बेईमानी का अवसर :- बिम्मी कालिन्दी शर्मा,

व्यगंय-बिम्मी कालिन्दी शर्मा, वीरगंज, हम सब वह ईमानदार है जिन्हें अभी तक बेईमानी का अवसर नहीं मीला है । जहां अवसर मीला हम भी दिखा देगें कि बेईमानी करने में किसी से भी कम नहीं है । जरा मौका तो दे ए-खुदा हम भी अपनी जमीर बेचने के लिए तयार बैठे हैं । बस क्या करें मौका नही मील रहा है ईसी लिए ईमानदारी का ढोंग कर के दुसरे बेईमानों को कोस रहे हैं कि वह देश को बेच कर खा गया ईसी लिए देशद्रोही है । यदि हमें मौका मिले तो हम देश तो क्या पूरी दुनिया बेच कर गटक जाएगें और डकार भी नहीं लेगें । हां हम ऐसे ही हैं उथले पानी में खडे हो कर ईमानदार होने का नाटक कर रहे हैं ।
कभी नदी में एक टांग में खड़ा बगुले को देखा है। ? दूर से देखने में लगता है कि वह तपस्या कर रहा है पर वह एक टांग में खड़ा हो कर ध्यानस्थ मूद्रा में नदी के अंदर मछलियों को ताकता रहता है । जहां मछली उपर दिखी अपने चोंच से मछली को पकड कर उदरस्थ कर के फिर से ध्यानस्थ हो जाता है । दिखने में वह बगूला भी किसी भगत से कम नहीं लगता । हम भी वैसे ही बगूला भगत है जो बेईमानी की मछली पकड्ने के लिए व्यग्र है पर मछली है की हाथ आती नहीं । तो जब तक मछली हाथ न आए ईमानदारी का माला जपते रहते हैं और बेईमानों जी भर कर कोसते और गाली देते हैं ।
गोही के शरीर में जब नमक ज्यादा हो जाता है तब वह आंख से आंसू बन कर बहता है । देखने वाले को लगता है की गोही कितना सीधा सच्चा है दुसरों के दु:ख में द्रवित हो कर उसके आंख से आंसू निकल रहा है । गोही के प्रति सहानुभूति हो जाती है । पर गोही तो कपटी है वह तो बातें मिठी-मिठी कर के बंदर को मार कर उसका कलेजा खाना चाहता है । हम ईंसान भी तो वैसे ही हैं । बातें खूब मिठी-मिठी कर के दुसरों को अपनी जाल में फंसा कल लुटना खुब जानते हैं ।और बाहर से ईमानदारी का नाटक भी खूब करते है । ब्यापारी यही तो करते है बातों में फंसा कर हंसते-हंसते लूट लेते हैं और सामने वाले को पता भी नहीं चलता कि वह लूट चूका है ।
अब ब्यापारियों कों भी मात दे कर यह काम नेता लोग कर रहे हैं । चुनाव में बडे-बडे वादे कर के जनता को चूना लगा जाते हैं । पांच साल खूब ऐश कर के अपने चुनाव क्षेत्र और वंहा की जनता को भूल जाते हैं । फिर जब दुसरा चुनाव आता है बडे-बडे वादों और चुनावी घोषणा पत्रों के साथ जनता के द्वार पहूंच कर फिर से पैर पकड लेते है अगली बार चूना लगाने के लिए । और जनता तो है ही निरीह बेवकूफ । फिर से चूना लगाने के लिए तयार हो कर अपना गाल आगे कर देती है । चूना और चुनाव का चोली दामन का साथ है । चुनाव के समय विपक्षों के बेईमानीयों के कच्चे चिठ्ठे पढे जाते हैं उनकी खटिया खडी की जाती है खूद को एकदम मासूम और ईमानदार बता कर । पर पांव के निचे सब की जमीन दरकी हूई है यह मालूम है फिर भी अपना चेहरा कोई आईना में नहीं देखता । बस आईने का धूल ही साफ करते रह जाते है । बेचारा आईना बोल पाता तो सब की पोल खोल देता ।
हम सच में ईमानदार होते तो ताला-चाबी की ईजाद नहीं हूई होती । हम बेईमान है, अपने पर नियन्त्रण नहीं है ईसी लिए ताला-चाबी लगा कर लोग सज्जन बने फिरते है । तब भी खिडकी या दरवाजे की छेद से ताकाझांकी करना नहीं छोड्ते । अब तो ताला-चाबी भी बेईमानों के लिए बाएं हात का खिलौना है । ईसी लिए तो अब हर जगह सिसीटिभी लगाया जा रहा है । ताकि हमारी ईमानदारी बनी रहे और बेईमानी करने के अवसर न आए । बेईमानी सब के खून में है बस मौका नही मीला ईसी लिए शराफत का नकाब लगाए बडे शरीफ बने फिरते हैं । अब किसके मन में क्या छूपा है यह कोई जान नहीं पाता । न ऐसी मेशिन ही बनी है कि मन के अंदर पक रहे षडयंत्र की खिचडी को सरेआम दिखाया जा सके । दिल अगर बेनकाब हो जाए तो किसी की भी खैर नहीं । पर खुदा ने भी ईस दिल को जख्मों से भर दिया पर ईसके अंदर के कपट को किसी को नहीं दिखाया । ईसी लिए तो हम सब बडी ढिठाई से अपनी ईमानदारी का स्वांग रच कर दुसरों को उंगली उठा कर चोर और बेईमान कहने में तनिक भी नहीं हिचकते । हम सब तभी तक ईमानदार हैं जब तक पकडे न जा सकें । जिस दिन पकडे गए उस दिन सारी ईमानदारी का भजन-किर्तन गूंगा हो जाएगा । जो राजनीति में गया, सरकारी नौकरी में गया और मालदार महकमा मीला वह तर माल डकार रहा है । और हम उसको डकारते हुए देख कर आंहे भरते हुए थूक निगलते है और लार चुहाते हैं । और बेइमानी करने अवसर का अपनी बारी का ईंतजार करते हैं….
ईंतहा हो गई ईंतजार की,
आई ना अवसर बेईमानी करने की……☺️😊

