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नेपाल में चीन अमेरिका कूटनीतिक दंगल- भारत के लिए चुनौती : ललित झा

 

ललित झा, एक तरफ जब सारी दुनियाँ युक्रेन संकट को लेकर रूस अमेरिका भुराजनीतिक टकराव में उलझा हुआ है और विश्व की सभी प्रमुख शक्तियाँ इस खतरनाक युद्ध को टालने मे व्यस्त हैं तब चीन द्वारा काठमांडू मे एक नया परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक प्रयोग किया जा रहा है। इस ताजा राजनीतिक उठापटक का उद्देश्य है चीन के इशारे पर नेपाल को नचाना। इसके लिये चीन ने पूर्व से ही सभी आवश्यक राजनीतिक कूटनीतिक तैयारी किया हुआ है। चिनियाँ शतरंज के सभी मोहरे अपने अपने मोर्चे पर तैनात है और अपना करतब दिखा रहा है। ताजा मामला अमेरिकी सहायता परियोजना (एम. सी. सी) को लेकर नेपाल मे चीन अमेरिका बीच चल रहे कूटनीतिक दंगल से जुड़ा हुआ है। हलाँकि देउबा सरकार द्वारा काफी राजनीतिक कूटनीतिक जद्दोजहद के बाद एम सी सी संसद में टेबल तो हो गया है लेकिन इस अमेरिकी सहायता परियोजना को संसद में टेबल होने से रोकने के लिए पिछले दिनों काठमांडू मे जो रक्तरंजीत हिंसक घटनाएं और प्रायोजित विरोध प्रदर्शन हुये हैं वह नेपाल के साथ साथ पूरे विश्व समुदाय और भारत के लिए काफी चिंताजनक है।
एम सी सी को लेकर इन दिनों चीन अमेरिका के बीच जो वाकयुद्ध चल रहा है वह दक्षिण एशिया की भूराजनीतिक स्थिति परिस्थिति के लिए काफी गंभीर संकेत है। नेपाल को अपने गिरफ्त में रखने के लिए बीजिंग क्या क्या प्रपंच कर सकता हैं यह प्रकरण उसका जीवंत उदाहरण है। एक तरफ चीन अमेरिका पर जबरन कूटनीति करने का आरोप लगाते हुये अमेरिका को नेपाल से दूर रहने का संदेश दे रहा है। वहीं अमेरिका भी पलटवार करते हुये चीन पर हिंसक विरोध प्रदर्शन के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए चीन को नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से परहेज करने को कह रहा है। लगभग हर दूसरे तीसरे दिन चीन- अमेरिका के विदेश मंत्रालय और दुतावास द्वारा आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। इस मामले को लेकर चीन जिस तरह की सक्रियता दिखा रहा है वह निश्चय ही राजनीतिक कूटनीतिक उदंडता है और सामरिक रूप से यह न सिर्फ नेपाल के लिए बल्कि समूचे विश्व राजनय के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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अमेरिकी सहायता परियोजना के भविष्य का निर्धारण नेपाल की जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि और सार्वभौम संसद द्वारा किया जाना है और नेपाल की संसद इसमें सक्षम है कि वह नेपाल के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल फैसला ले सके लेकिन जिस तरह से काठमांडू की सड़कों पर चीन प्रायोजित हिंसक प्रदर्शन हो रहे है, बीजिंग द्वारा पालित पोषित बामपंथी नेताओं द्वारा जिस तरह का राजनीतिक पैतरेवाजी प्रदर्शित किया जा रहा है उसका संदेश स्पष्ट है ” सी जिनपिंग नही चाहते कि नेपाल में एम. सी. सी लागू हो, वहीं अमेरिका हर हाल में इसका क्रियान्वयन चाहता है। इसको लेकर चीन अमेरिका के बीच जारी वाकयुद्ध एक तरह से नेपाल की संसद को डराने धमकाने का प्रयास है। अमेरिका द्वारा भी जिस प्रकार से नेपाल की सरकार को धमकाया गया है वह कूटनीतिक मर्यादा के सर्वथा बिपरित है और कूटनीति में ऐसी भाषा के लिए कोई जगह नहीं है।

नेपाल की सरकार और संसद को यह तय करने का हक है कि नेपाल के लिये क्या अच्छा है और क्या नहीं? यह चीन और अमेरिका तय नही कर सकता लेकिन दोनों देश इसी बात के लिये वाकयुद्ध में उलझा हुआ है जिससे नेपाल को गंभीर आर्थिक राजनीतिक एबम कूटनीतिक नुकसान होने की संभावना है। शीतयुद्ध कालीन ऐसी परिस्थिति नेपाल में एक नये भूराजनीतिक त्रासदी को खुला आमंत्रण है। विश्लेषकों के अनुसार चीन अमेरिका कूटनीतिक वाकयुद्ध से नेपाल में “कोल्डवार” जैसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है जो नेपाल के सामरिक राजनीतिक हितों के विरुद्ध है। शीतयुद्ध जैसी स्थितियों से जहाँ एक तरफ देश का राजनीतिक स्थिरता प्रभावित होगा वहीं दूसरी तरफ देश के आर्थिक हितों को भी नुकसान पहुँचने की पूरी संभावना है।
नेपाल में चीन की चाहत– दरअसल नेपाल में चीन अपने लिये मजबूत एबम निर्णायक भूमिका की तलाश मे है। बीजिंग की चाहत नेपाल को चीन की कैंप में लाना है जिसके लिये चीन पिछले एक दशक से प्रयास कर रहा है। यह चीन के कोशिशों का ही नतीजा था कि वैचारिक भिन्नता होने के बाबजूद नेकपा माओवादी और नेकपा ऐमाले के बीच राजनीतिक एकीकरण हुआ था। एक सोची समझी रणनीति के तहत इस नवगठित राजनीतिक पार्टी नेकपा के साथ चिनियाँ कॉम्यूनिष्ट पार्टी का राजनीतिक समझौता कराया गया था। दोनों देशों के बामपंथी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं के माध्यम से चीन के प्रभाव का विस्तार होता गया। आज नतीजा सबके सामने है। अमेरिकी सहायता परियोजना का हिंसक विरोध चीन नेपाल के बामपंथी पार्टीयों के इसी राजनीतिक गठजोर का परिणाम है। पिछले एक दशक का डाटा इसका गवाह है कि नेपाल के बामपंथी पार्टीयों के संरक्षण संबर्धन मे चीन ने भारी निवेश किया हुआ है। इसी निवेश का नतीजा आज दिखाई दे रहा है नेपाल की राजनीति मे बढ़ते चिनियाँ प्रभाव के रूप में। दरअसल सी जिनपिंग यह चाहते हैं कि नेपाल “सी- पथ” अर्थात जिनपिंगवाद की राह पर चले। प्रचंड ,भीम रावल, और नारायण काजी श्रेष्ठ जैसे नेता चीन का झंडा लिये घूम रहा है और गिरगिट की तरह पल पल अपना राजनीतिक रंग बदल रहा है। नेपाल को अपने कैंप में खिचकर चीन न सिर्फ तिब्बत को सुरक्षित करना चाहता है बल्कि भारत के लिए भी चुनौतियाँ खड़ी करना चाहता है।

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नेपाल में अमेरिकी आकांक्षाएँ– अमेरिका के लिए नेपाल सामरिक और भौगोलिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल की सीमा भारत और चीन दोनों से लगती है। नेपाल से अमेरिका जहाँ एक तरफ चीन की दुखती रग तिब्बत पर नजर रख सकता हैं वहीं वह भारत की भी निगरानी कर सकता हैं। यानी नेपाल में बैठकर अमेरिका एक साथ विश्व की दो महाशक्तियों – चीन और भारत की निगरानी कर सकता हैं। इसके लिए जरूरी है नेपाल को सी पथ का अनुगामी होने से रोकना। एम सी सी की मदद से अमेरिका यही चाहता है। आज नेपाल के लोगों मे अमेरिका के लिए आकर्षण बढ़ा हैं।

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भारत के लिये संदेश और चुनौतियाँ–

चीन अमेरिका टकराव से नेपाल महाशक्तियों के शक्तिपरीक्षण स्थल में परिवर्तित हो गया है। विश्व की दो महाशक्तियों के टकराव से न सिर्फ नेपाल की राजनीति बल्कि आम जनमानस भी दो ध्रुवों में बिभाजीत हो गयी है जिससे भारत नेपाल संबंध पर बहुआयामी असर होने की संभावना है। क्योंकि भारत नेपाल के बीच 1850 कि मी खुली अंतराष्टिये सीमा है। नेपाल में होने वाले किसी भी घटना दुर्घटनाओ से भारत अछूता नही रह सकता। विश्लेषकों के अनुसार नेपाल में चीन और अमेरिकी पक्षों की मजबूती तथा दोनों पक्षों के बीच शीतयुद्ध से, दीर्घकालिक दृष्टिकोण से भारतीय प्रभाव के कमजोर होने की प्रबल संभावना है। नेपाल में चीन की मजबूत उपस्थिति से भारत नेपाल अंतराष्टिये सीमा पर अस्थिरता उत्पन्न होने का अंदेशा है वहीं इसका भारत नेपाल संबंधों पर भी नाकारात्मक प्रभाव पड़ना तय है जैसा ओली प्रचंड नेतृत्व् वाली बामपंथी सरकार के कार्यकाल के दौरान देखने को मिला था। भला IC814 एयर इंडिया के विमान अपहरण की घटना को कौन भुला सकता है?
भारत को चाहिए की नेपाल के आम जनमानस एबम नेताओं के बीच भारत के प्रति घटते आकर्षण का सम्यक मुल्याकन कर अपने प्रभाव का संरक्षण संबर्धन करे अन्यथा नेपाल की धरती पर जैसी जटिल स्थिति परिस्थिति उत्पन्न हो रही है, चीन अमेरिका कूटनीतिक दंगल में जोड़अजमाइस हो रहा है, उससे नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता अनिश्चितता पुनः उत्पन्न हो सकती है। नेपाल 1990 से लेकर 2006 तक भयानक रक्तरंजीत राजनीतिक गृह युद्ध के चपेट में रहा है जिसमे 15 हजार से अधिक लोगों को अपना जान गवाना पड़ा था। ऐसे में नेपाल एक और गृहयुद्ध झेल सकने की स्थिति में कथमपि नही है इसलिए नेपाल को महाशक्तियों का शक्ति परीक्षण स्थल बनने से रोका जाना चाहिए अन्यथा नेपाल एक और भूराजनीतिक त्रासदी का शिकार हो सकता हैं।

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