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मैहर माता का मंदिर जहाँ आज भी आल्हा ऊदल करते हैं आरती

 

मैहर माता का मंदिर जहाँ कहा जाता है कि आज भी वहाँ आल्हा ऊदल अदृश्य रूप में मां शारदा की आरती करने के लिए आते हैं। हिंदू पौराणिक ग्रंथों की मानें तो दक्ष प्रजापति ने एक बहुत बड़े महायज्ञ का आयोजन किया था। इस महायज्ञ में उनकी पुत्री सती भी शामिल होना चाहती थी। इससे पहले माता सती ने अपने पिता प्रजापति दक्ष की आज्ञा के बिना भगवान शिव से शादी की थी। इस कारण प्रजापति दक्ष उनसे काफी नाराज थे। माता सती और भगवान शिव को इस यज्ञ में आने का निमंत्रण नहीं दिया गया था। इसके बावजूद माता सती ने भगवान शिव से यज्ञ में जाने का जिद्द किया। मां सती जब वहां पर पहुंची तो उन्हें देखकर प्रजापति दक्ष काफी क्रोधित हुए। उन्होंने माता सती का खूब अपमान किया। इस अपमान से मां इतनी ज्यादा आहत हुईं कि उन्होंने जलते हुए अग्नि कुण्ड में अपने आप को भस्म कर लिया।

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भगवान शिव को जैसे ही इसके बारे में पता चला वह माता के शरीर को लेकर विलाप करते हुए घूमने लगे। इसे देख भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया। उसके बाद मां के शरीर के 51 हिस्से भारत के विभिन्न भागों में आकर नीचे गिरे। जहां-जहां ये हिस्से गिरे बाद में वहां-वहां शक्ति पीठ का निर्माण हुआ। उन्हीं 51 शक्तिपीठों में एक शक्तिपीठ मां शारदा का है। कहा जाता है कि यहां पर मां सती का हार गिरा था। मां शारदा का ये पावन धाम मध्य प्रदेश के त्रिकूट पर्वत पर स्थित है।
इस मंदिर के ऐसे कई चमत्कार हैं, जिसके चलते देश दुनिया से कई लोग माता के दर्शन करने यहां आते हैं। मान्यता है कि मंदिर का जब पट बंद हो जाता है और सभी पुजारी और भक्त पहाड़ के नीचे चले आते हैं एवं वहां पर कोई नहीं रहता। उस वक्त मंदिर के भीतर आल्हा और ऊदल अदृश्य रूप में माता की पूजा करने के लिए आते हैं।

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सुबह जब मंदिर का पट खुलता है, उस वक्त मां की पूजा हो चुकी होती है। आल्हा और उदल मां शारदा के परम भक्त थे। उन्होंने मां के इस पवित्र स्थल की खोजी की थी। दोनों भाइयों ने 12 साल तक कठोर तपस्या की। इससे मां काफी खुश हुईं और उनको अमरत्व का वरदान दिया।
मान्यता कहती है कि दोनों भाइयों ने माता के समक्ष अपनी जीभ को अर्पण कर दिया था, पर माता ने उसे लेने से मना कर दिया। हमारी संस्कृति में मां शारदा को बुद्धि की देवी कहा गया है।

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