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बस वही एक है जो अपना सा लगता है, बाकी रिश्तों का रस सपना सा लगता है : “अंचल”

 

अपना सा लगता


बस वही एक है जो अपना सा लगता है
बाकी रिश्तों का रस सपना सा लगता है

एकाग्र न होता और कहीं मन दुनिया में
बस बेमन से माला जपना सा लगता है

तप करें तपस्वी कहे भले दुनिया हमको
तप उस बिन केवल तन तपना सा लगता है

हों भांति भांति के व्यंजन चाहे थाली में
रुचि भोग बिना उसके चखना सा लगता है

मेहनत करलें चाहे अच्छा परिणाम मिले
फिर भी मन को केवल खपना सा लगता है

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दो घूँट मिले यदि जल उसके कर से अंचल
कर पात्र हमें पूरा नपना सा लगता है।।।।।

ममता शर्मा “अंचल”
अलवर (राजस्थान)

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