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आपराधिक मानसिकता और युवा पीढ़ी : अजय कुमार झा

 

अजयकुुुमार झा, हिमालिनी अंक नोवेम्बर 2021। विश्व पटल पर साहस, शौर्य, सहनशील और प्रज्ञा के शिखर के रूप में पहचान रखनेवाले नेपाली समाज में पिछले कुछ वर्षों से पारिवारिक कटुता, वैमनस्य और स्खलित संस्कार के कारण अपराधिक घटनाओं के सिलसिला में उच्च बढ़ोतरी देखने को मिल रही है । एक मनुष्य के लिए सबसे सुरक्षित स्थान परिवार में अपनों के बीच रहना होता है । घर–परिवार वह दिव्य स्थान है जहां एक निरीह बालक भी सब ओर से अपने सुंदर भविष्य को संरक्षित महसूस करता है । हमारा घर–परिवार सिर्फ पालन–पोषण का स्थान ही नहीं बल्कि शिक्षा और संस्कार का मूल श्रोत भी है । परिवार के शैक्षिक स्तर और वैचारिक–व्यवहारिक संस्कार को बड़ी आत्मीयता, सहजता तथा दैनिक जीवन के क्रियाकलापों के माध्यम से बच्चों में संस्कार, शिक्षा और कर्तव्य का बोध कराया जाता है । लेकिन आज वह दिव्य विद्यालय पश्चिमी दबाव के कारण अपनी अंतिम सांसे गिनने को मजबूर है । तथाकथित शिक्षित लोग मानसिक विक्षिप्तता तथा विकलांगता को आधुनिकता का जामा पहनाकर पूरी मनुष्यता को ही कलह, हिंसा, अपराध और नशे के गर्त में धकेल रहे हैं; और लोग अपने अंध अहंकार के कारण सामूहिक आत्मघात को आत्मसम्मान का प्रतीक मानकर उनका अनुसरण कर रहे हैं । हमारे आधुनिक बुजुर्गो के द्वारा लगाया गया इस विषैले पेड़ में लटकते युवा रूपी कड़वे फल से आज एक व्यक्ति नही, बल्कि पूरी मानवता ही पाश्चात्यों के चक्रव्यूह में घिर गई है । जिससे निकलना लोहे के चने चबाने से कम नहीं ।

सञ्चार माध्यमों के जरिए पिता ने पुत्र का, पुत्र ने पिता का, पति ने पत्नी तथा पत्नी ने पति को मार डाला ऐसे समाचार निरंतर पढ़ने को मिलते हैं । ऐसा एक दिन नहीं जिस दिन इस तरह की पारिवारिक हिंसा–हत्या का समाचार न आया हो । आखिर यह सब कब तक चलेगा ! क्या हम मानवता के गरिमा को नही पहचान पाएंगे ? क्या हम अपनी जीवन और प्रकृति के प्रणाली को समझने में सक्षम नहीं हो पाएंगे ? गांव–गांव, गली–गली शिक्षालय निर्माण हो चुका है । विभिन्न आधुनिक उपकरणों के माध्यम से बच्चों को स्कूल के पूरा किया जा रहा है । सभी को शिक्षित करने हेतु सरकार तथा विभिन्न क्षेत्रों के द्वारा उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा है । संपत्तियों का अंबार लगता जा रहा है । आधुनिक उपकरणों के आविष्कार द्वारा सुविधाओं का महासंजाल खड़ा कर दिया गया है । सूचना और संचार माध्यम के कारण विश्व को मुठ्ठी में भर लिया गया है । अधिकार संरक्षण के लिए अभिव्यक्ति की आजादी उपलब्ध होते हुए भी हम हिंसा से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं । अतः इतना सबकुछ के बावजूद हम सभ्य नहीं हो पा रहे हैं तो इसके पीछे कुछ अति सूक्ष्म कारण अवश्य होना चाहिए जिस पर हमारा ध्यान नहीं पहुंच पा रहा है । संभव है; वह कारण भौतिक न हो कर सुक्ष्म जगत से संबंधित हो, वैसे भी जो समस्या जितनी सुक्ष्म होती है उसका समाधान भी उतना ही जटिल होता है ।

कोविड १९ महामारी की वजह से उपजी आर्थिक मंदी ने विश्व के ८५ – ११५मिलियन लोगों को गÞरीबी और बेरोजÞगारी की ओर धकेल दिया है और प्रबल सभावना है कि २०२१ के अंत तक ये आंकड़ा १५० मिलियन तक पहुँच जाएगा – जो कि, पिछले २० वर्षों मे उपजी विश्व स्तर पर पहली अत्यंत दयनीय गरीबी का दौर है । संयुक्त राष्ट्र ग्लोबल पल्स इनिशिएटिव द्वारा किए गए क्रॉस–नेशनल अध्ययन में इन आर्थिक संकेतों मे परिवर्तन और रेकॉर्डेड अपराध में सम्बद्ध परिवर्तन के मध्य एक सम्बन्ध दिखाया गया है । समकालीन समाज में, तनाव प्रेरित अपराध के पीछे लोगों की दयनीय आर्थिक दशा एक प्रमुख कारण है । जिसका प्रत्यक्ष जिम्मेवारी वर्तमान सरकार को लेना है ।

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जबकि इस महामारी की वजह से पहले से ही विश्व में कई जन प्रेमी सरकारें भी काफी दबाव में है जिस वजह से उनकी इच्छित परिणाम दे पाने की शक्ति काफी प्रभावित हो रही है । घरेलू हिंसा, कामगार, श्रम विवाद, सामाजिक सुरक्षा और व्यापारिक दिवालियापन जैसी घटनाओं में खÞतरनाक वृद्धि हुई है । लॉकडाउन के वक्तÞ के कठोर प्रतिबंध की वजह से न्याय प्रणाली में सीमित कार्यशीलता ने स्थिति को और भी जटिल कर दिया है ।

अपराधिक क्रियाकलाप कोई आधुनिक आविष्कार नहीं है । यह तो मानव के विकास क्रम के सात अपनी स्वरूपों में समय सापेक्ष परिवर्तन करते हुए चला आ रहा है । सन १९७८–२००५ के बीच यूनाइटेड स्टेट्स के ४०० से भी ज्यÞादा काउंटी जिÞलों में, बेरोजÞगारी प्रेरित आपराधिक प्रेरणा और अवसर और उसके परिणाम के ऊपर किए गए एक सर्वेक्षण में बेरोजÞगारी दर और सम्पत्ति की चोरी से जुड़ा अपराध, मोटर व्हीकल की चोरी के बीच एक स्थिर संबंध है । ठीक उसी तरह से भारत में भी नौकरी की कमी ने कई लोगों को आपराधिक गतिविधियों में धकेल दिया है, और इस दौरान देश की बेरोजÞगारी दर भी लॉकडाउन के बाद के ७ प्रतिशत से लेकर पिछले साल अप्रैल महीने तक सीधे २७.११ प्रतिशत तक पहुँच चुका है । संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी २०२० के मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार, लॉकडाउन के शुरुआती ६८ दिनों के दरम्यान गूगल सर्च ट्रेंड के अनुसार, भारत मे, ‘घरेलू हिंसा’ और ‘घरेलू हिंसा हेल्पलाइन’ अपने चरम पर था, जहां मार्च के पहले सप्ताह से अप्रैल के अंतिम सप्ताह के दौरान, घरेलू हिंसा से ग्रस्त लोगों की मदद की गुहार और राहत आश्रय से संबंधित कॉल्स मे १०० प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है । ऐसी स्थिति में हम अपनी असमर्थता को समझ सकते हैं ।

ऐसी भीषण स्थिति में जहां एक ओर बीमारी के कारण हजारों घर बिखर गए, लाखों बच्चें अनाथ हो गए । आम नागरिक आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के दृष्टि से त्रसित हैं, वहां महामारी के नाम पर जिम्मेवार व्यक्तियों के द्वारा ब्रह्म लूट मचाना, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना और भ्रष्टों को सम्मान देना सिर्फ घरेलू अपराध को ही निमंत्रण नहीं देता है बल्कि भीषण गृहयुद्ध और सामाजिक उथलपुथल की ओर इशारा भी करता है ।

संखुवासभा के मादी नगरपालिका–१ उमलिङ के खोला गांव में २१ भदौ में एक ही परिवार के ६ लोगों को घर के अंदर ही हत्या कर दिया गया । प्रहरी अनुसन्धान से पता चला कि अपने ही नातेदार की संलग्नता में आर्थिक लेन देन के कारण ऐसे विभत्स अपराधिक कृत्यों को अंजाम दिया गया ।

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पिछले पांच वर्षो में नेपाल के सातों प्रदेश में सर्वाधिक अपराधिक घटनाएं प्रदेश नंबर एक में दर्ज किया है । जहां वि सं २०७३÷७४ में १७३ घटना दर्ज की गई थी वहीं २०७७÷७८ में २६६ घटना अपराधिक घटनाओं को दर्ज किया है । अपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी का यह संकेत भयावह है । प्रदेश नंबर दो के जिला प्रहरी कार्यालय पर्सा के तथ्यांक अनुसार आर्थिक वर्ष २०७७÷७८ में १ हजार १ सौ ७३ अपराधिक घटना दर्ता किया गया है तो वहीं वर्ष २०७६÷७७ में १ हजार ८१ अपराधिक घटना दर्ता किया गया था । इसी प्रकार नेपाल प्रहरी के तथ्यांक अनुसार २०७३÷७४ में १ सय २३, २०७४÷७५ में १ सौ १६, २०७५÷७६ में १ सौ २०, २०७६÷७७ में १ सौ २२ लोगों की हत्या कर दी गई जिस में बालबालिकाएं उल्लेख्य संख्या में हैं । इनमे अधिकतर हत्याएं पारिवारिक कलह और आर्थिक लेन देन को लेकर की गई है ।

 

कमजोर मानसिकता और क्षणिक आवेग के कारण हत्या जैसी विभत्स घटना घट रही है । बलात्कार, लूटपाट, चोरी, डकैती जैसे अपराधों को छुपाने के लिए अपराधियों में हत्या तक कर डालने की मानसिकता पाई जा रही है । यह प्रवृत्ति भविष्य में समाज और संस्कृति दोनो के लिए विनाशक सिद्ध होने वाली है । जिन अपराधियों को यह लगता है की वो माओवादी की ही भांति अपराध करके जीवन के उच्चतम स्तर को उपलब्ध हो जाएंगे; वे भयानक भूल कर रहे हैं । हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि जो काम हम कर रहे हैं उसका निर्देशक कोई और है । और हम मात्र एक दो कौड़ी के मोहरा हैं । जबतक आप अपराध के दुनियां का हीरो बनेंगे तब तक आप की सांस्कृतिक जड़े उखड़ चुकी होंगी । आप मूढ़तापूर्ण गुलामी के भीषण शिकार बन गए होंगे । इस प्रकार अपनी ही भूमि के इतिहास में हम भस्मासुर के संतान कहे जाएंगे ।
मनुष्य में हिंसा और आत्म हत्या के भाव गहन होने के पीछे उसके पारिवारिक माहौल का महत्वपूर्ण योगदान रहता है । पारिवारिक समस्या को समाधान करने के लिए जो सामूहिक विचारों का आदान–प्रदान का संस्कार था वह बच्चों के भीतर जिम्मेदारी बोध कराने के साथ ही उत्तरदायित्व वहन करने का संस्कार भी देता था । बच्चों के ऊपर परिवार के सदस्यों का ध्यान रहता था जो उसके समग्र विकास में सहयोगी तथा सामाजिक मनोविज्ञान के तहत गलत कार्यों से बचाता था ।

संयुक्त परिवार की प्रणाली नष्ट होने तथा एकल परिवार में रहने से भौतिक सुख तो प्राप्त हो गया लेकिन मानसिक संतुष्टि नहीं मिला । खाने पीने की अत्यधिक सुविधा के कारण बच्चों में जिम्मेदारी, परिश्रम और सहभागिता का भाव शून्य हो गया जिसके फलस्वरूप अत्यधिक संख्या में युवा पीढ़ी शारीरिक और मानसिक दुर्बलता के शिकार होने लगे । स्कूली शिक्षा के लिए परिवार से दूर रहना बाध्यता हो गया, बुजुर्गो के स्नेह और सानिध्य स्वप्न हो गया । इस प्रकार समाजीकरण न होने के कारण युवा पीढ़ी धीरे–धीरे कठोर और गैर जिम्मेवार हो गए । पहले का सामाजिक दायित्व और आज के सामाजिक संरचना में जमीन आसमान का भेद है । पहले समाज अर्थात पड़ोसी भी परिवार से अधिक अपने सभी बच्चों के सुंदर भविष्य के प्रति जागरूक और सक्रिय रहते थे, जबकि आज परिवार के सदस्य भी अपनी ही भतीजा–भतीजी को बर्बाद करने मे बहादुरी समझते हैं । आज के समय में यह भीषण सामूहिक स्खलन है । अपने बच्चों के गलत संगत के विषय में यदि कोई व्यक्ति करुणा बस जानकारी भी करा दे तो आज हम उसी से लड़ने झगड़ने लग जाएंगे । हो सकता है उसे अपमानित भी कर दे, आज कुछ भी संभव है ।

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यहीं से मानसिक पतन होता गया जो आज कृष्ण के संभावना वाला बालक कंश रूपी हिंसक व्यक्ति के रूप में समाज के सामने उपस्थित हो रहा है । आज के बच्चों में आधुनिकता के ओर बढ़ते रुझान ने अनुशासनहीनता को सम्मान और प्रतिष्ठा में बदल दिया है । नैतिक शिक्षा को आडंबर तथा धार्मिक रूढ़ीवादी बचकानी धारणा से जोड़ दिया गया है, तथा अनैतिकता को आधुनिकता का जामा पहनाकर सामाजिक स्वीकृति दे दिया गया है । विदेशी संस्कृति, दिनचर्या तथा रहन–सहन और खान–पान को सभ्यता सुंदरतम विकसित अंग के रूप में व्याख्यायित कर महिमा मंडित करने कारण ही आज सामूहिक बेचैनी, तनाव तथा सूक्ष्म हिंसा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ने लगा है । आरंभ में माता पिता के अहंकार को भले ही तृप्ति मिला हो, लेकिन समग्रता में यह वंश विनाश का पीड़ादायक लीला ही साबित हो रही है ।
बाल मस्तिष्क कोमल होने के कारण किसी भी प्रकार के घटना का गहन असर होते देर नहीं लगता है । अतः बाल मस्तिष्क में सही और गलत को समझने के लिए विवेक का विकास न होने के कारण बच्चे अपनों से बड़े लोगो का अनुसरण किया करते हैं । माओवादी के द्वारा की गई ज्यादती और क्रूरता को अपनी आखों से प्रत्यक्ष देखने वाले बच्चे आज बड़े हो गए हैं । उनके अवचेतन मन में आज भी वह दृश्य आक्रोश और बदले की भावना को उत्तेजित करता होगा । इस कार्य में सामाजिक संजाल भी विशेष भूमिका निर्वाह कर सकता है । फिल्मी उत्तेजक हीरो हिरोइन उनके आदर्श हो गए हैं । मोबाइल के हिंसक खेल उनके आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं । उत्तेजक फास्टफुड उनका मन पसंद भोजन है तो माताओं के लिए परिश्रम से बचने का उपाय । इन सारी बातों पर गौर से विचार विमर्श करने की परमावश्यक है । पीछे लौटा नहीं जा सकता परंतु सावधानी से इस समस्या रूपी विकट जंगल को पार किया जा सकता है । नेपाल के हक में समस्या अधिक है और समाधान का प्रयास न्यून है । जिम्मेवार आधिकारिक लोग भ्रष्टाचार में डूबे होने के कारण व्यक्तिगत समझदारी के अलावा अन्य कहीं से आशा की किरण दिखाई नहीं देती है ।

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