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“हे राम’ नहीं ‘हराम’ कहिए” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा

 

बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बिरगंज । (व्यंग्य) । महात्मा गांधी के मुंह मे हर समय ‘हे राम’ ही रहता था । वह तन और मन से राम के ही थे । ईसी लिए मरते समय भी उनके मुंह से हे राम ही निकला । पर दु:ख की बात यह है कि गांधी का हे राम अब ‘हराम’ हो गया है । चारों तरफ बेईमानी और भ्रष्टाचार जब राज करने लगे तब हे राम भी मूंह छूपा कर आंहे भरतें है रावण जैसा हराम अट्टहास करने लगता है । जो जितना बडा हरामखोर है वह उतना ही सीना चौडा कर के चलता है और समाज में सम्मानित भी होता है । बेईमानी और भ्रष्टाचार अब मौसमी फूल की तरह नहीं रहे । यह बाह्रों मास कैक्टस की तरह हर कंही उग रहे हैं और हम ईसके कांटो से बचा नहीं पा रहे ।
अपने ही देशका बेईमानी के कारण हुए बेहाल देख लिजिए । एक अदना सा सरकारी कर्मचारी अपने बाईस साल के नौकरी पेशा जीवन में बाईस जगह घर बना चूका है और बहुत से शहरों में उसकी प्रोपर्टी या जमीन है । यह कंहा से संभव हुआ ? आसमान से तो ईतने पैसे नहीं बरसे न तो गडा धन ही मीला था । बस राष्ट्र सेवक बन कर देश को लुटते रहे । जनता की खून पैसे की कमाई पर ऐसे ऐश करते रहे जैसे बाप दादा की कोई जागिर हो । यह कैसा राष्ट्र सेवक है जो ईतनी बेईमानी करने के बाद भी अपने पद पर बहाल है । वजह साफ है उसको उस पद पर बनाए रखने वाले भी तो दूध के धूले नहीं है । उस आदमी ईतनी भ्रष्टाचार कर के कमाते हुए उन सब को भी तो दक्षिणा दिया ही होगा तब न उसको उस पद पर पहुंचा कर उंहा तक टिकाए रखा ।
और सरकार तो खुद ही भ्रष्टाचार की जननी है । यदि सरकार भ्रष्ट न होती या कम बेईमान होती तो महँगाई ईस तरह नहीं बढती जिस तरह खरगोश की चाल में बढ रही है । और नेपाल आयल निगम दिन दुगुना रात चौगुना तेल पेट्रोल, डिजेल और गैस का भाव बढा कर रातोंरात खायल निगम नहीं बन जाता । ईसके कर्मचारियों का मुंह सुरसा राक्षसी से बडा है जो बोनस के रुप में अरबों रुपैंया हजम कर जाते है और डकारते भी नहीं । ईनके डकारने की आवाज तब आती है जब खायल निगम तेल का भाव अपने मन माफिक बढा कर देश के नागरिकों को घायल करता है ।
ईस देश में कोरोना का वैक्सिन भी गधे की सिंग की तरह गायब हो जाता है । तेईस लाख वैक्सिन गायब हो गया और पता भी नहीं चला । सोया हुआ स्वास्थ्य विभाग है डाकू जैसे डाक्टर वाले देश में कोरोना का वैक्सिन तो रातोंरात गायब हो जाता है पर कोरोना जंहा का तंही रहता है और फलता फुलता ही जाता है । यह सब हो रहा है सरकार नाम के मिलिभगत में । ईसी लिए तो सरकार चूं भी नहीं कर रही न बता रही है की तेईस लाख वैक्सिन गया तो कंहा गया ? सरकार अंगद के पैर कि तरह बिना टसमस हुए खडी है पर उसके पैर भ्रष्टाचार के कारण सड चूकी है । ईस देश के प्रधानमन्त्री को यहाँ तक नहीं मालुम कि उनको करना क्या है ? बस अपने पद पर बने रहना और मंत्री और नेताओं की बेईमानी पर आंख मुंदे रहना है । सरकार खुद हराम है ईसी लिए तो हरामों का राज है ।
नेता वह दिमक है जो देश को चाट – चाट कर भितर से खोखला कर चूके हैं । देश नाम मात्र का सार्वभौम सत्ता सम्पन्न है और देशवासियों में स्वाभिमान का लेश मात्र भी नहीं है जिसको जंहा मील रहा है वंही हाथ धो कर बेईमानी को गले लगा कर भ्रष्टाचार कर रहा है । और किसी में पुछने कि हिम्मत भी नहीं है । क्यों कि वह खुद बेईमान है तो पुछेगा कैसे । बस सब चोर-चोर मौसेरे भाई बन कर बेईमानी कर के अपना खजाना भर रहें है । वैसे ईस देश में जनता नाम के प्राणी नगण्य है । बांकी सब विभिन्न राजनीतिक दल का झोला और झंडा उठाए हुए हनुमान और चम्चे हैं । यह बस मूंडी हिलाना जानते हैं प्रश्न करना नहीं ।
ईस देश मे विमान स्थल से बरामद हुए तेंतीस किलो सोना अचानक किसी जादू मंत्र से पित्तल में परिवर्तन हो जाता है । यह किसी रासायनिक प्रकृया से हुआ या बेईमानी से यह पुछने की नैतिकता और जवाब देनें का साहस किसी में नहीं है । बडे- बडे घोटाले होते हैं । बडे-बडे नेता या मंत्री पकडे भी जाते है । पर सब अंत में शादी के समय ससुराल से मिले दहेज बता कर छूट जाते हैं । ईतनी मालदार ससुराल ईस धरती में ही हैं कि और कंही कोई खोज तलाश नहीं करता । कितना मजे का देश है न जितना चाहे भ्रष्टाचार करो, काली कमाई को सफेद भी बना लो और सफेदपोश ईमानदार भी बने रहो ।
ईस देश के भेंड जनता पृथ्वी नारायण शाह को अति राष्ट्रवादी और देश का निर्माता भी मानते है । अपने फायदे के लिए गोत्र बदलने वाला और बहू- विवाह करने वाला राष्ट्रवादी कैसे हो गया । पृष्ठभूमि नारायण शाह ने अपने राज्य का विस्तार किया खुद को बलशाली बना कर सब पर हुकुमत करने के लिए । विजय उन्माद में कईयों के नाक काटे और आंख फोड दिया फिर भी उन्हीं की स्तुति गान करते हैं । राज्य विस्तार को देश का एकिकरण समझने वाले मुर्ख जनता जिस देश में हो वहां बेईमानी और भ्रष्टाचार न लहलहा कर क्या गेहूं या संरसो की बाली लहराएगी ?
“यह देश है बेइमानों और मक्कारो का,
ईस देश का यारों क्या कहना,
यह लुटेरों के हाथों का है गहना” ! 💐

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