आजादी की आवाज बनी थी हिन्दी कविता : डॉ. श्वेता दीप्ति
डॉ. श्वेता दीप्ति, जनवरी अंक 022। प्रत्येक देश का साहित्य अपने देश की भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिस्थिति से संबद्ध होता है और इस साहित्य में देश की आत्मा निहित होती है । इतिहास की महत्ता जहाँ तिथियों और सत्य घटनाओं से है वहीं साहित्य की महत्ता उन घटनाओं को रोचकता के साथ प्रस्तुत करने के लिए है । जहाँ इतिहास की नीरसता सभी को स्वयं से आबद्ध नहीं कर पाती वहीं, साहित्य बहुत ही सहजता के साथ पाठक को खुद से जोड़ लेता है । प्रत्येक साहित्यकार अपने देश के अतीत से प्राप्त विरासत पर गर्व करता है, वर्तमान का मुल्यांकन करता है और भविष्य के लिए सपने बुनता है और इस प्रकार कहा जा सकता है कि वह राष्ट्रीय आकांक्षाओं से परिचालित होता है । राष्ट्रीयता एक ऐसी कोमल भावना है जो हर उस व्यक्ति के दिल में होती है जो अपनी मातृभूमि से प्यार करता है । अपनी मिट्टी से अलग वो कहीं चला जाय लेकिन वो अपनी जड़ को भूल नहीं पाता और इसका उदाहरण है प्रवासी साहित्य का दिन प्रतिदिन विस्तार होना ।
‘राष्ट्र’और ‘चेतना’ दोनो स्वतंत्र शब्द हैं जिसके मेल से एक महान शक्ति उद्भित होकर राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय भावना अथवा राष्ट्रीय चेतना का स्वरूप धारण करती है । यही भावना साहित्य में स्वर और सुर बनकर फूट पड़ती है और अनंतर प्रवाहित होती रहती है । इससे जनमानस में सामूहिक चेतना का निर्माण होता है । देश भक्ति का उद्वेलन कभी समर्पण तो कभी आंदोलन का रूप धारण कर लेता है, जिससे व्यक्ति के स्वत्व से लेकर राष्ट्र तथा देश की स्वतंत्रता और समानता की सुरक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण तक के भाव समाविष्ट होते हैं । यहां यह जान लेना आवश्यक है कि राष्ट्र सर्वथा आधुनिक संकल्पना नहीं है । इसका संबंध बहुत प्राचीन है । यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है । यूं कहें तो यह हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है । इसका संस्कृति से अन्योन्याश्रित संबंध है । साहित्य भी उसी संस्कृति का एक अंग है । यह परस्पर एक दूसरे में गुथे हुए होते हैं, जिससे जनमानस में राष्ट्रीय चेतना को उत्तेजित तथा सुदृढ़ करने में सहायता मिलती है । इस पुनीत कार्य हेतु किसी भी भाषा का साहित्य सदैव अग्रणी भूमिका में रहा है ।
यूँ तो राष्ट्रीयता को पहचानने के लिए किसी वर्गीकरण की आवश्यकता नहीं होती किन्तु भारत के संदर्भ में इसकी आवश्यकता आन पड़ती है क्योंकि, भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय चेतना का जो स्वरूप विदेशी शासन के दौरान पला और पुष्ट हुआ, उसका अपना एक विशेष परिप्रेक्ष्य है । भारत की आधुनिक राष्ट्रीय चेतना के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक आदि सभी दिशाओं में प्रसार का मुख्य कारण पहले कम्पनी शासन और बाद में ब्रिटिश शासन बने । भारतेन्दु युग से ही हिंदी साहित्य की जो धारा प्रवाहित हुई, वह क्रमशः राष्ट्रीय आन्दोलन के विस्तार के साथ चिंतन के नए आयाम भी बनाती गई । राष्ट्रीय चेतना का जो स्वरूप पराधीन भारत में पनपा वह राष्ट्र समाज उसकी विद्रोही भावना की अभिव्यक्ति है । कला विलासियों के विषय में श्री माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा है कि ‘सखे बता दे कैसे गाऊँ, अमृत मौत के दाम न हो ! जगे एशिया, हिले विश्व, पर राजनीति का नाम न हो ।’ तात्पर्य यह कि साहित्यकार की दृष्टि समाज और राष्ट्र की हर दशा और दिशा पर केन्द्रीत होती है । वह वही रचना है जो समय की माँग होती है या यूँ कहूँ कि वह समय से आगे भी देखता है और उसे जीता है ।
भारतीय वाङ्गमय में ‘राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग वैदिक काल से ही होता रहा है । मानव की सहज सामुदायिक भावना ने समूह को जन्म दिया, जो कालान्तर में राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ । राष्ट्र एक समुच्चय है और राष्ट्रीयता एक विशिष्ट–भावना है । जिस जन समुदाय में एकता की एक सहज लहर हो, उसे राष्ट्र कहते हैं । आर्यों की भूमि आर्यावर्त में एक बाह्य एकता के ही नहीं वैचारिक एकता के भी प्रमाण मिलते हैं । आर्यों की परस्पर सहयोग तथा संस्कारित सहानुभूति की भावना राष्ट्रीय संचेतना का प्रतिफल है । राष्ट्रीय चेतना के लिए जरूरी है कि— जहाँ एक तरफ राष्ट्र भक्तों का मान–सम्मान हो, वहीं दूसरी तरफ देश–द्रोहियों के प्रति घृणा का भाव हो । राष्ट्र के प्रति अपनत्व तथा अगाध प्रेम की भावना ही राष्ट्रीयता कहलाती है । आज राष्ट्रीयता एक प्रबल शक्ति एवं प्रभावशाली प्रेरणा है । राष्ट्रीयता का संबंध केवल जड़भूमि से न होकर आंतरिक होता है । अपने देश के अगाध प्रेम में अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं धर्म के प्रति गौरव में, अपने देश की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक दशाओं में सुधार के प्रयत्न आदि में वह राष्ट्रीय भावना प्रस्फुटित होती है ।
राष्ट्रीयता की भावना व्यक्ति को अपने राष्ट्र के लिए उच्च कोटि के शौर्य तथा बलिदान के लिए प्रेरणा देने वाली सामूहिक भावना की एक ऐसी उच्चतम अभिव्यक्ति है जिसका इतिहास–निर्माण में बहुत बड़ा हाथ है । राष्ट्रीयता की भावना एक मानसिक अनुभूति अथवा मन की एक स्थिति है । राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है जिसका सम्बन्ध मानव की अन्तश्चेतना से है । जो अनिर्वचनीय होने के कारण केवल अनुभूति का विषय है । यह मनुष्य की स्वभाविक वृत्तियों में से एक है जिसके कारण वह अपने राष्ट्र से विशेष प्रकार का लगाव रखता है और उसे सदा उन्नत तथा समृद्धशाली देखने को उत्सुक रहता है । इसी भावना के आवेग से उन्मत्त व्यक्ति अपने राष्ट्र के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में तथा सहर्ष अपना जीवन अर्पण कर देने में अपना गौरव समझता है । जिस राष्ट्र में राष्ट्रीयता की यह चेतना जितनी अधिक बलवती होगी उतना ही वह शक्तिशाली तथा समृद्ध माना जाएगा ।
हिन्दी काव्य में राष्ट्रीय चेतना की शुरुआत के लिए आवश्यक है कि हिन्दी काव्य धारा को दो भागों में बाँटकर देखा जाय । इनमें प्रमुख धार १८५७ के सिपाही विद्रोह के बाद नवीन चेतना के वाहक भारतेन्दु और प्रतापनारायण से प्रवाहित होकर स्वाधीनता प्राप्ति तक बनी रही । साहित्य का मनुष्य से शाश्वत संबंध है । साहित्य सामुदायिक विकास में सहायक होता है और सामुदायिक भावना राष्ट्रीय चेतना का अंग है । समाज का राष्ट्र से बहुत गहरा और सीधा संबंध है । संस्कारित समाज की अपनी एक विशिष्ट जीवन शैली होती है । जिसका संबंध सीधा राष्ट्र से होता है जो इस रूप में सीधे समाज को प्रभावित करती है । कवियों ने राष्ट्र जागृत करने के लिये, सोये हुये राष्ट्र को अपनी कविताओं के माध्यम से संघर्ष के लिये प्रेरित किया । भक्त कवियों ने अपने अंतःकरण में बह रही राष्ट्रीय चेतना की धारा से सुप्त और निरासित समाज को नयी दिशा दी । ऐतिहासिक दृष्टि से जिसे गांधी युग कहा जाता है, साहित्यिक दृष्टि से उसे ही छायावादी युग की संज्ञा दी जाती है । तात्पर्य यह कि छायावादी काव्य गांधी युग की मिट्टी में ही अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित हुआ ।
‘गांधी युग राष्ट्रीय चेतना का उत्कर्ष काल था । उस समय भारतीय जनमानस में राष्ट्रप्रेम का समुद्र हिलोरें मार रहा था । इसमें संदेह नहीं कि छायावाद में रहस्यवाद की आध्यात्मिक अनुभूति, प्रतीकवाद की ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता और प्रतीकात्मकता तथा स्वच्छंदतावाद की आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति, कल्पना की अतिशयता, सौन्दर्य के प्रति ललक, उन्मुक्त प्रेम की प्रवृत्ति विस्मय की भावना तथा रूढि़यों और बंधनों से विद्रोह की धारणा का समावेश है किन्तु उसमें भारत के सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय नव–जागरण के विविध पक्षों—विवेकानन्द और रामतीर्थ की अद्वैतमूलक भक्ति भावना, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विश्व बंधुत्ववाद, महात्मा गांधी के मानवतावाद, राष्ट्रीयता की भावना और विदेशी शासन के प्रति विद्रोह का भी समावेश है । वस्तुतः छायावाद की मुख्य भावभूमि मानवीय, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक है । आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के शब्दों में—‘छायावादी काव्यधारा का भी एक आध्यात्मिक पक्ष है किन्तु उसकी मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्कृतिक है । उसे हम बीसवीं शताब्दी की मानवीय प्रगति की प्रतिक्रिया भी कह सकते हैं ।’
भक्तिकाल के कवि कबीरदासजी ने निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना का आदर्श प्रस्तुत किया और इसी के माध्यम से राष्ट्रीय गरिमा में नवजीवन का संचार कर राष्ट्र को नई दिशा दी । महान राष्ट्रवादी कवि कबीर ने राम और रहीम को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया । तुलसीदासजी राष्ट्रभक्त संत थे इन्होंने राम के समन्वयी लोकरंजक स्वरूप को स्थापित कर सांस्कृतिक एकता को शक्ति प्रदान की । सूरदास जी ने आध्यात्मिक चेतना का संचार कृष्ण की विविधता के माध्यम से किया और समाज के सत्कर्म की प्रेरणा दी । भारतेन्दु के राष्ट्रवादी स्वरों की झंकार ने लोक चेतना में हलचल उत्पन्न कर दी ।
१८५७ से लेकर जो मुक्ति संग्राम चला, उसमें कवियों और शायरों ने अपनी कविताओं, गीतों और गजलों के माध्यम से राष्ट्र को जागृति का संदेश दिया । स्वतंत्रता संग्राम की धूम, देश में मच रही हलचल ने कवियों को राष्ट्रवादी काव्य की गंगा बहाने के लिये प्रेरित किया । स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार राष्ट्रीय भावों के द्वारा राष्ट्रीय चेतना का संचार कर रहे थे । भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभ से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक राष्ट्रीय भावधारा लिये हुये कविताओं के गर्भ में राष्ट्रीय चेतना का विकास होता रहा । १८५७ में पहला अखबार निकला ‘पयामे आजादी’ । आधुनिक काल में भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने अपनी लेखनी के जादू से भारत दुर्दशा का चित्रांकन कर समाज को जागृति का संदेश दिया है । इसी प्रकार प्रेमधन की अरुणोदय, देशदशा, राधाकृष्णदास की भारत की बाहरमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई । द्विवेदी युग में कविवर ‘शंकर’ ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अन्तर्गत बलिदान गान में प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा’ के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये क्रांति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी ।
राष्ट्रीयता की भावना विकसित करने में आधुनिक साहित्य का बहुत बड़ा योगदान रहा है । राष्ट्रवाद से सामुदायिक भावना का विकास होता है और लोकतांत्रिक भावना भी राष्ट्रवाद से समृद्ध होती है । देश की रक्षा, हित, संगठन, एक समाज के जातीय स्वरूप के विकास की आकांक्षा, कोशिश राष्ट्रीय चेतना का अविभाज्य अंग है । आधुनिक हिंदी कविता की एक प्रबल प्रवृत्ति का नाम है देशभक्ति । इसीलिए इस समय की कविता को राष्ट्रीय÷सांस्कृतिक नाम देना उचित ही है । यह कविता प्रवृत्ति भारतेन्दु–द्विवेदी युग के साथ छायावाद में बेहद सर्जनात्मक रूप धारण करती है । यही देश से राग–अनुराग का आधार है– उत्साह, जिसमें समष्टि की प्रेरणा का विस्फोट है । मध्ययुग की कविता में व्यक्त वैयक्तिक शौर्य वीर की श्रेणी में आने पर भी देशभक्ति की श्रेणी में नहीं आता । उस युग की राष्ट्रीयता की भावना का क्षेत्र संकुचित है । आधुनिक राष्ट्रीयता का प्रथम विद्रोह १८५७ की स्वाधीनता संग्राम की क्रांति में मिलता है । इस भारतेन्दु युग में अनेक आंदोलन हुए तथा देशभक्ति में राजशक्ति का मेल रहा । दयानंद, राजा राममोहन राय, दादाभाई नौरोजी, विवेकानंद और तिलक जैसे लोकनायकों ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध देश को जागृत किया । पूरे देश में सांस्कृतिक–राजनीतिक जागरण की लहर दौड़ गई । विदेशी पराधीनता से मुक्ति का विचार साहित्य क्षेत्र में स्थायीभाव बन गया । इसी समय कवियों ने इतिहास–संस्कृति के गौरवगान गाये । राष्ट्रीयता ने कांग्रेस आंदोलन में नया अर्थ–प्रकाश पाया । भारतीय जनता की चेतना को जागृत करने के लिए विदेशी शासन के अंत का नारा तेज हुआ । इस नारे को मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के साथ छायावाद युग के सभी कवियों–रचनाकारों ने स्वर दिया । राष्ट्रीय आंदोलन और साहित्य की अनुभूतियों में पहला सामंजस्य सत्याग्रह युग के रूप में सामने आया ।
राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता माखन लाल चतुर्वेदी ने अपने काव्य हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता युगचरण, समर्पण, काव्य कृत्तियों की रस की धारा से राष्ट्रीयता का भाव जागृत किया । चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतंत्रत कर जनतंत्रात्मक की पद्धति की स्थापना का संकल्प किया । इनकी कविता से संघर्ष की प्रबल प्रेरणा मिलती है । राष्ट्रीय भावधारा की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान का ‘त्रिधारा’ और ‘मुकुल’ की ‘राखी’ ‘झांसी की रानी’ वीरों का कैसा हो बसंत’ आदि कविताओं में राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति है । रामधारी सिंह दिनकर स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुये और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रवादी कवि के रूप में जाने जाते रहे । कवि ‘दिनकर’ के काव्य ने भारतीय जनमानस को नवीन चेतना से सराबोर किया है. कुरुक्षेत्र महाकाव्य राष्ट्रीयता से परिपूर्ण है । बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने राष्ट्रीय भावना से ओत–प्रोत कविताओं को रचकर राष्ट्रीयभाव जागृत किये ।
हिन्दी साहित्य राष्ट्रीय चेतना की कविताओं से समृद्ध है जिसने भारत की आजादी में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है । हिन्दी साहित्य के अनेक कवियों ने राष्ट्रीयता की भावभूमि पर अपना काव्य रचकर नवजागरण का संदेश दिया । यह कहा जाता है कि राष्ट्रीय भावना राष्ट्र की प्रगति का मूल मंत्र है और सच है कि आधुनिक काव्य में राष्ट्रीयता का भाव प्रत्येक भाषा में समाविष्ट है । किसी भी राष्ट्ररूपी वृक्ष की छाया में अनेक पंथ धर्म और भाषाएं पल्लवित और पुष्पित होती है । एक राष्ट्र अनेक धर्म हो सकते हैं । किन्तु व्यक्ति मूल भावना और सांस्कृतिक विरासत एक ही होगी । मैथिलीशरण गुप्त जिस काव्य के कारण जनता के प्राणों में रच–बस गए और राष्ट्रकवि कहलाए, वह कृति भारत भारती है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में पहले पहल हिंदी प्रेमियों का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली पुस्तक भी यही है । इसकी लोकप्रियता का आलम यह रहा है कि इसकी प्रतियां रातोंरात खरीदी गई । प्रभात फेरियों, राष्ट्रीय आंदोलनों, शिक्षा संस्थानों, प्रातःकालीन प्रार्थनाओं में भारत भारती के पद गांवों÷नगरों में गाये जाने लगे । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका में कहा कि “यह काव्य वर्तमान हिंदी साहित्य में युगान्तर उत्पन्न करने वाला है । इसमें यह संजीवनी शक्ति है जो किसी भी जाति को उत्साह जागरण की शक्ति का वरदान दे सकती है । हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी ? का विचार सभी के भीतर गूंज उठा । यह काव्य १९१२ में रचा गया और संशोधनों के साथ १९१४ में प्रकाशित हुआ । यह अपूर्व काव्य मौलाना हाली के मुसद्दस के ढंग का है । राजाराम पाल सिंह और रायकृष्णदास इसकी प्रेरणा में हैं । मूल बात यह है कि भारतीय साहित्य में भारत भारती सांस्कृतिक नवजागरण का ऐतिहासिक दस्तावेज है ।”
भारत भारती की इसी परम्परा का विकास माखनलाल चतुर्वेदी, नवीन जी, दिनकर जी, सुभद्राकुमारी चौहान, प्रसाद निराला जैसे कवियों में हुआ । देश पर गांधी चिंतन की घटा छायी हुई थी । गांधी जी से सुभाष टकराये और नवीन चेतना का प्रकाश पैदा हुआ । एक धारा गांधी नेहरू समन्वय में था तो कम्युनिस्ट धारा राष्ट्रीय आंदोलन की निरर्थकता के विश्वास पर खड़ी थी । लेकिन सोशलिस्टों का चिंतन गांधी के निकट आया । इस आरंभिक द्वंद्वात्मक चिंतन में क्रांति की तीव्रता हुआ और शक्तिबाणों के छूटने की ध्वनि । हिन्दीस्वाधीनता संग्राम की प्रतिनिधि भाषा थी और देश का मानस मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, बच्चन, निराला में एक अपराजेय संकल्प से भरी गति का अनुभव कर रहा था । बच्चन का अग्निपथ, अग्निपथ वाला स्वर, निराला का जागो फिर एक बार का जागरण गान, माखनलाल चतुर्वेदी का मुझे तोड़ लेना वनमाली का बलिदानी संकल्प तथा प्रसाद जी का स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती की आवाज का एक नया संदेश प्रसारित कर रहा था । कवियों की रोमांटिक मनोभूमि अपराजेय संकल्प से भरी हुई थी । इस समय गांधी का नेतृत्व क्रांतिकारी ही नहीं विस्मयकारी था । इसी से प्रेरणा पाकर माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, भगवतीचरण वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, बच्चन, नवीन जवानी की कविता लिखते थे । जो तरंग मैथिलीशरण गुप्त की भारत भारती से उठी वो उसे आगे की राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक कविता एक सृजनशील अर्थ में बदल गई । सियाराम शरण गुप्त की ‘बापू’ कविता में गांधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करुणा, विश्वबंधुत्व शांति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है । रामनरेश त्रिपाठी, गया प्रसाद शुक्ल, श्रीधर पाठक आदि कवियों ने काव्य रस के आधार पर देश के उद्धार के लिए आत्मोसर्ग की भावना उत्पन्न थी ।
इन कवियाें के राष्ट्रीय गीत न केवल हिन्दी की श्रष्ेठ गीत हैं अपितु राष्ट्रीय चेतना की उदात्त भावना से ओतप्रोत उच्च कोटि के राष्ट्रीय गान हैं । ये गीत देश के प्रति अनुराग की भावना जगाने के साथ–साथ जननी जन्म भूमि के पावन चरणों पर श्रद्धानत हो आत्म बलिदान कर देने की प्रेरणा प्रदान करते हैं । इस प्रकार हिन्दी साहित्य की राष्ट्रीय कविताआें में जहां एक ओर पराधीनता के प्रति क्षोभ का भाव अभिव्यक्त किया गया है वहीं दूसरी ओर देश के गौरवपूर्ण अतीत का गुणगान करते हुए देश के प्रति प्रेम का भाव प्रकट हुआ है । शोषण–अन्याय, पूँजीवादी और अंग्रेजी शासन केप्रति विद्रोह एवं क्रांति के स्वर प्रस्कुटित हुए हैं । राष्ट्रीय उद्बोधक कवियों ने देश की समस्याओं में अपेक्षित सुधार लाने की भी प्रेरणा प्रदान की । संक्षेप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में जहां लाखों योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहूति दी वहीं हिन्दी साहित्य के कवि भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहे । स्वतंत्रता के यज्ञ में कवियों ने अपनी काव्य रस की आहुति देकर राष्ट्रीय कविता के ओजस्वी स्वरों की गूंज के द्वारा देशप्रेम की भावना उत्पन्न की । राष्ट्रीयता का भाव मानव का प्रथम पायदान है । कवियों ने कविता, गीतों, गजलों, लेखों, संपादकीय आदि के माध्यम से जन–जन तक व्यक्ति के अंदर राष्ट्रीयता का संचार किया । यानी हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय चेतना की सुप्तधारा को नयी दिशा मिली और जनजागरण को नयी चेतना और जागृति मिली जिसने भारत की आजादी में अपना अहम योगदान दिया ।
मेरी जाँ न रहे, मेरा सर न रहे, सामाँ न रहे, न ये साज रहे
फकत हिन्द मेरा आजाद रहे और माता के सिर पर ताज रहे ।
-माधव शुक्ल

