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बाढ की राजनीति से बदहाल जिन्दगी

 

विनय दीक्षित:जिले में राप्ती नदी की बाढ, प्रशासन का हाईअलर्ट, स्थानीय पीडितों पर अश्वासनका बोझ, राजनीतिक दावपेंच, ज्ञापन और धर्ना पर््रदर्शन, यह हर साल वषर्ात के मौसम का दृष्य है। राप्ती नदी या किसी भी नदी में पानी का स्तर बढÞना यानी बाढÞ आना स्वाभाविक बात है।
बाढÞ किसी के लिए समस्या है तो किसी के लिए समाधान। वषर्ात के मौसम में बाढÞग्रस्त क्षेत्र के लोग जहाँ अपनी जान की सुरक्षा को लेकर रस्साकसी करते हैं, वहीं सरकारी और गैरसरकारी निकाय के अधिकारी इसे अवसर के रूप में देखते हैं। हर वर्षराहत और उद्धार के नाम पर लाखों रूपये बेहिसाब खर्च होता है, लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं हो रहा। वषोर्ं पहले जो स्थिति थी, आज उससे भी बदतर स्थिति है।Badi-1
बाढÞ पीडितों को भी विभिन्न पार्टियों का सहारा मिलने लगा है। जिला प्रशासन में ज्ञापन हो या धर्ना विना नेता के कोई काम नहीं होता। अलग-अलग गुटों में अलग अलग समय पर लोग जिला प्रशासन पहुँते हैं। मानो मधेशी पार्टियों की तरह इनमें भी विभाजन चल रहा हो।
इतना ही नहीं तटबन्ध निर्माण, मरम्मत और सुधार का कार्य भी वषर्ात में ही होता है। न तो बोरी की गिनती सही होती है और न कर्मचारियो की नीयत। विल भरपाई और एस्टिमेट के आधार पर रकम निकासा होता है। स्थानीय स्तर के कुछ सामाजिक अगुवा इन कर्मचारियों के साथ होते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर किसी किसिम का विरोध भी नहीं होता।
बाढÞ के मामले में जिले का अत्यन्त संवेदनशील माना जानेवाला होलिया गाबिस की समस्या को गम्भीरता से लेते हुए सरकार ने २०५७ साल में १ सौ ५० परिवार के ५७ लोगों को स्थानीय झोरा सामुदायिक बन और गंगापुर स्थित रामजान की सामुदायिक बन में जमीन दी थी।
कुछ लोगों ने प्राप्त जमीन में तत्काल ही घर बनालिया तो कुछ ने बिक्री और फेर बदल कर लिया। २०५७ साल में बाढÞ की समस्या जटिल न होने के कारण अधिकाँश ने घर नई जगह में नहीं बनाया। और २/३ महीने हल्ला बवाल मचाने के बाद पुनः अपने पुराने घरों मे रहने लगे।
लेकिन बाढÞ की समस्या निरन्तर प्रति वर्षबढÞती गई। होलिया के अलावा फत्तेपुर, बेतहनी, गंगापुर और मटेहिया भी बाढÞ की चपेट मे आने लगे। अब तक होलिया अकेले ही सरकार के खिलाफ संर्घष्ा करता था लेकिन अब उस संर्घष्ा में अन्य स्थान के लोग भी शरीक होने लगे।
स्थानीय प्रशासन की उस समय बोलती बन्द हो गई, जब होलिया के लोगों ने गैर बाढÞ पीडित लोगों के द्वारा कब्जा की गई जमीन वापस मागना शुरु किया। जिला अधिकारी जीवन कुमार वली ने आश्वासन दिया कि जमीन जहाँ खाली है, वहाँ पीडितों को स्थापित किया जाएगा। लेकिन जिन्होने कब्जा किया था, अब वे भी बाढÞ पीडित हैं और उन्होने जमीन देने से इन्कार कर दिया।
स्थानीय प्रशासन द्वारा सही निर्ण्र्ाान ले पाने की अवस्था आने पर इलाका प्रहरी कार्यालय भगवानपुर ने समस्या समाधान के लिए हाथ आगे बढÞाया। बैठक और जमीन नाप जाँच हप्तों तक चली। लेकिन पुलिस भी अन्ततः हार मान गई। पहले तो थाना में सहमति हर्ुइ कि खाली जगह पर होलिया के बाढÞ पीडितों को बसाया जाएगा। लेकिन बाद मे लोगों ने जमीन देने से इन्कार कर दिया।
राप्ती नदी के कारण मटेहिया का भगवानपुर और नेवाजी गाँव, गंगापुर का भोजपुर, दोन्द्रा, कुदरबेटवा, सोनवषर्ा और जमुनी गाँव भी इस वर्षभीषण बाढÞ की चपेट में हैं। भगवानपुर गाँव स्थित इलाका प्रहरी कार्यालय और गंगापुर के अस्थायी प्रहरी चौकी तथा सशस्त्र कैम्प भी बाढÞ की चपेट में हैं।
इसी बीच बाढÞ ग्रस्त क्षेत्र के दौरे पर पहुँचे प्रमुख जिला अधिकारी वली ने भगवानपुर के लोगों को अस्थायी रूपसे ३ महीने के लिए बन क्षेत्र में रहने की अनुमति दे दी और आश्वासन को स्थानीय लोगों ने आदेश समझ कर बन कब्जा करने की नीति अख्तियार कर लिया।
हिमालिनी से बातचीत में जिला अधिकारी वली ने कहा- मैंने तो सिर्फटेन्ट लगाकर ३ महीने रहने की बात कही थी लेकिन अगर किसी ने बनकब्जा किया है या घर निर्माण किया है तो यह पर्ूण्ातः अवैधानिक है और इस मामले को गम्भीरता से लिया जाएगा।
भगवानपुर गाँव तो नदी कटान से और ज्यादा प्रभावित है। ३ सौ ५० से अधिक घर परिवार वाले इस गाँव से महज ६५ लोगों को गणपति सामुदायिक बन क्षेत्र में स्थानान्तरित किया गया है। बन पदाधिकारियों ने तो बाढÞ पीडितांे को बडेÞ दबाव के बाद बन क्षेत्र में रहने की अनुमति दी।
गणपति सामुदायिक बन के अध्यक्ष राजेन्द्र दीक्षित ने कहा- बन कानून के हिसाब से बन में बस्ती नहीं बसाया जा सकता। हाँ, यदि सरकार ही ऐसा निर्ण्र्ााकरती है तो हमें भी मञ्जूर है। लेकिन सामुदायिक बन किसी को ऐसी अनुमति नहीं दे सकता।
बाढÞ का समाधान सिर्फस्थानान्तरण ही नहीं है। बल्कि तटबन्ध निर्माण और हरे वृक्ष लगाना भी है। लेकिन सरकार और जनताका ध्यान सिर्फखीचातानी की ओर दिखता है। सिर्फएक बार समस्या निदान के लिए विना कमीसन और घुसखोरी के काम करने का संकल्प ले लिया जाए तो यह कोई बडी समस्या नहीं है। सम्बन्धित निकाय और लोगों को इस विषय पर भी गम्भीरता से सोचना चहिए। िि  ि

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