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हाइकू

 
हाइकू

-मुकुन्द आचार्य

हिमाली हवा
नीचे लू की तपन
देश अप्पन !शिोख, शरीर
शरारतों के लिए
मचलता है

भ्रिष्टाचार के
शिष्टाचार में हम
‘वर्ल्ड टँप’ हैं !

मिमता डोर
नहीं है ओर छोर
है मुंहजोर

दिेह सराय
जीव किरायेदार
जाना है पार !

जिरा जवानी
सब है आनी-जानी
कहती नानी !

किल क्या होगा –
कोई नहीं जानता
कौन मानता !

चल्लाना ही है
आज की राजनीति
भांैकते रहो !

विेश्या ही तो है
आज की राजनीति
जो न करावे !

निव द्वार का
यह शीशमहल
गिरना ही है !

तिुझे पाना है
लगता है जिन्दा हंै
खाक जिन्दा हैं !

किैसे आऊँ मैं
पैरो में जंजीर है
तू भी दूर है !

सिुबह शाम
दाम, नाम व जाम
काम तमाम !

लिोहे के चने
जिन्दगी चबवाती
मौत न आती !

भिगवान हैं
सारे शास्त्र कहते
कहां रहते –

दर्द टूटे दिल का :-सुनील जैन, दिल्ली
तेरी हर खुशी में, शामिल रहूँगा मैं,
देख लाल जोडÞे में सजी है तू और
मुबारक देने वालों की कतार में शामिल हूँ मैं
लब खामोश होंगे मगर दिल देगा तुझे सदा
तुझ से दूर हूँ, मगर नहीं हूँ, तुझ से जुदा
काश उस रोज लाल जोडÞे में सजी,
मेहंदी वाले हाथ उठा कर, कह देती मुझे अलविदा
कुछ कदम साथ चले थे हम तुम, पर अब
मेरी जिंदगी का बीता किस्सा बन गई है तू
मुबारक हो, शहर के नामी घराने का हिस्सा बन गई है तू
जब से तू किसी और की हर्ुइ है
भटक रहा हूँ मैं दर-बदर
पर इस हवेली के साये में बैठ कर कुछ सकूँ मिला
क्या यही हवेली है तेरा नया पता –
तेरे दर को छू कर आती है जो बादे सबा
पोंछ जाती है मेरे बहते अश्कों को
कौन कहता है तू हो गई है मुझ से जुदा !
यादों के झरोखे से

जब कोई भी मां छिलके उतारकर
चने, मंूगफली या मटर के दाने
नन्ही हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर
थरथराने लगते हैं।
मां ने हर चीज के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा, आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के
पिंजरे में खडÞा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा
मां पर नहीं लिख सकता कविता।
-चन्द्रकांत देवताले

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