सुशासन स्थापित करने मे सार्बजनिक खरिद की भूमिका : इ.सत्य नारायण शाह
इ. सत्य नारायण शाह, राष्ट्रिय प्रशिक्षक, सार्बजनिक खरिदप्रक्रिया | यह एक सर्वविदित तथ्य है कि नेपाल में सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया ज्यादातर विवादास्पद हुआ करता है । कुछ पर तो राजनीतिक दखलंदाजी का भी आरोप लगाया गया दिखाई देता है । परिणामस्वरूप नेपाली नागरिकों के मन में राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों के प्रति घृणात्मक भावनाएँ तेजी से विकसित हो रही हैं, जिसे किसी भी सूरत में देश के विकास की दिशा में सकारात्मक पहलू नहीं माना जा सकता । नेपाल में सुशासन स्थापित करने की दिशा मे इस पहलू को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
दुसरी ओर, यदि नेपाल के सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया का शुक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो सार्वजनिक खरीद निकायों को विभिन्न असामाजिक, अवैध और अमानवीय घटनाओं का भी सामना करना पड़ रहाहै | साथ् साथ् कुछ विकृति भी पनपति हुइ दिखाई देती है, जैसे अस्वस्थकर प्रतिस्पर्धा, सिंडिकेशन, कर्मचारियों पर अनावश्यक दबाव बनाना, निविदा अनुमोदन पर अनावश्यक समय खर्च होना, गुंडागर्दी, अस्पष्टता आदि । इसका नकारात्मक परिणामस्वरूप कई अन्य असमाजिक गतिविधियों का जन्म होना स्वभावीक दिखाई देता है। जिसका प्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव राज्यके साशन प्रणाली पर पड़ता है परिणामत: सुशासन की स्थापना होने मे कठिनाइ उत्पन्न होती है |
नेपाल दुनिया का अकेला ऐसा देश नहीं है जो इस तरह की चीजों का सामना कर रहा है । लेकिन कई देश समय पर सुझबुझ के साथ् ऐसी बुराइयों को फैलने से रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाकर सुशासन स्थापित करने मे सफल हुए हैं। पड़ोसी देश भारतने खरीद प्रक्रिया में कई बाधाओं को दूर करने के लिए नई सूचना प्रणाली को अपनाकर और ई-खरीद पद्धति की स्थापना करके देश को एक स्वच्छ और पारदर्शी खरीद प्रक्रिया दी है।
हालांकि, इस तकनीक का संचालन नेपाल में भी किया जा रहा है जिसमें कुछ और चीजों को विकसित करने की जरूरत है | मुख्य रूप से राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी के कारण, जिस गति से यह तकनीक व्यापक होनी चाहिए, उसका अभाव है | राजनीतिक प्रतिबद्धता के महत्व का एक ज्वलंत उदाहरण आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का कार्यकाल है। उन्होंने अपने राज्य आंध्र प्रदेश में ई-प्रोक्योरमेंट प्रविधि की स्थापना करके न केवल भारत में बल्कि दुनिया में उदाहरणीय और अनुकरणीय खरीद प्रक्रिया और प्रबंधन प्रौद्योगिकी स्थापित करने में सफलता प्राप्त की है। ऐसा नहीं है कि वो इस तकनीक के विशेषज्ञ हैं, बल्कि सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया को अधिक कुशल, पारदर्शी बनाने और अर्थ का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और सुझबुझ के ही कारण उन्होने इस प्रबिध की सफलतापुर्बक स्थापना और संचालन की |
कैसे हुआ ?
श्री चंद्रबाबू नायडू के मनमस्तिष्क मे यह बात भालिभाती घर कर ली थी कि राज्य मे सुशाशान कायम करने के लिए सबसे पहले सार्बजनिक खरिद प्रक्रिया मे क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना अपरिहार्य है और इसे उच्च-प्राथमकिता देकर काम करने पर ही सकारात्मक प्रतिफल प्राप्त किया जासकता है | इस सोच के पिछे प्रदेश में सुशासन की स्थापना के माध्यम से लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की बात थी । इस उद्देश्य की प्राप्त के लिए उन्होने इ. 2000 में मंत्रिपरिषद की एक उपसमिति का गठन किया जिसने इ. 2001 में ई-प्रोक्योरमेंट तकनीक की स्थापना की सिफारिश की । इस को कार्यान्वीत करने के लिए परामर्शदाता की नियुक्ति और फिर उनकी राय के अनुसार People Public Participation (PPP) सिद्धान्त के आधार पर सेवा प्रदायी का चयन पश्चात कार्यको आगे बढाया गया |
पूरे भारत में यह पहला प्रयास था जिसे अन्य जगहों पर लागू किया गया | इस तकनीक की सफलता का प्रमाण इस बात से है कि आज न केवल सरकारी संस्थान बल्कि निजी संस्थान भी इस तकनीक से लाभान्वित हो रहे हैं। इस खरीद प्रक्रिया से निर्माण व्यवसायियों, आपूर्तिकर्ताओं और परामर्शदाताओं को नियुक्त किया जाता है और राज्य के विकास कार्यों जैसे भवन निर्माण, सड़क निर्माण, नहर निर्माण, पेयजल, बिजली घर आदि को पूरा किया जारहा है |
चूंकि नेपाल एक विकासशील देश है, इसलिए राज्य का अधिकांश निवेश सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया के माध्यम से खर्च किया जा रहा है | इसिलिए इस कार्य को यदि पारदर्शी, त्रुटी विहिन तारिको से सम्पादित नही किया जाय तो इसका सिधा दोष साशान प्रणाली पर जाना बिल्कुल लाजमी हो जाता है | सार्बजनिक खरिद कार्य बहुत बडी धन राशि से जुड़ने के कारण जनता का भी बहुत जल्द ध्यानकर्षण होना स्वाभाविक हो जाता है | होना जरुरी भी है, क्योकी वो जो धन राशि है, जनता के खुन पसिने की कमाइ से ही एकत्रित की गइ होती है | खर्च की गई राशि, यदि कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि के कारण दुरुपयोग हुआ प्रतित होता है और यदि यह सूचना लोगो तक पहुचती है तो लोगो मे निराशा एबम सरकार के प्रति नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगती है, जिसका सीधा प्रभाव शासन प्रणाली पर पड़ता है । यानी इसका सीधा मापदण्ड यह बताता है कि राज्य मे सुशासन की स्थिति कैसी है | इसलिए इतनी बड़ी राशि खर्च करने की प्रक्रिया जितना निष्पक्ष, पारदर्शी और यथोचित समय पर होगी, राष्ट्र और लोगों को उतना ही अधिक लाभ होगा। नतीजतन, यह सुशासन स्थापित करने में मदद करता है । इनके अलावा, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, निष्पक्षता, समय की बचत, निविदा प्रक्रिया में अनावश्यक खर्चों में कमी, सिंडिकेट गठन की संभावना में कमी, व्यवसायियों का सशक्तिकरण, दूरदराज के क्षेत्रों से प्रतिस्पर्धा, कर्मचारियों की मनमानी प्रवृत्ति से मुक्ति आदि मुख्य लाभ हैं, जिसे इस प्रणाली से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
हालांकि, इस विकसित प्रणाली को लागू करने से पहले, सार्वजनिक खरीद कानून के प्रावधानों के बारे मे सभी अधिकारीयों, विशेष रूप से सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में शामिल लोगों को समझ होनी चाहिए । यह एक बुनियादी आवश्यकता है | ऐसी समझ की कमी के कारण हो अथवा खरीद कानून की अनदेखी के कारण, चाहे वह केंद्र हो या प्रदेश, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां विवाद पैदा होते हैं और फलस्वरुप बजट का सही उपयोग नहीं हो पाता है। इतना ही नहीं, अक्सर नेताओं और नौकरशाहों के बीच भी विवाद होते रहते हैं जिसके चलते जनकल्याण के लिए किए गए कार्य समय पर पूरे नहीं हो पा रहे हैं यह बहुत ही विडंबनापूर्ण स्थिति है |
नेतृत्व वर्ग को इस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता खोजना चाहिए ताकी एक सुशासन सहित लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना हो | स्पष्ट रुपमे कहा जाय तो यहां भी एक चंद्र बाबू नायडू की सख्त जरूरत है |
नेपाल में क्या करें?
वर्तमान स्थिति को देखते हुए प्रदेश और स्थानीय सरकार मे, संघीय सरकार की तुलना में सार्वजनिक खरीद कानून के बारे में अधिक अनभिज्ञता दिखाई पड़ता हैं, जिसके कारण कई विवाद हुए हैं। इसको दुर करने के लिए राजनीतिक कर्मी के लिए सार्वजनिक खरीद कानून पर एक अभीमूखीकरण कार्यक्रम की तत्काल आवश्यकता है। इसके लिए राज्य विधानसभा के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री को एक बड़ी भूमिका निभाने की जरूरत है | ऐसी स्थिति मे यदि प्रदेश प्रमुख भी इस कार्य में समन्वयात्मक भूमिका निभाते हैं, तो परिणाम बहुत प्रभावी हो सकता है | साथ ही सार्वजनिक खरीद में लगे कर्मचारियों को व्यापक प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार को लेनी चाहिए |
सुशासन स्थापित करने के लिए आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग:
दुनिया भर की सरकारों ने लोककल्याण कार्यों में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करना शुरू कर दिया है, जिससे सुशासन स्थापित करने में काफी मदद मिल रही है। नेपाल में भी इसका उपयोग धीरे-धीरे हो रहा है, लेकिन दुर्भाग्यवश, विशेष रूप से कर्मचारी वर्ग मे पारंपरिक तरीके से काम करने की सोच अभी भी बंद नहीं हुई है। नतीजतन, यदि कोई राजनीतिक नीति पेश की जाती है, तो भी नौकरशाही इसे आसानी से स्वीकार नहीं करपाती है | इस चूनौती का गहन अध्ययन विश्लेषण करके मूल कारण को कम करने की नीति राजनीतिक तबको से आने की जरूरत है। यानी इसके लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता जरूरी है | लेकिन मुख्य आधार यह है कि राजनीतिक नेतृत्व को इस तकनीक के लाभों के बारे में तथ्यगत जानकारी लेते हुए आत्मसात करना चाहिए | इसे देखते हुए राज्य सरकारें इस तकनीक का अधिकतम उपयोग कर सकती हैं | और विभिन्न क्षेत्रों में जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लोगों को लाभान्वित कर सकती हैं। इसके लिए भी पूर्व शर्त के रूप में राजनीतिक नेतृत्व को इस ओर उन्मुख होने की जरुरत है ।
समयबद्ध तरीके से कानून निर्माताओं और अधिकारियों का ध्यानाकर्षण हो !

२०/१२/२०७७
जनकपुरधाम

