मिलेनियम चैलेन्ज कॉरपोरेशन क्या सचमुच अहितकर है ? : डा. श्वेता दीप्ति
क्या वे श्रीलंका की तरह बनना चाहेंगे जिन्होंने इस एमसीसी समझौते को कुछ वजहों से रद्द कर दिया या फिर मंगोलिया की तरह, जो की नेपाल की ही तरह से बंदरगाह विहीन देश होने के बावजूद, इसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर पा रहा है ।

डा. श्वेता दीप्ति, अंक फ़रवरी २०२२, हिमालिनी |
बात २००२ की है, जब नेपाल सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से अनुरोध किया था कि हमें ऋण नहीं चाहिए क्योंकि, पहले से ही नेपाल ऋणभार से दबा हुआ है । इसलिए हमारी अनुदान की राशि बढ़ा दी जाय । यही वह समय था जब २००४ में मिलेनियम चैलेन्ज कारपोरेशन बना था । यह वह संस्था है जो विकसित देशों के द्वारा अविकसित देशों को सहायता प्रदान करती है । नेपाल के द्वारा इस सहयोग को प्राप्त करने की कोशिश की गई और संस्था द्वारा निर्धारित मापदंडों पर नेपाल खरा उतरा । नेपाल जलस्रोत का धनी देश है और बिजली उत्पादन के तहत इसकी आर्थिक अवस्था बेहतर हो सकती है, यह बात सामने थी और प्रयास के फलस्वरूप २०१७ में नेपाल ने अमेरिका के साथ एमसीसी समझौता किया ।
चूंकि भविष्य के लिए हम जो प्रमुख वस्तु निर्यात कर सकते हैं वह बिजली है, इसका मुख्य बाजार भारत में इलेक्ट्रिक ट्रांसमिशन लाइन बनाना है । नेपाल ने इस आवश्यकता के आधार पर अपनी योजना का चयन किया है और समझौते के अनुसार अब कार्यान्वयन चरण में प्रवेश करने का समय है । इस परियोजना को संसद द्वारा पारित किए जाने का प्रावधान सिर्फ नेपाल के लिए नहीं है बल्कि वियतनाम, निकारागुआ और बोलीविया जैसे वामपंथी देशों ने भी इसी प्रक्रिया के माध्यम से एमसीसी को लागू किया है । एमसीसी का विरोध इसलिए किया जा रहा है क्योंकि, एक पक्ष है जो इसे ट्रम्प शासन में लाए गए इंडो–पैसिफिक स्ट्रैटेजी (आईपीएस) से जोड़ कर देख रहे हैं । बहुतों को यह चीन के खिलाफ लग रहा है और वो यह मानते हैं कि इस सहायता से नेपाल में सेना आ सकती है । जबकि एमसीसी एक ऐसी परियोजना है जो शुद्ध आर्थिक विकास और सुशासन और बड़ी परियोजनाओं में योगदान करती है ।
यह सच है कि जब कोई छोटा राष्ट्र दो बड़े शक्तिशाली राष्ट्रों के बीच स्थित हो तो उसे सतर्कता अवश्य अपनानी चाहिए । यहाँ एमसीसी के विरोध में एक मानसिकता काम कर रही है कि चीन और अमेरिका दोनों ही विश्व में नम्बर एक बनने की दौड़ में शामिल है और चीन नेपाल का करीबी हितैषी है । ऐसे में अगर नेपाल अमेरिका से सहयोग लेता है, तो कहीं चीन की नाराजगी ना झेलनी पड़ जाय । किन्तु वस्तुस्थिति तो यह है कि तमाम विरोधों के बावजूद चीन और अमेरिका के बीच एक मजबूत व्यापारिक सम्बन्ध है । ऐसे में हमारा यह डर बिल्कुल निराधार है । देश हित के लिए जो सही हो उसे किसी अन्य राष्ट्र की नाराजगी के डर से नकारना भविष्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है । हाँ, हमें सावधान अवश्य रहना चाहिए कि हमें मिलने वाली कोई भी सहायता भू–राजनीति के अधीन नहीं होगी । और इस सतर्कता के साथ, हमें अपनी राष्ट्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने पर भी ध्यान देना चाहिए ।
एम सीसी विकसित देश द्वारा अविकसित देश को दिए गए आर्थिक सहायता का हिस्सा है । अमेरिका ने पहले से ही नेपाल और अफ्रीकी देशों में बहुत अधिक ऋण का निवेश किया है, इसलिए नेपाल के लिए अनुदान की राशि ही हितकर साबित हो सकती है । खुद अमेरिका ने कहा है कि एमसीसी विशुद्ध रूप से आर्थिक विकास का विषय है, न कि सैन्य से संबंधित है । एमसीसी के बारे में बात करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि यह ऋण नहीं बल्कि अनुदान है । इस स्थिति में इस योजना को लम्बे समय तक अटकाए रखना उचित नहीं है । एमसीसी पर जो भी शंका या विरोध है उसे तत्काल समाप्त किया जाना ही देश हित में है, क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो नेपाल और अमेरिका के मित्रवत रिश्ते पर इसका नकारात्मक असर पड़ने से नकारा नहीं जा सकता है । हर योजना परियोजनाओं को अति राष्ट्रवाद से जोड़कर उस पर अनावश्यक रूप से बहस या विवाद करना हानिकारक सिद्ध हो सकता है ।
नेपाल २०१७ के बाद से मिलेनियम चैलेंज कारपोरेशन (एमसीसी)–नेपाल कॉम्पैक्ट के अनुसमर्थन÷समर्थन को लेकर राजनीतिक दलदल में फंसा हुआ है । इस मुद्दे पर पूरी बहस उन लोगों के बीच ध्रुवीकृत है जो इसे नेपाल के विकास के लिए अपरिहार्य अनुदान के रूप में समर्थन करते हैं और जो लोग इस आधार पर इसके विरूद्ध हैं कि यह नेपाल के राष्ट्रीय हित को कमजोर करेगा यह तर्क देते हैं कि यह अमेरिका की हिंद–प्रशांत रणनीति (यूएसआइपीएस) का हिस्सा है । हालांकि प्रधानमंत्री (पीएम) के.पी. ओली के नेतृत्व में पिछली राजनीतिक व्यवस्था ने एजेंडे को पटरी पर लाने की कोशिश की थी, लेकिन नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के भीतर के साथ–साथ बाहर से भी भारी विरोध के बाद यह सम्भव नहीं हो पाया । नेपाली कांग्रेस (नेकां) के नेतृत्व में मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन भी एमसीसी पर बंटा हुआ है और नेपाल की राजनीति इस मुद्दे पर पूरी तरह से तरंगित है ।
विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के बीच गंभीर मतभेद की वजह से, अब सारा देश ही इस मुद्दे के ऊपर बँट सा गया है, जहां की एक घड़ा इस समझौते का समर्थन कर रहा है तो दूसरा इसका विरोध ।. जो लोग इस एमसीसी अग्रीमन्ट का समर्थन कर रहे है वो इनके पक्ष में यह दलील दे रहे है की इससे प्राप्त भारी धनराशि से उनके देश में सड़क और हस्तांतरण लाइन बनायी जा सकेगी, जो की देश के विकास के लिए काफी महत्वपूर्ण है ।
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ये भी तर्क दिया जाता है कि एमसीसी के अंतर्गत मिलने वाली अमेरिकी डालर ५०० मिलियन के एक हिस्से का इस्तेमाल काठमाडौं–हेटौडा –बुटवल ट्रान्जमिशन लाइन के निर्माण के लिए होगा, जो इस हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से कुल ३००० मेगावाट की बिजली वितरण करेगी । ऐसी भी योजना है कि भविष्य में इस प्रोजेक्ट से पैदा होनेवाली अतिरिक्त बिजली को भारत में गोरखपुर में भी बेची जाएगी । काफी उम्मीदें इस प्रोजेक्ट से है कि इसके आने से लोगों की आय बढ़ेगी और साथ ही लोगों के लिए रोजगार के काफी अवसर उपलब्ध होंगे, गरीबी रेखा में भी काफी कमी आएगी और फिर, इससे देश के आर्थिक विकास के दर में भी तेजी आएगी ।
दूसरी तरफ, आलोचकों का मानना है कि एमसीसी, नेपाल के राष्ट्रीय प्राथमिकता के खिलाफ है जहा वे भूमि के कानूनों का स्थान लेता प्रतीत होता है । उनका मानना है कि इस समझौते के बाद देश की समस्त बौद्धिक संपदा के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का आधिपत्य हो जाएगा । ये भी शक किया जा रहा है कि इस समझौते से सीधा फायदा भारत को मिलेगा, क्योंकि इस प्रोजेक्ट के तहत, बनने वाली ट्रांसमिशन लाइन को आगे जाकर भारत के साथ भी जोड़ा जाएगा ।
आलोचकों का ये भी मत है कि ये एमसीसी समझौता अमेरिकी प्रशासन की एशिया–पेसिफिक नीति का हिस्सा है, और ऐसी स्थिति मे,वो नेपाल को अमेरिकी रणनैतिक डिजाइन के अंतर्गत आने को विवश कर सकती है । साथ ही वे ऐसा समझते है कि बीआरआई का उद्देश्य ही है, चीन के बीआरआई युक्त मोडेल से मुक्ति ।
एमसीसी को लेकर चल रही दुविधा के तत्काल निपटारण की आवश्यकता को भांप कर एमसीसी की उपाध्यक्ष फातेमा जÞ. सुमर, ९ सितंबर को नेपाल आईं थीं । उनके चार दिवसीय दौरे के दौरान, विभिन्न पार्टी के नेताओं के साथ उनकी बातचीत का दौर काफी व्यस्त रहा । विभिन्न राजनीतिक नेताओं और मीडिया के साथ के बातचीत में , सुमर ने ये बात साफ करने की कोशिश की कि एमसीसी किसी भी प्रकार से इंडो–पेसिफिक नीति स्ट्रैटिजी का हिस्सा नहीं है । उन्होंने कहा कि एमसीसी प्रोजेक्ट विशुद्ध रूप से विकास जनित उद्देश्य हित में है और इस प्रोजेक्ट के शुरू होने से नेपाली नागरिकों के लिए हजारों रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे, खास कर तब, जब की कोविड १९ के बाद की महामारी की वजह से कई लोगों ने अपनी नौकरियां खोयी है जिससे उनके जीवनयापन का सपोर्ट सिस्टम बुरी तरह से प्रभावित हो गया है ।
अपने नेपाल दौरे के बाद, सुमेर ने ये भी कहा कि एमसीसी की इतनी आलोचना सिर्फ इसलिए हो रही है क्योंकि इस प्रोजेक्ट का काफी ज्यादा राजनीतिकरण किया जा चुका है । उन्होंने ये भी जोड़ा की, इस प्रोग्राम के संबंध में काफी गलत जानकारी और दुष्प्रचार किया जा चुका है । स्थिति इतनी विकट हो गई है कि एमसीसी के समर्थन में दिया जाने वाला चाहे कोई भी तर्क क्यों ना हो, उसे तत्काल ही देशद्रोह करार कर दिया जाता है ।
चूंकि, एमसीसी के मुद्दे पर नेपाल पहले से ही विभाजित है, वक्त की पुकार यही है कि एमसीसी के संबंध में एक राष्ट्रीय सहमति बनायी जाए और किसी भी प्रकार के अफवाहों से घिरे नहीं । उन्हे चुनना होगा कि क्या वे श्रीलंका की तरह बनना चाहेंगे जिन्होंने इस एमसीसी समझौते को कुछ वजहों से रद्द कर दिया या फिर मंगोलिया की तरह, जो की नेपाल की ही तरह से बंदरगाह विहीन देश होने के बावजूद, इसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर पा रहा है ।
बात अगर मेडागास्कर, घाना, माली जैसे देश की करें जहाँ एमसीसी समझौता रद्द हो चुका है तो यह कहा जा सकता है कि यहाँ देश विशेष की सक्षमता या सजगता की कमी हो सकती है । इस परिस्थितियों से नेपाल सीख लेकर अपने पक्ष को मजबूत रख कर इस समझौते को कार्यान्वयन कर सकता है । या फिर किसी भी समझौते में रद्द करने की प्रक्रिया भी शामिल होती है । ऐसे में अगर यह वास्तव में घातक है तो इसे रद्द भी किया ही जा सकता है ।
जहाँ तक देश की वर्तमान परिस्थितियों का सवाल है तो यह परिदृश्य है कि राजनीतिक परिवर्तन और भौगोलिक आपदा के बाद भी नेपाल धीमी गति से ही सही किन्तु विकास की राह पर बढ़ रहा है । पुनर्निमाण का कार्य जारी है । सभी जानते है. कि नेपाल का विकास विभिन्न राष्ट्रों के आर्थिक सहयोग और अनुदान पर निर्भर है । नेपाल ने विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक सहित कई दानदाताओं के साथ बहुत सारा पैसा लिया है । आज का विदेशी निवेश पूंजीगत व्यय का केवल ७० प्रतिशत है । नेपाल को ऐसी कई विदेशी सहायता मिली है ।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में नेपाल में एएमसी के बारे में जो चर्चा की जा रही है, वह राजनीति की वजह से की जा रही है जबकि इस पर बहस की कोई आवश्यकता ही नहीं है । जिस नए नेपाल और समृद्ध नेपाल का नारा दिया जा रहा है, उसे प्राप्त करने के लिए आर्थिक रणनीति पर तीव्रता से काम करने की आवश्यकता है । शांति प्रक्रिया और संविधान के प्रारूपण के पूरा होने के बाद, ही देश एक समृद्ध नेपाल और खुशहाल नेपाली का सपना पूरा कर सकता है ।
शांति और स्थिरता, भूकंप के बाद पुनर्निर्माण की तीव्रता और पूंजी जुटाने जैसे मुद्दों ने पिछले चार वर्षों में हमारी अर्थव्यवस्था को गति दी है । लगातार चौथे वर्ष, साढे ६ प्रतिशत से अधिक की आर्थिक विकास दर प्राप्त करना इस बात का प्रमाण है कि देश सही दिशा में बढ़ रहा है । लेकिन इतना ही काफी नहीं है । कोई विश्वास नहीं कर सकता है कि १,०००डॉलर प्रति व्यक्ति आय वाला देश विकास कर रहा है । आर्थिक विकास के लिए कुछ परिवर्तन और साहस की जरूरत है और यह भी सर्वविदित है कि, हमारी आंतरिक पूंजी और प्रौद्योगिकी इसके लिए सक्षम नहीं है ।
हमारे देश का लगभग १५ खरब का बजट है जिसमें से १० खरब साधारण खर्च में समाप्त होता है और हम बाकी पाँच खरब भी विकास कार्य या निर्माण में खर्च नहीं कर पाते हैं । इससे आर्थिक वृद्धिदर असम्भव है इसलिए हमें विदेशी प्रौद्योगिकी के साथ पूंजी की सख्त जरूरत है और इस तरह की पूंजी तीन प्रकारों से आती है ः ऋण, अनुदान और निजी क्षेत्र का निवेश ।
एमसीसी अमेरिका द्वारा नेपाल को दी जाने वाली राशि ऋण नहीं अनुदान है । इस योजना में राशि खर्च नहीं होने की स्थिति में वापस लौटाने का भी प्रावधान है । नेपाल सरकार ने इस परियोजना के तहत अन्तरदेशीय विद्युत प्रसारण लाइन का निर्माण करने की योजना बनाई है । इस स्थिति में इस योजना को लम्बे समय तक अटकाए रखना उचित नहीं है । एमसीसी पर जो भी शंका या विरोध है उसे तत्काल समाप्त किया जाना ही देश हित में है, क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया गया तो नेपाल और अमेरिका के मित्रवत रिश्ते पर इसका नकारात्मक असर पड़ने से नकारा नहीं जा सकता है । हर योजना परियोजनाओं को अति राष्ट्रवाद से जोड़कर उस पर अनावश्यक रूप से बहस या विवाद करना हानिकारक सिद्ध हो सकता है ।
नेपाल सरकार और अमेरिकी सरकार द्वारा हस्ताक्षर किए गए समझौते के अनुसार एमसीसी एक शुद्ध विकास परियोजना है, जिसका उद्धेश्य नेपाल में विद्युत प्रसारण लाइन और राजमार्ग का सुधार करना है । इस तथ्य का उल्लेख अमेरिकी दूतावास द्वारा जारी वक्तव्य में भी है जो १७ जनवरी २०२० में जारी किया गया है । जिसमें यह स्पष्ट उल्लेख है कि ५०० मिलेनियम अमेरिकी डालर एमसीसी परियोजना के तहत नेपाल के लिए अनुदान सहयोग है । जिसमें न कोई शर्त है और न ही इस रकम बापत कोई ब्याज ही लिया जाएगा तथा न ही इसमें कोई गोप्य प्रावधान ही है । न ही इसमें कोई सैन्य तत्व है । विज्ञप्ति में यह दर्शाया गया है कि एमसीसी में सहभागी होने के लिए नेपाल को किसी भी अन्य कार्यक्रम में शामिल होने या पंजीकृत होने की आवश्यकता नहीं है ।
इसमें स्पष्ट कहा गया है कि नेपाल को उक्त रकम पारदर्शिता से खर्च करने की प्रतिबद्धता जतानी होगी । एमसीसी यह छूट देता है कि अनुदान की राशि नेपाल किस क्षेत्र में खर्च करना चाहता है यह उसकी अपनी इच्छा और चयन पर निर्भर करता है । नेपाल और नेपाली जनता अपनी प्राथमिकता के आधार पर क्षेत्र तय करेगी । इतना होने पर भी अगर इसे स्वीकार करने में देर की गई तो नेपाल की राजनीति की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े होंगे और अन्य कोई भी राष्ट्र नेपाल की सहायता या नेपाल में निवेश करने से पहले कई बार सोचेगा ।
सही तो यही होगा कि विकास के मुद्दे पर राजनीति ना की जाय और वैसे भी नदी के किनारे खड़े होकर तैरने की परिकल्पना तो की ही नहीं जा सकती है इसलिए चुनौती स्वीकार करना ही होगा तभी आगे बढ़ा जा सकता है और विकास की राह प्रशस्त की जा सकती है । अनावश्यक विलम्ब से अवसर गँवाने की नौबत आ सकती है । इसलिए समृद्धि और विकास के सवाल पर राजनीति नहीं सहमति और साथ की आवश्यकता है जिसे पक्ष और विपक्ष को समझना चाहिए और तत्काल सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए ।
वैसे नेपाल के राजनीतिक इतिहास में किसी भी विषय या समझौते पर सहमति बनने में प्रायः पार्टीगत स्वार्थ अथवा व्यक्तिगत स्वार्थ हावी रहा है, जिसकी वजह से किसी भी निर्णय पर पहुँचना सरल नहीं है । इसी राजनीतिक उथलपुथल के बीच अमेरिका के द्वारा दी गई अवधि भी समाप्त होने जा रही है किन्तु समाधान नजर नहीं आ रहा है गठबन्धन की सरकार असमंजस की स्थिति में है साथ ही अमेरिका ने यह कह कर कि अगर एमसीसी वापस होता है तो इसका अर्थ यह समझा जाएगा कि यह चीन की दखलअंदाजी का नतीजा माना जाएगा चेतावनी दे चुका है । इस परिस्थिति से देश को निकालने के लिए एकजुट होने की आवश्यकता है और उस निर्णय की आवश्यकता है जो सचमुच देश को गति दे सके ।

