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तीसरा विश्वयुद्ध विश्व के शर पर : कैलाश महतो

 
कैलाश महतो, पराशी | करोडों जन और खरबों के धन क्षति के साथ समाप्त हुए प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों ने तीसरे विश्वयुद्ध की छनक दे गयी थीं । दूसरे विश्वयुद्ध के समाप्ति के बाद विश्व में पसरे ब्रिटेन, जापान, जर्मनी जैसे देशों का औपनिवेशिक शासन तो खत्म‌ होना शुरु हुआ, मगर एक तरफ सामरिक शक्ति की दादागिरी और बदले भाव में प्रतिक्षारत कुछ मुल्कों ने बकुले के दृष्टि लगाये इस आक्रोश में विकास किया कि विगत के शक्तिशाली कहे जाने बाले राष्ट्रों से बदले लिये जा सके ।
दूसरे विश्वयुद्ध के समाप्ति पश्चात् सन् १९५५ में ताइवान के म्योकोउ और वास्ता प्रायद्वीपों को अपना भूभाग करार देते हुए चीन ने ताइवान पर आक्रमण की थी । भीषण बमबारी को देखते हुए अमेरिका ने चीन से ताइवान पर किये जा रहे आक्रमण और बमबारी को रोकने या अमेरिकी आक्रमण को झेलने को तैयार होने का चीन को हिदायत दे दी । अमेरिका के उस धमकी के कारण चीन ने आक्रमण रोकने के साथ ही ताइवान पर आक्रमण करना भी छोड दिया । मगर इस बात को चीन ने गठरी बांध ली कि ताइवान के अधीन में रहे चीन के नजर के वे दो प्रान्त तो लेने ही है, उन प्रान्तोंं को जब्त करते समय रास्ते में जो भी आयेगा, या तो उसे भष्म कर दिया जायेगा, या आमने सामने लडकर भी हासिल करेगा – के योजना अनुसार चीन ने तकरीबन साढे दो दशक तक आर्थिक और सामरिक शक्ति का निर्माण और विकास किया । आज आलम यह है कि चीन दुनियां का सर्वशक्तिमान अमेरिका के लिए लोहे का चना बन‌ बैठा है । वह अमेरिका को उकसाता नहीं है । मगर वह चीन के स्वार्थ से टकराया तो फिर स्थिति अमेरिका के लिए भी गंभीर ही सावित होगा ।
फ्रांस के भविष्यवेता नास्त्रेदमस को माने तो सन् २०२२को उन्होंने तीसरे विश्वयुद्ध का ताण्डवीय महाभारत का कुरु क्षेत्र कहा है । वैसे आज भी पूरे दुनियां में १८० देशों में कोई न कोई और किसी न किसी रुप से युद्ध और गृहयुद्ध में लिप्त है । छोटे बडे सारे युद्धों को जोडा जाय तो प्रथम विश्वयुद्ध से आजतक के दुनियां ने ३२,००० से ज्यादा युद्धों को झेला है । लेकिन नास्त्रेदमस के अनुसार अगर तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो शुरुवात तो रुस और यूक्रेन से होना तय है । मगर इसका अन्त कहाँ कैसे होगा, यह अनुमान करना बचपना होगा । कहा यह जा सकता है कि तीसरा विश्वयुद्ध विश्व के शर पर है ।
किसी जमाने से सन् १९९० तक सोभियत रुस का ही हिस्सा रहा यूक्रेन आज एक स्वतंत्र राष्ट्र है ।‌ गौर से उसके नक्शे‌ को देखें तो वह यूरोप में समाया सा प्रतित प्राकृतिक ग्यास और अत्याधुनिक सामरिक हथियारों का देश है । सोभियत रुस ने सामरिक हथियारों का उद्योग और भण्डारण भी युक्रेन में ही रखा था ।
वैसे तो युक्रेन पर‌ उसका प्राकृतिक ग्यास युरोप को बेचने पर रुस द्वारा मना करने की बात सुनी जाती है ।‌ मगर बात वह नहीं है । कोई भी देश अपने पास रहे प्राकृतिक और कृत्रिम उत्पाद और संसाधन अन्तराष्ट्रीय बाजार में बेचेगा । उस पर दुनियां का कोई देश आपत्ति जताने की बात लगभग न्यून है । बात दर असल यह है कि युक्रेन रुस के बढते शक्ति और उसके दबाव से सुरक्षित होने के लिए यूरोप और अमेरीका के सहयोग से नेटो (NATO) राष्ट्र‌ का सदस्य होना चाहता है, जो रुस को पचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है ।
रुस एक शक्ति सम्पन्न राष्ट्र है । रुस से अमेरिका विगत से ही त्रसित रहा है । रुस का सामरिक शक्ति की क्षति अमेरिका के लिए रणनीतिक लाभ है । युक्रेन को नेटो राष्ट्र का सदस्य बनाकर यूरोप और अमेरिका एक तरफ उसके सुरक्षा के नाम पर नेटो सेना को युक्रेन और रुसी सीमा पर तैनाथ करने की रणनीति तैयार की है, वहीं रुस इस बात से वाकिफ होकर अपने सुरक्षा के लिए युक्रेन को नेटो राष्ट्र का सदस्य बनने में टांग अडा रहा है । दर असल रुस और युक्रेन दोनों अपने अपने सुरक्षा के लिए चिन्तित हैं ।
रुस और युक्रेन के बीच सुरक्षा मामले को‌ लेकर बढ रहे चिन्ता और सम्भावित युद्ध को उकसाने में अमेरिका और यूरोप तन, मन और धन समेत से सहयोग करने की आहट व्याप्त है । रूस ने मोटामोटी तौर पर यूक्रेन पर १६ फेब्ररी को आक्रमण करने का संकेत है । युद्ध के लिए  दोनों पक्ष : रुस और युक्रेन अपने‌ अपने तैयारी में लग चुके हैं ।‌ दोनों मे से कोई पीछे हटने की संकेत नजर नहीं आ रहे हैं । इस हालात में रूस और युक्रेन के बीच अवश्यंभावी युद्ध को देखकर उसमें हिस्सा लेने अमेरिका और यूरोप का पहुँचना भी कूटनीतिक मजबूरी होगा ।
दिलचस्प बात तब यह होना तय है कि उस समय दुनियां लगभग दो हिस्सों में बंटेगा । एक हिस्सा का नेतृत्व अमेरिका करेगा और दूसरे हिस्से का नेतृत्व रुस ।‌ भारत और मिड्ल‌ इष्ट के कुछ देश न्यूट्रल रहने का संकेत तो दिखेगा । मगर भारत लगायत के कुछ देश न्यूट्रल रहने के बावजूद पूर्ण तटस्थ नहीं रह पायेगा ।
विश्वयुद्ध के चंगूल में रहे अमेरिका और रुस के अस्तव्यस्ता के मध्य में चीन उपर उल्लेखित ताइवान के दो प्रान्तों को हथियाने के रणनीति अनुरुप वह ताइवान पर आक्रमण करेगा । चीन बखुबी जानता है कि अमेरिका का सामरिक शक्ति ही उसका खुद का मूल शत्रु है । अपने उसी शक्ति को बचाने और कायम रखने हेतु अमेरिका‌ ने दुनियांभर में अपना शक्ति तीतर बितर कर रखा है । रुस और युक्रेन सम्मिलित विश्वयुद्ध के दौरान सारे दुनियां में अपना शक्ति बांट चुके अमेरिका ताइवान पर‌ आक्रमण कर रहे चीन से टकराने का गलती नहीं करेगा । अगर अमेरिका ने ऐसा किया तो फिर अमेरिका के खिलाफ चीन के साथ उत्तर कोरिया, मिड्ल‌ इष्ट के कुछ मुल्क, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, अफ्रीकी कुछ मुल्क भी अमेरिका के खिलाफ और चीन तथा रुस के साथ खडे होने की संभावना प्रबल होगा ।
उस अवस्था में तटस्थ रहने के कोशिश में रहे भारत को भी किसी न किसी के पक्ष में खुलना बाध्यता होगा । वक्त और परिस्थिति ऐसा होगा कि दुनियां भर में एटम, हाइड्रोजन, न्यूक्लियर जैसे बमों की असंख्य वर्षा होगी ।‌ अनेक सामरिक‌ शक्तिशाली हतियारों तथा मिसाइलों का प्रयोग होगा । दुनियां राजनीतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक, प्राविधिक, आर्थिक तथा मानवीय रुप‌ में गंभीर जटिलता का शिकार होगा । असंख्य और असीमित जन धन की क्षति  होगी । मानव और उसके राजनीति पर एक गंभीर प्रश्न खडा होगा ।
अकल्पनीय क्षति और बर्बादी के बाद तीसरा विश्वयुद्ध समाप्त होगा और पून: चौथे विश्वयुद्ध के लिए  तैयारियाँ शुरु होंगी ।

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