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निश्चलता : बसंत लोहनी

 

निश्चलता

उनमें ही समाहित
मेरी आवाज गूंजता रहा
अल्फ़ाज़ मुझे पता ही नहीं था
इसलिए मैं वही रहा
जहां मैं शुरू से ही था
एक अनाड़ी जो मैं बना
लेकिन – 
मेरे ही आवाज में जो उठे थे
वह ज्यादा दूर जा न सके
सिर्फ़ उनके लिए मैं दुखी हूं
अपने लिए तो मैं जहां हूं वहीं खुश हूं
मेरी खुशी
मेरी ना समझधारी
मेरी अबोधता की बदौलत
धन्य हो !

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यह देखकर लगता है
खुशी का स्रोत निश्चलता,
सिर्फ निश्चलता ही है
इसीलिए तो हँसमुख यात्रा
अभी तक बरकरार है

वसन्त लोहनी, काठमाण्डू

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