टोपी का राष्ट्रवाद ! लगे रहो मुन्ना भाई और मून्नी बाई : बिम्मी कालिन्दी शर्मा
बिम्मी कालिन्दी शर्मा, (व्यंग्य) । देश टोपीमय है । हर कोई टोपु पहन कर खुद को राष्ट्रवादी घोषित कर रहा है । यदि गलती से कंही टोपी नहीं पहना तो कंही आतंकवादी या देशद्रोही सावित न हो जाए ईसी डर से लोग हडबडी में ही सही टोपी पहन और पहना रहे हैं । अब ‘हडबडी का ब्याह कनपट्टी में सेनूर’ हो जाता है यह सभी को मालुम है । पर टोपी का गोलचक्कर कोई नहीं जान पा रहा है । टोपी की ईस राजनीति से धोती वाले आहत है ।
सिरँफ टोपी ही क्यों शरीर में पहना जाने वाला हर वस्त्र महत्वपूर्ण है । अंडरवियर या अंतवस्त्र तो और ज्यादा महत्वपूर्ण और बहुमूल्य है शरीर के लिए तो क्यों नहीं साल मे एक दिन ‘अंतवस्त्र दिवस’ भी मनाया जाए ? हमेशा शिकायत करते और रोते रहते हैं तो क्यों न साल में एक दिन ‘रुमाल दिवस’ भी मनाया जाए ? महिलाओं के साथ आए दिन छेडछाड और रेप होता रहता है । पुरुषों कि कामुक निगाहों से बचने के लिए बेचारी महिलाओं को दुपट्टा, शाल लेना पडता है या बुर्का पहनना पडता है । तो क्यों न ईसके लिए भी साल में एक दिन मुकर्रर किया जाए और पुरुषों के शर्महीन आंखो के लिए ‘पर्दा दिवस’ और महिलाओं के लिए दुपट्टा या बुर्का दिवस भी मनाया जाए ?
शीर के मैल, रुशी या जुएं से बचाने के लिए आप टोपी पहन रहे हैं या टोपी की आड में राजनीति कर रहे हैं । नएं साल के दिन जितने भी लोगों ने टोपी पहनी उनमें ९५ प्रतिशत से ज्यादा पहाडिया नेपाली है । ईसका मतलब साफ है जो टोपी पहने वह शुद्ध और खरा नेपाली है जो टोपी न पहने वह धोती यानी की मधेश अर्थात भारतीय हैं । टोपी का मतलब नेपाली ढाका टोपी यदि गांधी टोपी,अंग्रेज़ी कैप या टोप पहने तो खैर नहीं । पहाडिया लोगों की यह राजनीति किसी से छिपी नहीं है । यह दुसरों को हीन सावित करने के लिए खुद की हिनता वोध छिपा नहीं पा रही है । नहीं तो रोज पहनी जाने वाली एक छोटे से वस्त्र जो शीर पर शोभायमान होती है उसके लिए अलग से कोई दिन क्यों चाहिए ?
ईन्हे दुसरे धर्म, जाति और समुदाय से वितृष्णा है ईसी लिए ईसका प्रदर्शन ऐसे ही हरकत कर के करते हैं । अब क्रिशमस ईसाइयों का सब से बडा त्यौहार है । ईस दिन सभी ईसाई धर्मावलंबी क्रिशमस ट्री बना कर सजाते हैं । अब दुसरे धर्म के प्रति ईनमें सम्मान या सदभाव तो है नहीं ईसी लिए ३६५ दिन पूजा कर के जल चढाया जाने वाले तुलसी जी को ही ईस दिन शहीद कर दिया और क्रिशमस को ‘तुलसी पुजन दिवस’ की स्व-घोषणा कर दी । ठीक उसी तरह क्रिशमस के एक हप्ते बाद पड्ने वाली अंग्रेजी नंया वर्ष को भी नकार कर नेपालियों ने उसे स्व-घोषित टोपी दिवस बना दिया । वह भी मामूली नहीं अन्तराष्ट्रीय टोपी दिवस ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ की तरह । कम्प्यूटर के युग में पैदा हुए हैं, सभी के हाथों मे मोबाईल है । कम्प्यूटर और मोबाईल उसी अंग्रेजी कैलेंडर की तारीखों के अनुसार चलती है । दुनिया के सारे देश के कारोवार या डिजिटल प्रणाली ईसी तारीख के अनुसार होती या चलती है । तो ईस अंग्रेजी नंया साल के प्रति ईतनी पूर्वाग्रह क्यों ? विदेशी कपडे पहनेगें, विदेशी फैशन अपनाएंगे पर अंग्रेजी नंया साल से मूंह फेर कर शीर में टोपी पहन कर साल भर उसी टोपी को घुमाते रहेगें । आप की टोपी की राजनीति आप ही को मुबारक हो । आप टोपी पहनने वाले भंयकर राष्ट्रवादी और हम टोपी न पहनने वाले भंयकर राष्ट्रघाती । आप यही समझाना और बताना चाहते थे और हम भी समझ गए और लीख कर बता भी दिया । सिर्फ टोपी दिवस क्यों दौरा सुरवाल दिवस भी मनाओ, नेपाली चोलो या खास्टो दिवस भी मनाओ तब हम भी जाने ? आप देश के विकास या समृद्धि के लिए ईतना ही सोच और कर सकते है सो कर के दिखा दिया । महिलाओं ने भी नेपाली टोपी पहन पुरुषों से कदमताल मीला लिया है । ईसी लिए ईस टोपी दिवस को फैलाने और बढाने मे लगे रहो मुन्ना भाई और मून्नी बाई ! 👍☺️😊

