैं, आज पृथ्वी नारायण शाह के प्रतिमा और गरिमा के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है। नेपाली झण्डा को जलाया जा रहा है।
       नेपाल के राजनीतिक इतिहास में पूर्ण लोकतांत्रिक और आधिकारिक समाजवादी पार्टी के रूप में नेपाली कांग्रेस को गरिमा प्राप्त है। विशुद्ध समाजवाद के मार्ग पर चलनेवाला कांग्रेस आज व्यक्तिवाद और वंशवाद के दलदल में धंसता जा रहा है। माओवादी के साथ गले मिलाने और अपनी आधारभूमि मधेस को लतियाने के कारण राजनीतिक कुपोषण के शिकार ही नही बल्कि वैचारिक दारिद्र्य का भी सामना करना पड़ रहा है। शिक्षित, प्रज्ञावान और संभ्रांत जनों के संगठन के रूप में प्रतिष्ठित नेपाली कांग्रेस आज से पंद्रह वर्ष पूर्व ही इन संस्कारों को अपमानित करना आरंभ कर दिया। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा की एक भी नेता और कार्यकर्ता में सत्य बोलने का हिम्मत नहीं दिखा। सब के सब गिरिजा कोइराला के अयोग्य निर्णय के सामने भी अपनी पद जाने के भय से मौन रहे। महंथ ठाकुर जैसे कांग्रेस के नेताओं ने जनभावना को कदर करते हुए पार्टी केंद्रीय नेतृत्व को सही मार्ग पार लाने के लिए विरोध करने का हिम्मत दिखाया और मधेस में अपना स्थान सुरक्षित करने में सफल रहे, जबकि कांग्रेस के ईमानदार, निष्ठावान नेताओं के लिए कांग्रेस पार्टी के भीतर भी खुद को सुरक्षित रखना मुश्किल हो गया। हजारों कांग्रेसी नेता कार्यकर्ता पार्टी त्यागकर मधेश आंदोलन में सहभागी होने लगे। उधर कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक नेता कार्यकर्ता के लिए यह खुशी का उत्सव बन गया। उनको अब पार्टी के आंतरिक निर्वाचन में चुनौती देनेवाला कोई नही रहा। इसी बीच निधि जैसे नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व को अपनी ही पार्टी के निष्ठावान नेताओं और कार्यकर्ताओं को जो उनके खिलाफ हो सकते थे उनकी राजनीति को सफाया करने का स्वर्ण अवसर मिल गया। इस तरह कांग्रेस को उसके अपने ही नेता और चापलूसों ने वरवादी के कागार पर लाकर खड़ा दिया है। नेपाली जनता के भीतर आज भी कांग्रेस के प्रति सदभाव और सम्मान सुरक्षित है। जबकि कांग्रेसी नेताओं में अपनी जाति और परिवार के शिवाय दूसरों के प्रति तनिक भी इमानदारिता नही है।
       कांग्रेस के नेतृत्व वर्ग ने सायद राष्ट्रीयता और जनता मैत्री समाजिकता को समझा ही नहीं है। या समझते हुए भी अपनी व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी को दलदल में डाल दिया है। अन्यथा, जहां एक करोड़ लोग अपनी मौलिक पहिचान और मानवीय अधिकार के लिए सड़क पर उतर गए हो; और कांग्रेस को इसका भनक तक न मिले! क्या यह संभव है? संसार के सर्वाधिक घटिया नेतृत्व भी जिसे आसानी से समझ सके वह प्राज्ञो के पार्टी कांग्रेस को समझ में नहीं आया। इसके पीछे दूरगामी षडयंत्र था और आज भी है। वह था वंशवाद को स्थापित करना। जिसके नायक गिरिजा कोइराला थे तो वही कार्यकर्ता के रूप में निधि हैं। गौर से देखा जाए तो महोत्तरी के कांग्रेसी नेताओं को स्थापित नही होने देना भी इसी दुश्चक्र का एक अंग था। वरना पूर्व सांसद रामचंद्र तिवारी, नरेंद्र मिश्रा, पूर्व सांसद हरिशंकर मिश्रा, पूर्व मंत्री गणेश नेपाली, बलिराम शर्मा, डा. गरीब दास, ईश्वर नारायण पांडे, पूर्व जिला सभापति कामेश्वर पांडे, पूर्व सांसद महेंद्र मिश्र, लगायत के नेतागण जिनका पार्टी में लगानी निधि से अधिक है। और वे सब के सब उनसे बड़े भी हैं। फिर भी एक दो को छोड़कर किसी का भी अस्तित्व सुरक्षित नहीं है। शायद डा.अमरेश कुमार सिंह को भी यह गंभीर षडयंत्र स्पष्ट दिखाई देने लगा है; इसीलिए तो सांसद जैसे पद को त्यागना कबूल किया लेकिन निधि जी के योजना को सफल न होने देने का हिम्मत दिखाया है। ज्ञातव्य हो! उपरोक्त नामांकित सभी नेताओ का जाति एक ही है; और यही इनका दोष भी है।
      मैं सैकड़ों ऐसे महान व्यक्तित्व और उनकी भावनात्मक गहराई के पीड़ा को प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूं। कांग्रेस के राजनैतिक आदर्श को अपने जीवन का अभिन्न आदर्श मानकर  समय, संपत्ति और सामाजिक सम्मान तक को लुटाने से न हिचकनेवाले निष्ठा के हिमालय को जब आज मजबूर हालत में देखता हूं तो हृदय में आक्रोश, क्षोभ और आत्मग्लानि का तूफान उठने लगता है। मेरा यह लेख प्रथमतः उन्हीं कांग्रेस के नेतृत्व से पीड़ित आदर्श पुरषों को श्रद्धांजलि हेतु अर्पण है तो दूसरी ओर उन युवाओं को सचेतना हेतु अर्पण है; जो अपनी जवानी को दांव पर लगाने जा रहे हैं। उन्हें पगपग पर ध्यान, होश और संभलकर चलने की परमावश्यक है। अन्यथा ये भेड़िए उन्हें कब प्राणहीन बना देंगे पता भी नही चलेगा। अतः अतीत से शिक्षा लेकर वर्तमान के अवस्थाको ध्यान में रखते हुए जो भविष्य में कदम उठाता है उसका कोई बाल बांका तक नहीं कर सकता।
ये लेखक के विचार हैं ।
ajay-kumar-jha
अजय कुमार झा,
जलेश्वर |

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