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मधेश की अन्तहीन पीड़ा : डॉ श्वेता दीप्ति

 

मधेशी नेताओं पर अपने यकीन को दर्शाया था और उसे चुना था, उसी मधेश की जनता का आज अपने नेताओं से…..  

   “गैरों में कहाँ दम था हमें तो अपनों ने लूटा”

२०७२ से लेकर २०७८ का वक्त तेजी से गुजर रहा है । एक नजर में हमें लगता है कि देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है और हम संघीयता के सुख का स्वाद ले रहे हैं । किन्तु वास्तविकता यह कि फिलहाल हमें अधिकार नहीं सिर्फ संघीयता का नाम मिला है । ६ साल के बीच का यह वक्त भले ही गुजरा परन्तु देश का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा अपने प्रतिनिधियों और सरकार की दोमुँही नीति का शिकार कल भी थी और आज भी है । सत्ता की कुर्सी पर चाहे जो भी सत्तासीन हों मधेश के हिस्से तिरस्कार और अवहेलना से अधिक कुछ नहीं मिलने वाला है यह अब तक का इतिहास बताता है ।

“गैरों में कहाँ दम था हमें तो अपनों ने लूटा” जी हाँ आज जिस दो नम्बर प्रदेश ने मधेशी नेताओं पर अपने यकीन को दर्शाया था और उसे चुना था, उसी मधेश की जनता का आज अपने नेताओं से जहाँ विश्वास उठ गया वहीं नेता अपना आधार भी खो रहे हैं । जिसका भरपूर असर अगले चुनाव में उन्हें दिखने वाला है । जो कल भी मधेश की राजनीति के सर्वेसर्वा थे और आज भी हैं वो एक बार फिर से उसी संविधान की दुहाई, शहादत की दुहाई और अधिकार तथा समानता के नारे को लेकर मधेश की जनता के समक्ष जाने वाले हैं । किन्तु एक बार फिर से मधेशी दलों की ‘बिन पेंदे का लोटा’ वाली स्थिति एमाले, माओवादी, काँग्रेस की जड़ों का मधेश की जमीन पर मजबूत करेगी । मधेशी नेता नैतिकता की बलिहारी देकर आज भी अगर ये दावा करते हैं कि वो मधेश के नियंता हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी कपोल कल्पना होगी । देखा जाय तो वो सिर्फ सत्ता के साधक ही नजर आ रहे हैं, मधेश के मसीहा नहीं ।

आज जसपा सत्ता में शामिल है, भले ही मधेश के मसीहा अपना त्याग दिखा रहे हों । वैसे ज्यादा समय वो पदविहीन रहेंगे ये सम्भव नहीं है । अतीत बताता है कि जिस मिट्टी पर खून बहा था जिसके बल पर मधेशी नेता ने साम्राज्य खड़ा किया आज भी वो मधेश और मधेश की समस्याओं से अपने स्वार्थ की सिद्धि ही कर रहे हैं । जिनके घरों के चिराग बुझे वो आज भी अँधेरे में हैं, पर इनके महल रौशन हैं ।

आज सामान्य नागरिक की मनःस्थिति की बात करें तो उनमें नैराश्यता ने घर कर लिया है । देश की कमजोर अर्थव्यवस्था, राजनीतिक माहोल, कोरोना के कहर में भी युवा वर्ग का पलायन, भुखमरी, बेरोजगारी और प्राकृतिक आपदा से ग्रसित देश के नागरिक आखिर कब तक बिना आधार की उम्मीद पर जिन्दा रह सकते हैं ? आज की राजनीति सिर्फ रणनीति का खेल रह गई है, जहाँ आदर्श की सम्भावना पूरी तरह समाप्त हो चुकी है । हम किसी दल या नेता की प्रशंसा या अनुकरण सिर्फ इसलिए करने को बाध्य हैं कि, हमारे पास कोई विकल्प नहीं है । नेपाल की राजनीति में जनता के समक्ष यह ज्वलंत प्रश्न है । आखिर वो किसका चुनाव करे ? किस पर यकीन करे ? देश की बागडोर किसे सौपे ? वर्तमान सरकार की नीति सामने है और ओली सरकार की उपलब्धि की शून्यता भी सभी को पता है । सभी दल वर्तमान में आगामी चुनाव की तैयारी में व्यस्त हैं । वो फिलहाल सत्ता में प्रवेश कराने टीका लगाने और शॉल ओढ़ाकर जनता का स्वागत करने में व्यस्त हैं, ठीक उसी तरह जैसे बलि से पहले बकरे की आवभगत की जाती है । हम सभी सभी जानते हैं कि आगे भी देश की जनता के हिस्से में कोई चमत्कार होने की संभावना नहीं है ।

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चौदह वर्षों में राम का वनवास समाप्त हो गया था, कहते हैं १२ वर्षों में नदियाँ भी अपने रूप में आ जाती है किन्तु सदियाँ गुजरने के बाद भी मधेस की स्थिति में कोई खास अंतर नहीं आया है । न्यायिक अधिकारों के लिए मधेसी जन आंदोलन द्वारा उठाई गई मांगों को अभी तक पूरी तरह से संबोधित नहीं किया गया है । आज भी मधेसी दल उसी समस्या की दुहाई देकर वोट बैंक बटोरने की तैयारी में व्यस्त रहेंगे । इन सालों में अगर कुछ बदला है तो वो यह कि मधेशी नेताओं की अपनी तकदीर, बैंक बैलेंस, नाते–रिश्तेदारों की आर्थिक स्थिति और पोजीशन । इतने लंबे अरसे के बाद भी मधेस का मसला ज्यों का त्यों है । हैरानी की बात यह है कि मधेसी आंदोलन में मारे गए लोगों की लाशों को दिखाकर चुनाव जीतने वाले मधेसी नेताओं ने मधेसी मुद्दे के कट्टर विरोधी केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री बनने में मदद की थी इस बात ने यह स्पष्ट कर दिया था कि, उनके लिए कुर्सी पर चाहे जो भी हों उन्हें भी सत्ता का स्वाद मिलता रहे बस यही मायने रखता है ।

जनता समाजवादी पार्टी, जिसने मधेस में एकमात्र राजनीतिक दल की पहचान बनाई थी, अब मधेस में दो राजनीतिक दलों में से एक बन गई है । देखा जाए तो ये दल ऐसे नहीं हैं कि जिन पर मधेश की जनता आँख मूँद कर यकीन करे, बावजूद इसके इन्हें वहाँ की जनता ने स्वीकार किया जिसकी वजह से इन्हें शक्ति प्राप्त हुई थी । परन्तु मात्र सत्ता भोगने की चाहत ने इन दलों को मधेश की जनता की निगाहों में अस्तित्वविहीन कर दिया है । जबकि मधेस के लिए ये एक बड़ी राजनीतिक ताकत के गठन के रूप में उभरी थी, किन्तु अफसोस कि ये राजनीति की बिसात पर मोहरा बने और आज दो अलग दल के रूप में चुनावी जंग की तैयारी में व्यस्त हैं । मधेश के कथित मसीहा और मधेश के भीष्म पितामह ने अपनी अदूरदर्शिता जाहिर कर दी है । ये चेहरे भी पुराने हैं और मधेश की अवाम भी ऐसे में किसी नए परिवर्तन की कल्पना करना मुर्खता ही होगी । मधेशी दलों के गठबन्धन का विभाजन राजनीतिक दल का विभाजन नहीं है, इस विभाजन ने नेपाल की तीसरी और निर्णायक धारा स्थापित करने की उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया है जिसमें मधेसी, थारू, मुस्लिम, आदिवासी और जनजाति शामिल हैं । जनता समाजवादी पार्टी का एकीकरण काँग्रेस, माओवादी और एमाले सभी की आँखों में खटका था । किसी भी तरह इसमें फूट डाली जाए, यह नीति थी और इसमें कामयाबी भी मिली ।

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जनता समाजवादी पार्टी के बंटवारे से मधेसी, थारू और आदिवासी जनजाति आंदोलनकारी अब खुद को हारा हुआ महसूस कर रहे हैं । इस विभाजन ने पहाड़ों, पहाडि़यों और मैदानों के सभी प्रबुद्ध लोगों को झकझोर दिया है, जिन्होंने इस तथ्य को आत्मसात कर लिया था कि राज्य के हर अंग में मधेशी के पहचान, समावेश और समान भागीदारी के बिना देश में स्थिरता और समृद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती है । इस घटना ने मधेसी, थारू और आदिवासियों की संयुक्त शक्ति को चकनाचूर कर दिया है । भले ही ये दल इस बात को ना मानें लेकिन यह कटु सत्य है कि, मधेस की दो मजबूत अग्रणी ताकतें कमजोर हो गई हैं । एक तीसरा नाम जो मधेश की धरती पर अपने आपको स्थापित करने की कोशिश कर रहा है वह है जनमत पार्टी, किन्तु फिलहाल कुछ वर्षों तक इससे किसी जादूई चमत्कार की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि अब तक यह किसी स्पष्ट विचारधारा के साथ जनता के समक्ष उपस्थित ही नहीं हो पाया है और न ही अपनी कोई मजबूत स्थिति बना पाया है । जनमत पार्टी में सिर्फ एक चेहरा सामने है और जाहिर है कि सिर्फ इस एकलौते चेहरे के बदौलत स्थापित होने की जंग नहीं जीती जा सकती क्योंकि, यह चेहरा भी शुरुआती दौर की प्रसिद्धि को खो चुका है ।

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मधेश की पीड़ा का आज तक अंत ही नहीं हुआ है । देखा जाए तो यह वह प्रसव पीड़ा है जिसका अंत नहीं है क्योंकि इसका कोई परिणाम नजर नहीं आ रहा है । दलों के आपस के मनमुटाव का एक असर और सामने आया जब प्रदेश नम्बर दो के मुख्यमंत्री कार्यालय में अख्तियार ने छापा मारा । यह घटना निश्चय ही शाख गिराने वाली घटना है । मुख्यमंत्री राउत ने अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग द्वारा मुख्यमन्त्री तथा मन्त्रिपरिषद् के कार्यालय में हुई छापामारी को संघीयता के विरुद्ध षड्यन्त्र की संज्ञा दी है । उन्होंने कहा है कि अख्तियार की छापामारी संघीयता को समाप्त करने की साजिश है । इस बात में सच्चाई चाहे जो भी हो किन्तु यह सच है कि संघीयता को आज भी कई दल स्वीकार नहीं कर पाए हैं और शक्ति बटने नहीं देने की कोशिश जारी है ।

अगर विगत की ओर नजर डालें तो इस प्रकरण की जड़ें स्पष्ट नजर आएँगी । २०७४ साल के प्रदेश सभा निर्वाचन के बाद तत्कालीन संघीय समाजवादी फोरम और राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल (राजपा) ने मिल कर प्रदेश नम्बर दो में सरकार बनाया था । बाद में दोनों के एकीकरण ने जनता समाजवादी पार्टी का गठन किया । कुछ महीने पहले तक सब ठीक था किन्तु गठबन्धन के समाप्त होते ही राजपा के मंत्रियों को हटा दिया गया । वर्तमान में राजपा समूह लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रहा है । चेहरे वही नाम अलग, जो मधेश की जनता को दिग्भ्रमित तो अवश्य करेगा । खैर फिलहाल ये दोनों सत्ता में पक्ष और विपक्ष की भूमिका में हैं । जहाँ मुख्यमंत्री राउत को विश्वासमत लेने की जरुरत पड़ी । और फिलहाल वो दो तिहाई मतों से विश्वास मत जीत चुके हैं । देखा जाए तो मधेश की राजनीति में कोई नई तरंग नहीं दिख रही है । वही गीत है, वही राग और वही गाने वाले तथा सुनने वाले । मधेश की माँग संविधान संशोधन नहीं है बल्कि देखा जाए तो उन्हें नए संविधान की आवश्यकता है । जिसमें ईमानदारी से मधेश की जनता को और उनके अधिकारों को सम्बोधित किया जाए । तभी मधेश की स्थिति में किसी सकारात्मक परिवर्तन की परिकल्पना की जा सकती है ।

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1 thought on “मधेश की अन्तहीन पीड़ा : डॉ श्वेता दीप्ति

  1. असाधारण रूप से रोचक ब्लॉग आपके पास यहां पढ़ने के लिए अच्छी जानकारी है। मैं जिस तरह से लिखता हूं उसे पूजा करता हूं।,

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