मधेश में माओवादीः विगत और वर्तमान
दिलीप साह:मधेश में एकीकृत नेकपा -माओवादी) की उपस्थिति पहले की अपेक्षा मजबूत होती जा रही है। खासकर पहिचान सहित की संघीयता में दृढ रहनेवाले एमाओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड ने मधेश में विभिन्न सभाओं में वहीं से चुनाव लडÞने की बात बार बार उद्घोष की है। हालंाकि विगत में संविधानसभा के चुनाव में मधेश में माओवादी की स्थिति खास अच्छी नहीं थी। इसलिए परिणाम भी अच्छा नहीं आ सका। इसका कारण क्या हो सकता है – वर्तमान अवस्था में मधेश में माओवादी की स्थिति कैसी है – आगामी संविधानसभा निर्वाचन में यह पार्टर्ीीैसे आगे बढÞेगी – इन्ही विषयों पर इस आलेख में संक्षिप्त चर्चा की जाएगी। 
मधेश में माओवादी की उपस्थिति
नेपाल में मधेश एक ऐसा प्रदेश है, जो भौगोलिक रूप में सुगम, आर्थिक रूप में सम्पन्न और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा है। जनसंख्या की दृष्टिकोण से देखें तो भी इस क्षेत्र की प्रमुखता है। देश की कुल आवादी के आधे से ज्यादा लोग मधेश में ही रहते हैं। विगत र्ढाई सौ वर्षों से देश के अन्य भाग में जैसे शोषण, दमन होते आया था, उसी तरह से यहाँ भी हुआ। हांलाकि शोषक प्रवृत्ति अभी भी देखी जा सकती है। जब नेपाल में माओवादी नेतृत्व में जनयुद्ध शुरु हुआ तो मधेश में इस पार्टर्ीीा सांगठनिक आधार उतना मजबूत नहीं था। सिरहा और धनुषा में अपेक्षाकृत अच्छी पकडÞ होने पर भी अन्य जिलों में अवस्था अच्छी नहीं थी। धनुषा और सिरहा में रामवृक्ष यादव -मास्टर साहेब) के नेतृत्व में किसान और मजदूर में जागृति आई थी। मगर कांग्रेस के उकसाहट में एक स्थापित नेता रामवृक्ष यादव की हत्या हर्ुइ। नतीजतन पार्टर्ीीे इस घटना के बाद जनयुद्ध के लिए अपनी तैयारी और तेज कर दी।
प्रचण्ड की पहलकदमी में मधेशी राष्ट्रिय मुक्ति मोर्चा नेपाल का गठन हुआ। जिसका लक्ष्य था- मधेश की समस्याओं का समाधान। इससे प्रमाणित होता है कि एनेकपा माओवादी ने पहले से ही मधेश को विशेष महत्त्व दिया था। मुक्ति मोर्चा गठन के साथ ही पार्टर्ीीे अन्दर और बाहर अनेकों सवाल बहस के रूप में सामने आए। इन समस्याओं को कम्युनिष्ट दृष्टिकोण से कैसे देखा जाए – मधेश की समस्या जातीय है या क्षेत्रीय – पार्टर्ीीे अन्दर इसके बारे में खूब बहस हर्ुइ। मधेश की समस्या जातीय समस्या है, इस बारे में पार्टर्ीीेतृत्व स्पष्ट था। लेकिन मधेश समस्या को विशुद्ध जातिवादी दृष्टिकोण से देखा जाए अथवा विशुद्ध वर्गीय दृष्टिकोण से – यह दोनों अतिवाद विगत से लेकर अभी तक कायम है। विशुद्ध जातिवादी होने पर भी विश्व में कहीं भी जातीय मुक्ति आन्दोलन अथवा उत्पीडÞन में रहे जातियों की सही मायने में मुक्ति नहीं हर्ुइ है। अर्थात् संकर्ीण्ाता और जडÞता के घेरे के अन्दर इस प्रकार के आन्दोलन जकडÞ जाते हैं। केवल सच्चा कम्युनिष्ट ही जातीय समस्या का सही रूप में समाधान कर सकता है। भारत के आसाम, नागाल्यांड, काश्मीर तथा अन्य देश श्रीलंका, इजरायल, प्यालेष्टाइन में जातिवादी आन्दोलन ने जनता को मुक्ति नहीं दी। इसका उदाहरण हम सभी के सामने है। अर्थात् जातीय रूप में उत्पीडÞन में जो पडेÞ हैं, उन्हें मुक्त कराने के लिए सिर्फवास्तविक क्रान्तिकारी कम्युनिष्ट पार्टर्ीीी सक्षम है। इस तरह की बहस सकारात्मक रूप में आगे बढÞी। जिसने मधेश में माओवादी की सांगठनिक पकडÞ को मजबूत करने में भूमिका खेली। साथ ही साथ मधेश के वौद्धिक वर्ग भी माओवादी के प्रति आकषिर्त होने लगे। इसी के लिए ‘मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल’ का भी गठन हुआ। मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा नेपाल का गठन मधेश के सभी वर्गों को समेटने के लिए हुआ था और मधेशी जनअधिकार नेपाल मधेश के वौद्धिक वर्ग को।
मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा का राष्ट्रीय सम्मेलन होते समय मातृका यादव जेल में होने के कारण नेतृत्व चयन में कुछ समस्या दिखाइ दी। अन्त में जयकृष्ण गोइत को नेतृत्व प्रदान किया गया। मोर्चा के सम्मेलन के बाद माओवादी सरकार के साथ वार्ता के क्रम में जनकपुर में लाखों जनसमुदाय की उपस्थिति में मोर्चा की घोषणा हर्ुइ। उसी क्रम में मातृका यादव रिहा हुए थे। जयकृष्ण गोइत का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं चल रहा था। तर्सथ मातृका यादव को मोर्चा की अध्यक्षता देने का निर्ण्र्ााहुआ। इसी के चलते गोइत पार्टर्ीीे अलग भी हो गए। मधेश के बारे में पार्टर्ीीे अन्दर बहस चल रही थी। उसी सिलसिले में मातृका यादव, उपेन्द्र यादव दिल्ली में अध्यक्ष प्रचण्ड से मिलने जाते समय सुरेश आले मगर के डेरा में वे लोग ठहरे थे। वहाँ का प्रशासन सुरेश आले मगर को पहले से ही वाच कर रहा था। संयोग से सुरेश खुले कार्यक्रम में सहभागी होकर लौटे थे। उन को गिरफ्तार कर लिया गया। साथ ही मातृका यादव और उपेन्द्र यादव भी गिरफ्तार हुए। कुछ समय के बाद वहाँ के प्रशासन ने मातृका यादव और सुरेश को नेपाल को सर्ुपर्दगी कर दी। लेकिन उपेन्द्र यादव कुछ दिनों बाद रिहा हुए। इस प्रकरण से अर्थात् गिरफ्तारी के प्रति उपेन्द्र यादव ने पार्टर्ीीे प्रति आशंका की तो दूसरी ओर मातृका यादव और सुरेश आले मगर को नेपाल प्रशासन के जिम्मे लगाया गया। और उपेन्द्र यादव को भारत से ही रिहा किया गया। जिसके चलते पार्टर्ीीे उपेन्द्र यादव के प्रति आशंका की। यद्यपि यह दोनों आशंकाएं गलत थीं। उपेन्द्र की रिहाइ रामराजा प्रसाद सिंह की पहलकदमी में हर्ुइ थी तो सुरेश जी खुले कार्यक्रम में सहभागी होकर डेरा में आते समय खानतलासी ली गई, और मगर की गिरफ्तारी हर्ुइ। इसी आशंका के कारण उपेन्द्र यादव और पार्टर्ीीे बीच की दूरी और बढÞ गई। अन्ततः उपेन्द्र अपने कुछ र्समर्थकों के साथ पार्टर्ीीे अलग हो गए। हांलाकि उनके पार्टर्ीीोडने पर तत्कालीन अवस्था में पार्टर्ीीर खास असर नहीं पडÞा। मधेश में वर्ग संर्घष्ा की रफ्तार धीरेधीरे तेज होती गई। इससे माओवादी के प्रभाव में और विस्तार आया।
मगर १२ सूत्रीय समझदारी वृहत समझौता के बाद मधेश में जैसे पार्टर्ीीौर मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा की गतिविधि और कार्यक्रमों को आगे बढना चाहिए था, वैसा नहीं हो सका। फलस्वरूप मोर्चा अकर्मण्यता में फंस गया और अतिवादी शक्तियों ने मधेश में माओवादी के बढÞते प्रभाव को सीमित करने के लिए योजनावद्ध रूप से षड्यन्त्र शुरु किया। इसकी शुरुवात नेपालगंज से हर्ुइ। नेपालगंज का साप्रदायिक दंगा अप्रत्याशित न होकर योजनावद्ध था। इस घटना में पहाडÞी मूलके लोगों ने पुलिस से मिलकर मधेशी मूल के लोगों पर आक्रमण किया, ऐसा दिखाया गया था। उसके वाद नेपालगंज की घटना का सिडी बनाकर समूचे मधेश में वितरण किया गया। परिणाम स्वरूप मधेशी समुदाय और ज्यादा आक्रोशित हुआ।
अन्तरिम संविधान लिखते समय कांग्रेस और एमाले के न मानने पर भी माओवादी को संघीयता के सवाल पर डट कर खडÞा रहना चाहिए था, लेकिन वैसा न हुआ। तत्पश्चात् मधेश आन्दोलन की शुरुआत हर्ुइ। उसी क्रम में लाहान घटना अप्रत्याशित रूप में घटी। लाहान घटना में योजनावद्ध तरीके से माआवादी विरोधी ‘सेन्टिमेन्ट’ तैयार किया गया। तत्कालीन नेकपा माओवादी द्वारा इस बात का विश्लेषण समय में ठीक ढंग से नहीं करने के चलते जो मधेश आन्दोलन क्रान्तिकारी के नेतृत्व में होना चाहिए था, वह अवसरवादियों के हाथ में चला गया। मधेश के क्रान्तिकारियों ने कहीं पर आन्दोलन को सहयोग किया और कहीं वे मूकदर्शक बने रहे। इस प्रकार मधेश के क्रान्तिकारी नेता और कार्यकर्ताओं में कुछ शिथिलता दिखाई दी। मधेशी जनता को अधिकार के प्रति सजग बनाने के लिए अर्थात् प्रशिक्षित करने के लिए बहुत मेहनत हर्ुइ थी। लेकिन वे प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ने उस समय अपनी भूमिका का निर्वाह नहीं किया। नेपालगंज घटना होने से पहले ही मधेशी राष्ट्रिय मुक्ति मोर्चा मार्फ मधेश में आन्दोलन करने का निश्चय करनेवाले मधेश के क्रान्तिकारी नेता और कार्यकर्ता को वार्ता प्रक्रिया के चलते रोक दिया गया। तत्कालीन कमान इन्चार्ज बादल थे। इसी के फलस्वरूप मधेशी मुद्दा को शुरुसे ही उठानेवाले माओवादी संविधानसभा के चुनाव में एक बडÞी शक्ति के रूप में आगे आए, मगर मधेश में उनकी स्थिति कमजोर ही रही।
विगत चुनाव में माओवादी
विगत संविधानसभा चुनाव में देश की सबसे बडÞी पार्टर्ीीे रूप में आगे आने पर भी तत्कालीन नेकपा माओवादी की उपस्थिति मधेश में अच्छी नहीं थी। इसका पहला कारण है- आन्तरिक हिसाब से मधेश में अनुशासित पार्टर्ीीा निर्माण नहीं होना। दूसरा कारण- मधेश की समस्याओं को लेकर मधेशी राष्ट्रीय मुक्तिमोर्चा नेपाल को चाहिए था कि वह आन्दोलन को आगे बढÞावे। तीसरा कारण- अन्तरिम संविधान बनाते समय कांग्रेस-एमाले संघीय राज्य नहीं चाहते थे, फिर भी माओवादी को उसमें दृढÞता पर्ूवक अडÞना चाहिए था। नहीं तो आन्दोलन को आगे बढÞाना चाहिए था। चौथा कारण- नेपालगंज और लाहान की घटना के विषय में तत्कालीन नेकपा माओवादी का दृष्टिकोण एक ही रहा। जबकि यह दो अलग प्रकृति की घटनाएं थी। पाँचवां कारण यह है कि मधेश व्रि्रोह और उससे सृजित समस्या के बारे में पार्टर्ीीेतृत्व को स्पष्ट रहना चाहिए था, और समस्या समाधान अपने नेतृत्व में करना चाहिए था, वह भी नहीं हो पाया। सच कहें तो उस समय के व्रि्रोह में किसी का भी नेतृत्व नहीं था। मधेश मुद्दा माओवादी के होने के नाते व्रि्रोह का नेतृत्व माओवादी को ही करना चाहिए था, वह भी नहीं हो पाया। जिसके कारण माओवादी का प्रभाव मधेश में कमजोर होता गया।
आगामी संविधानसभा निर्वाचन
विशेषतः विगत संविधानसभा में पहचान के साथ संघीयता में जाना है, इस धारणा को नेकपा माओवादी ने दृढÞतापर्ूवक रखने के कारण ही माओवादी के प्रति जनलहर तैयार हर्ुइ। प्रचण्ड ने चैत्र ९ गते अजवलाल यादव की स्मृति सभा में कहा- मैं मधेश से ही निर्वाचन में प्रत्याशी बनूंगा। इस उद्घोष के चलते पूरे मधेश में उत्साह छा गया। मधेश में आयोजित विभिन्न आमसभा में नेपाली कांग्रेस और अन्य दलों से पार्टर्ीीोडÞकर एमाओवादी में प्रवेश करनेवाले बहुत निकले। जिसका एक बहुत बडÞा उदाहरण हांल ही में रामचन्द्र झा द्वारा एमाले छोडÞकर एमाओवादी में जाना है।
नेपाली कांग्रेस यथास्थितिवादी सोच रखती है। जिसके चलते २०४७ साल के संविधान को ही निरन्तरता देने का अभ्यास किया गया। कम्युनिष्ट का नकाब लगानेवाला एमाले भी यथास्थितिवादी कांग्रेस की पूछ पकडÞ कर चलने लगी। कांग्रेस-एमाले द्वारा दिखाया गाया यथास्थितिवादी सोच के कारण ही विगत की संविधानसभा भंग हर्ुइ। इधर वैद्य और मातृका पार्टर्ीीे अलग होने पर भी उन लोगों की अकर्मण्यतावादी सोच के कारण उनके समूह से कार्यकर्ता लोग पुनः मूल पार्टर्ीीें ही लौट रहे हैं। मधेश के नाम पर कर्ुर्सर्ीीा खेल खेलनेवाले मधेशी दलों की स्थिति क्या है – वह सब के सामने है। हांलाकि माओवादी और मधेशवादी दलों के बीच अर्थात् संघीयता पक्षधरों के बीच चुनावी मोर्चा न होने पर चुनावी तालमेल के साथ आगे बढÞना मधेशी, जनजाति और उपेक्षित समुदाय के हित में होता।
मधेश व्युरो के आयोजन में हरिवन में सम्पन्न कार्यक्रम में प्रचण्ड ने अपनी अभिव्यक्ति में कहा- मुझे मधेश से प्रेम हो गया है। इस कथन को मधेशी जनता किस रूप से लेती है – प्रचण्ड की यह अभिव्यक्ति व्यक्तिगत स्वार्थ के साथ जुडÞी है या मधेश की मुक्ति के साथ – प्रचण्ड का मधेश मोह अभी से नहीं, जनयुद्ध के समय से ही है। नेपाली क्रान्ति ही इसका कारण है। मधेश की मुक्ति और नेपाली क्रान्ति दोनों अभिन्न रूप से एक दूसरे के साथ जुडÞे है। मधेशी मुक्ति के बिना नेपाली क्रान्ति सम्भव नहीं है, इस बारे में माओवादी नेतृत्व स्पट है। तर्सथ आगामी संविधानसभा निर्वाचन में मधेश में एमाओवादी मजबूत शक्ति के रूप में आना करीब करीब तय है।
-लेखक एमाओवादी के केन्द्रीय सदस्य हैं।)

