गालियों की महिमा अपरम्पार ! : बिम्मी शर्मा
गाली की वर्णमाला का पहला ककहरा है ‘साला’ शब्द की गाली । यह बीबी का भाई वाला साला नहीं है । यह तो वह गाली है जिसको बोले बिना कोई भी गाली पूर्ण नहीं होती ।
बिम्मी शर्मा, व्यंग्य, हिमालिनी, अंक अक्टूबर २०२१ | गाली भी एक वाद है । जो किसी भी वाद में नहीं आते वह गालीवाद का सहारा लेते हैं और सब को जम कर गाली देते हैं । वह क्या है कि किसी को गाली देने से अपनी कुंठा निकल आती है, मन की भड़ास बाहर आ जाती है और लोग हल्कापन महसूस करते हैं । जैसे ब्रश करने या कुल्ला करने से मुंह के अंदर की गंदगी बाहर आ जाती है । ठीक उसी तरह किसी को गाली देने से शरीर के अंदर का विषाक्त मैल बाहर आ जाने से शरीर का निर्मलीकरण हो जाता है ।
जैसे समाजवाद, साम्यवाद, धनवाद, डॉनवाद, फांसीवाद, माक्र्सवाद, निरकुंशवाद है उसी तरह गालीवाद है । जितना भी कोई पढ़ा लिखा या शिक्षित क्यों न हो यदि उसे गाली बकना नहीं आया तो वह लल्लूराम है । इसलिए दुनिया के साथ सुर, ताल और कदम मिला कर चलना है तो गाली शास्त्र में डिप्लोमा करना जरुरी है । जैसे बी.ए. पास करने के बाद बहुत से लोग एक साल का बी.एड. का कोर्स कर लेते हैं । ठीक वैसे ही शिक्षित हो या अशिक्षित सभी को गालियोलोजी में डिप्लोमा कर लेनी चाहिए नहीं तो जीवन व्यर्थ है । वैसे भी गालियोलोजी में डिप्लोमा करने के लिए कोई वान्छनीय योग्यता नहीं है । बस आपको बोलना आना चाहिए और गाली को रटना । बाँकी तो गाली का क्ष त्र ज्ञ पड़ोसी सिखा देंगे ।
गालीवाद में विज्ञता हासिल करने के लिए आज जिस शहर या गाँव में रहते हैं वहां की स्थानीय भाषा आनी चाहिए । उसके बाद उस स्थानीय भाषा में दी जाने वाली गाली और उसका अर्थ मालूम होना चाहिए । इसके बाद किस को, किस सन्दर्भ में क्यों और कैसी गाली देनी है यह याद रखना है । जैसे की आपके घर में मां बहन है और आपको घर के बाहर किसी को मां बहन की ही गाली देनी है । ऐसे में आप सोचने लगे और बाल खुजाने लगे कि इसको मां बहन की गाली दूं की नहीं ? तो पूरा हो चुका गाली शास्त्र में पीएचडी करने का आपका सपना ? हां बस शर्त यही है कि जब आप किसी को मां बहन की गाली दी तो बदले में जब वह भी आपको पलट कर मां बहन की गाली दे तो उसको सुनने, सहन करने और पचाने कि हिम्मत आप में होनी चाहिए । नही तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा और गालीवाद चूल्हे में धू–धू कर के जलने लगेगा ।
अंग्रेजी गाली तो माशाल्लाह बहुत वीआईपी होती है । यह आपको डिक्सनरी और गूगल में अर्थ सहित मिल जाएँगें । स्थानीय भाषा में गाली देनी है वह भी मुहावरे के साथ तो आप को बड़े बूढ़ों के साथ संगत करनी पड़ेगी । यह बड़े बूढेÞ आज भले ही कब्र में पाँव लटकाए बैठे हों पर कल अपने विगत में यह गालियों के बेताज बादशाह रहे हैं । इनको खैनी, सूर्ती, भांग या बीड़ी पिला कर इन बड़े बूढ़ों से गालियों के एक से एक दिव्य मंत्र ले सकते है । गाली सीखने के लिए भी किसी को गुरु बनाना जरुरी है । यहां हर कोई गालियों का द्रोणाचार्य नहीं होता पर आपको एकलव्य बन कर जैसे भी हो गाली सीखनी है । तो सीखने के लिए हो जाओ तैयार ।
गाली की वर्णमाला का पहला ककहरा है ‘साला’ शब्द की गाली । यह बीबी का भाई वाला साला नहीं है । यह तो वह गाली है जिसको बोले बिना कोई भी गाली पूर्ण नहीं होती । बहुत से लोग साला या साली शब्द की गाली की माला ही पहने रहते हैं और साला को तकिया कलाम की तरह बोलते हैं । इनकी सुबह और शाम की शुरुआत साले शब्द की गाली से ही होती है । जिसको साला बोलना नहीं आया समझ लीजिए वह गूंगा या मुर्ख है । क्यूंकि साला सम्मानित गाली है और कोई इसको देने पर बुरा नहीं मानता । साले की तो ऐसी की तैसी ।
साला तो गाली वर्णमाला का पहला अक्षर है । जिसको बोलना और लिखना आ जाने के बाद धीरे–धीरे बाकी सब गाली भी बोलना और लिखना सीख लें । गालीवाद में प्रयोगात्मक परीक्षा के तौर पर मौखिक परीक्षा ली जाती है । जिसने सर्र से फर्राटेदार गाली बकी और साथ में अपने हाथ पैरों का भी जोर आजमाईस कर के मूक्कालात भी कर लिया समझो उस ने गालियोंलोजी में पीएचडी वह भी ए प्लस श्रेणी में कर लिया । उसने जीवन में गंगा नहा कर बैतरणी पार कर लिया । जय हो गालीवाद की !



बिम्मी शर्मा द्वारा गालीवाद काफी हदतक पाठकों को आईना दिखाता है। अक्सर देखा गया है कि स्थिति तब बिगड़ जाती है जब गाली देने वाला, सामने वाले के द्वारा गाली दिए जाने पर बेकाबू हो जाता है। अतः गाली देने वाला और गाली सुनने वाले दोनों में परस्परता एवं संयम का होना अति आवश्यक है। यह भी देखा गया है गाली सदा अपने से छोटे को, सीधे को, असहाय, लाचार, कमजोर, अशक्त आदि को दी जाती है। देखा जाए तो गाली का शाब्दिक अर्थ इतने मायने नहीं रखता जितना उसका परिपेक्ष, संदर्भ व अवस्था रहती है दोस्त अथवा प्रेमी के द्वारा दी गाली , दोस्ती और प्रेम में प्रगाढ़ता दिखाती है जबकि किसी अनजान अथवा क्रोध में दी गाली कहर बरपा देती है। कई पेशे तो ऐसे हैं जहां गाली अनिवार्य हो जाती है जैसे पुलिस का महकमा, धोखेबाजी और गुण्डगर्दी, वैश्यावृत्ति, शारीरिक श्रम … जहां गाली रुतबा, अहमियत अथवा जोश प्रदान करने में सार्थक साबित होती है। निःसंदेह गाली रक्तचाप तथा क्रोध को नियंत्रित करने में भी कामयाब रहती है। मज़े की बात यह है कि गालियां कभी लिखित में नहीं करी जाती।
लेखिका बधाई की पात्र है कि उन्होंने गालीवाद से जुड़े पहलुओं को उजागर किया।