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मधेश में नई पार्टी का उदय निश्चित : डा. विजय कुमार सिंह

 

डा विजय कुमार सिंह, महोतरी ।संविधान सभा से जारी संविधान के तहत निर्वाचित विभिन्न तह की सरकारों की कार्यावधि अब समाप्ति की ओर है और पुन: इन सरकारों के गठन के लिए निर्वाचन प्रक्रिया की ओर देश की राजनीति उन्मुख हो रही है। सर्वोत्कृष्ट कही जानेवाली संविधान की सफलता – असफलता का निष्पक्ष विश्लेषण, चिन्तन मनन एक महत्वपूर्ण विषय-वस्तु तो है ही पर इसके कार्यान्वयन और समुचित परिमार्जन की प्रमुख जिम्मेवारी निश्चित रूप से राजनीतिक दलों की ही थी और है भी।संविधान के निर्माता और प्रमुख कर्ता-धर्ता सत्ताशीन और प्रमुख प्रतिपक्षी राजनीतिक दलोँ के साथ ही नयी संविधान मे संघीयता की अवधारणा को मूर्त रूप दे पाने की दावा करने वाले मधेशी दलों की स्थिति क्या है , जिन्हे मधेश के जन आन्दोलन ने जन्म दिया , सम्बर्द्धित किया ? नेपाल के सबसे लम्बे , कड़े , सघन और महत्वपूर्ण पीड़ा और शहादत दिए इस महान मधेश आन्दोलन से प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रुप मे जुड़े राजनीतिकर्मी सहित सम्पूर्ण नागरिक समाज की जिज्ञासा स्वभाविक है और उन्हें अवगत होना ही चाहिए की इन मधैस वादी दलों की दशा और दिशा क्या है ?

बहुदलीय प्रतिस्पर्द्धात्मक राज्यप्रणाली मे दलों मे आन्तरिक प्रजातन्त्र , समावेशिता और जनसहभागिता की महत्वपूर्ण सुनिश्चितता स्थायी राजनीतिक एवं दीर्घकालिक लोक कल्याणकारी उपलब्धियों के लिए आवश्यक है । नेपाल और खासकर मधेशवादी दलों के सन्दर्भ मे यह अनिवार्य सा ही है। बड़े दलों की बहुमतीय तनाशाही का तानावाना और जालझेल मे कमजोर अल्पमतीय अधिकारवादी दल फस कर बेवश और असक्षम से होजाते है और सत्ता या पैसे एवं पदों कै लोभ मे नेतृत्व उन्ही शासक दलों के पिछलग्गू बन जाते हैं जिनके विरुद्ध निषेध आन्दोलन तक किया था और आन्दोलनकारी जनसाधारण समेत ने अमूल्य शहादतें दी थी।महत्वपूर्ण समस्या मधेस मे बृहत राजनीति शक्ति निर्माण और मर्यादित दलीय संस्कृति और सरंचना की थी जिसकी आशा संयुक्त मधेसी मोर्चा ( तमलोपा , मजफो और सद्भावना ) के महत्वपूर्ण आन्दोलन और तत्कालीन कार्यवाहक राष्ट्रप्रमुख , नेपाल सरकार प्रमुख और सात दलीय गठबन्धन प्रमुख के बीच हुए ८ बूँदें समझौता के बाद जगी थी। लगा था की मधेसी जनआन्दोलन का राप-ताप नेपाल और विशेषकर मधेस के नेतागणों की मन:स्थिति , चिन्तन , बानी और आचार व्यवहार में परिवर्तन लायेगा। पद ,पैसा और व्यक्तिगत मान सम्मान के जगह पर ईमानदार और स्वस्थ प्रजातान्त्रिक दलीय चरित्र , पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया और समावेशी सहभागिता के परम्परा की शुरुवात होगी पर अन्ततोगत्वा ऐसा हो न सका।
शहीदों के शवों के बोझ तले दबे मधेसवादी दलों ने विभिन्न क़िस्म के स्वार्थवस विभिन्न बहाने से नैतिकता को ताक पर रख कन्धे पर रखे जुवा को , धीरे-धीरे और फिर एक ही झटके में , निर्लज्जता की चादर ओढ़ते हुए उतार फेंका । मधेसी पार्टी के शीर्ष नेताओं को समाजवाद उन्मुख कम्यूनिस्ट नेताओं की “ हाई कमान संस्कृति “ या “ सर्वसत्तावादी केन्द्रित अधिकार “ सहज , सुखद और मनभावन लगने लगा।फिर मधेसी दलों के ये “ सुप्रिमों “ दल का विधान ही नहीं विचारधारा भी बन गए। ये अपने चंद सलाहकारों और सत्ता-शक्ति साझेदारों के साथ बैठ कर अपने हित अनुकूल निर्णय लेते हैं और कभी कभार , यदाकदा पार्टी के सुशोभन वा दिखावे के लिए बनाये गये विभिन्न इकाई या समितियों द्वारा इन निर्णयों को मात्र अनुमोदन करने की औपचारिकता या वाध्यता की स्थिति श्रृजित भी कर देते हैं । पार्टी के शेष नेताओं , ज़मीनी कार्यकर्ताओं एवं सदस्यों से यही उम्मीद की जाती है की वे हर परिस्थिति में इन निर्णयों का पालन करें और सिर झुकाये उनकी जी-हज़ुरी करें अन्यथा इसे शीर्ष नेतृत्व को चुनौती और वगावत माना जाता है ।इतना ही नहीं , उन्हें शंका के दायरे में रख विभिन्न क्रियाकलाप और गतिविधियों में सहभागिता के अयोग्य मान लिया जाता है और लाञ्छित, अपहेलित कर एक कोने में धकेल दिया जाता है।इस तरह पार्टी में अन्दरूनी लोकतंत्र को पनपने ही नहीं दिया जा रहा है और मज़बूत संगठन , स्तरीय प्रजातांत्रिक निर्णय प्रक्रिया , समावेशी सहभागिता , अल्पमत के समुचित विचारों की कद्र , विविधता समायोजन के लिए सम्मानपूर्ण जगह और सबसे महत्वपूर्ण भ्रष्टाचार और अनैतिक क्रियाकलापों के विरूद्ध उठती यथावत आवाज़ को दबाया जा रहा है ।

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वास्तविकता तो यह है की अपने सक्रिय इमान्दार सहकर्मियों को किनारा लगाते लगाते पार्टियाँ खुद ही सिमटती जा रही है , आम लोगों से कटती जा रही है। अब तो स्थिति यह है की मधेस आन्दोलन का राजनीतिक चेहरा , एक महत्वपूर्ण आयाम के अस्तित्व के ही गुम हो जाने के ही दुखद आसार दीख रहें हैं।पर यह असम्भव सा ही है। मधेस आन्दोलन , जिसे जन जन का अपनत्व प्राप्त है और जिसको उत्कर्ष पर पहुँचाने के लिए मधेसी जन समुदाय ने जेल , नेल और शारीरिक , मानसिक प्रताड़ना सहित बड़ी बड़ी क़ुर्बानियाँ दी है , अनेकों अमूल्य शहादतें दी है , निश्चित रुप से अपने राजनीतिक चेहरे का ध्वजवाहक स्थापित कर ही लेगा। मधेस आन्दोलन कोई पानी का बुलबुला नहीं , हवा का क्षणिक झोंका भी नहीं , इसकी जड़ें अत्यन्त ही गहरी है और युवा पीढ़ी मधेस के अधिकार , पहचान और सम्मान के मुद्दा और मूल्य- मान्यता के प्रति सम्पूर्ण रुप से समर्पित है ।
अत: संघीय गणतन्त्र नेपाल के अन्तर्गत मधेसी राष्ट्रीयता के कोख से एक सुसंस्कृत समावेशी और सुपरिणाम देने वाली सक्षम और जनभावना से जुड़ी पार्टी का जन्म सुनिश्चित है ।
अनन्त शुभकामना और समर्थन की प्रतिबद्धता।

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(डा विजय कुमार सिंह के वाल से)

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