यूक्रेन-रसिया युद्ध : सभ्यताओं का संघर्ष या भू-राजनीति, और हमारी सिख : सन्तोष मेहता
सन्तोष मेहता, काठमांडू । रूस और यूक्रेन के बीच जंग जारी है । जंग मे मौत की संख्या पता नहीं चल पा रही है । हजारों लोगों को बेघर होना पड़ रहा है । कई देशों के नागरिक भी यहां फंसे हुए हैं । रूस और यूक्रेन के बीच यह जंग थमने का नाम नहीं ले रहा है । माना जा रहा है कि यूक्रेन और रूस के बीच बढ़ता तनाव शीत युद्ध के बाद यूरोप में सुरक्षा को लेकर सबसे बड़ा संकट हो सकता है । इसकी आग पूरे यूरोप में फैल सकती है । इस युद्ध की वजह से यूरोप में विश्वयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं । इस समय पूरी दुनिया की नजरें इन दोनों देशों पर टिकी हुई हैं ।
कई महीनों तक रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन पर हमले की किसी भी योजना से इनकार करते रहे । लेकिन पिछले हप्ते गुरुवार को उन्होंने एक लाइव टीवी कार्यक्रम में यूक्रेन में ‘स्पेशल मिलिटरी ऑपरेशन’ का एलान कर दिया । रूस ने हाल के महीनों में यूक्रेन बॉर्डर के पास लगभग २ लाख सैनिकों को तैनात किया हुआ था, जिसके बाद यूक्रेन पर हमले की अटकलें काफ़ी वक़्त से लगाई जा रही थीं ।
यूक्रेन यूरोप का दूसरा सबसे बड़ा देश है । यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोप और पूर्व में रूस से जुड़ी है । गौरतलब है कि यूक्रेन कभी रूसी साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था, १९९१ में सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन को स्वतंत्रता मिली थी । सोवियत संघ के पतन के बाद यूक्रेन के अलग होने को कई रूसी राजनेता इतिहास की एक बड़ी गलती मानते है । रूस और यूक्रेन के बीच विवाद को अभी नेटो से जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन दोनों के बीच कई मौक़ों पर संघर्ष हो चुका है । इनमें २०१४ की जंग भी शामिल है, जब रूस ने यूक्रेन से क्रीमिया छीनकर उस पर क़ब्ज़ा कर लिया था । वैसे जब १९९१ में यूक्रेन सोवियंत संघ से अलग हुआ था, तब भी कई बार क्रीमिया को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव हुआ था ।
यूक्रेन के पश्चिमी हिस्से में युक्रेनी राष्ट्रवाद की भावना प्रबल है । हालांकि यूक्रेन में रूसी भाषा बोलने वाले अल्पसंख्यकों की संख्या भी अच्छी खासी है और ये लोग विकसित रसिया से सटे हुवे पूर्वी इलाके में ज्यादा मौजूद हैं । रूस यूक्रेन में रहने वाले ८० लाख रूसी लोगों की रक्षा को लेकर मुखर रहा है । साल २०१० में विक्टर यानूकोविच यूक्रेन के राष्ट्रपति बने और उन्होंने रूस से बेहद क़रीबी संबंध बनाए । इन संबंधों की बुनियाद पर उन्होंने यूरोपीय संघ में शामिल होने के समझौते को ख़ारिज कर दिया । इसकी प्रतिक्रिया मे युक्रेनी राष्ट्रवाद की भावना वाले जनता ने भारी विरोध प्रदर्शन किया जिसके कारण साल २०१४ में उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा । पश्चिमा समर्थित प्रदर्शनाकारियों के विरोध के कारण फरवरी २०१४ में देश छोड़कर भागना पड़ा ।
रूसी राष्ट्रपति लगातार रूसियों और यूक्रेनियों को ‘एक ही लोग’ कहते आए हैं और वो दावा करते हैं कि सोवियत समय में यूक्रेन को ग़लत तरीक़े से ऐतिहासिक रूसी ज़मीन मिल गई थी । साल १९९४ में रूस ने एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए यूक्रेन की स्वतंत्रता और संप्रभुता का सम्मान करने पर सहमति जताई थी, लेकिन पिछले साल पुतिन ने एक लंबा आर्टिकल लिखकर रूसी और यूक्रेनी लोगों को ‘एक राष्ट्र’ का हिस्सा बताया था । रूस पर आरोप लगते हैं कि वो यूक्रेन के अलगाववादियों को पैसे और हथियारों से मदद कर रहा है । रूस इन आरोपों को ख़ारिज करता है । हालांकि वो खुलकर अलगाववादियों का समर्थन करता है । यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में मौजूद डोनबास (लुहान्स्क और दोनेत्स्क इलाकों) को औद्योगिक शहर माना जाता है । लगातार रूस समर्थक अलगाववादियों और यूक्रेन की सेना के बीच डोनबास में संघर्ष चल रहा था । वहां पर २०१४ में हुई लड़ाई के दौरान १४,००० से अधिक लोग मारे गए थे । इसके बाद रूस ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ आक्रामकता दिखाई और वहाँ के क्रिमिया राष्ट्रवाद पक्षधर अलगाववादियों की मदद की जिसके परिणामस्वरूप उसने यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप को स्वतन्त्र करार दिया फिर उस पर क़ब्ज़ा कर लिया । इन अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है । इस घटना के बाद से ही यूक्रेन ने पश्चिमी देशों से नज़दीकियां बढ़ाईं, लेकिन रूस लगातार इसके खिलाफ रहा है ।
वर्ष १९९४ में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रशिया के बीच हंगारी के बुदपेस्ट में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसे ‘बुदपेस्ट मेमोरेण्डम’ भी कहा जाता है । इस संधि के तहत इन देशों ने भरोसा दिया था कि वो किसी भी परिस्थिति में यूक्रेन के हितों की सुरक्षा करेंगे और ये सुनिश्चित करेंगे कि यूक्रेन एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में कार्य करता रहे । उसी सन्धि तहत क्रिमिया युक्रेन अन्तर्गत रहने के शर्त मे युक्रेन ने अपने पास रहे सभी न्युक्लियर वोपेन्स रुस को वापस दे दिया । आज इसी संधि पर हस्ताक्षर करने वाले एक देश, रशिया ने यूक्रेन पर हमला कर दिया है और दूसरी तरफ़ अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन, यूक्रेन की कोई महत्वपूर्ण मदद नहीं कर पा रहे हैं ।
इस साल की शुरुआत में रूसी राष्ट्रपति ने यूक्रेन को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर पूर्वी हिस्से में युक्रेन ने युद्ध की कार्रवाई बंद नहीं की तो आगे होने वाले ख़ूनखराबे के लिए वो ही ज़िम्मेदार होगा । अलगाववादी रुख वाले लुहान्स्क और दोनेत्स्क इलाकों पर अब तक रूस अपने समर्थकों के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रहा है । पुतिन के इन इलाकों को स्वतंत्र रूप से मान्यता दे दिया, रूस काफी वक्त से यूक्रेन पर पूर्वी हिस्से में ‘जनसंहार’ का आरोप लगाकर युद्ध के लिए माहौल तैयार कर हि रहा था । आखिरकार रूस ने अमेरिका व अन्य देशों की पाबंदियों की परवाह किए बगैर २४ फरवरी २०२२ को यूक्रेन पर हमला बोल दिया है । अब यदि नाटो ने रूस पर जवाबी कार्रवाई की और यूरोप के अन्य देश इस जंग में कूदे तो तीसरे युद्ध का खतरा बढ़ सकता है ।
अमेरिकी राजनीतिशास्त्री सैमुअल पी हंटिंगटन ने यूक्रेन में संकट की भविष्यवाणी की थी । उनके सभ्यतागत मानक के अनुसार, यूक्रेन एक गंभीर रूप से विभाजित देश है, जो ऐतिहासिक, भौगोलिक और धार्मिक रेखाओं के साथ आंतरिक रूप से विभाजित है, पश्चिमी यूक्रेन दृढ़ता से यूरोपीय अर्थात पश्चिमा निकट में और पूर्वी यूक्रेन और क्रीमिया, रूढ़िवादी रूस की निकट में मजबूती से है । हंटिंगटन ने यूक्रेन के बारे में बहुत कुछ लिखा, जो पश्चिमी और रूढ़िवादी(अर्थोडक्स) सभ्यताओं के बीच की सीमा पर स्थित है । भले ही २०१४ के यूक्रेनी संकट से कई साल पहले उनके पुस्तक प्रकाशित हुआ था, हंटिंगटन की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक, द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन मे यूक्रेनी स्थिति के खतरों के बारे में चेतावनियों से भरी हुई है और भविष्यवाणी करती है कि यूक्रेन दो अलग-अलग हिस्सा में विभाजित हो सकता है, जिसके पूर्वी हिस्से रूस में विलय हो जाएगा । उनका सिद्धांत है कि राष्ट्र अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटेंगे । हटिंगटन का विचार था कि शीतयुद्ध के बाद दुनिया में संघर्ष का कारण राष्ट्रों के बीच विचारधाराओं के मतभेद के बजाय बड़ी सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक अंतर होगा ।
सोभियत संघ के बिघटन के बाद शित युद्ध का अन्त हुवा । इस परिस्थिति को फ्रांसिस फुकुयामा ने इतिहास का अन्त बताया, उनका मानना था कि विश्व मे अब कोइ लडाई नही होगी । फ्रांसिस फुकुयामा की १९९२ की पुस्तक, द एंड अफ हिस्ट्री मे तर्क दिया कि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में मानवाधिकार, उदार लोकतंत्र और स्वतन्त्र बाजार अर्थव्यवस्था राष्ट्रों के लिए एकमात्र शेष वैचारिक विकल्प बन गए है । उनका तर्क था कि दुनिया मे अब विचारधारा कि द्वन्द समाप्त हो चुकी है, हेगेलियन अर्थों में ‘ इतिहास के अंत ‘ तक पहुंच गई है । इस पुस्तक के ठिक एक वर्ष के बाद हंटिंगटन ने अब दुनिया मे नई प्रकार कि द्वन्द सभ्यता कि आधार पर होने कि चर्चा की, बाद में १९९६ की पुस्तक “द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन एंड द रीमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर” में अपनी थीसिस का विस्तार किया । सैमुअल हंटिंगटन, हार्वर्ड के प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के प्रभावशाली विद्वान थे, जिनका २००८ में निधन हो गया । शीत युद्ध के बाद की दुनिया में, उन्होंने भविष्यवाणी की, अब संघर्ष सांस्कृतिक मतभेदों में निहित होगा । हंटिंगटन ने हमें चेतावनी दी, “सभ्यताओं के बीच गलती रेखाएं भविष्य की युद्ध रेखाएं होंगी ।” उन्होंने तर्क दिया कि साझा संस्कृति और धर्म के आधार पर दुनिया को आठ सांस्कृतिक “सभ्यताओं” में विभाजित किया जा सकता है – पश्चिमी, रूढ़िवादी इसाई, इस्लामी, हिंदू, सिनिक आदि ।
भारत के पुर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ स्वर्गीय बिपिन रावत ने भारत के खिलाफ दो पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान की फौजों की तैनाती में एक खतरनाक पैटर्न की शिनाख्त की । उन्होंने कहा कि ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’, यानी सभ्यताओं के संघर्ष की थिअरी में चीनी और इस्लामी सभ्यताओं के बीच गठजोड़ की बात हो रही है । चीन ने इसी थिअरी के मुताबिक ईरान और तुर्की के साथ समझदारी बनाई है और अब वे अफगानिस्तान में दाखिल होने जा रहे हैं । हंटिंगटन इन सभी सभायाताओ के बीच का संघर्ष समन्वय आदि के बारे मे भी व्याख्या कीए है । हलाकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इसे लेकर घोर असहमतियां मौजूद हैं । फिर भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मौजूदा भारत सत्तारूढ़ दल की घोषित विचारधारा है । कूटनीतिक जरूरतें अपनी जगह, लेकिन इस सरकार से जुड़े जिम्मेदार लोगों की सोच ‘सभ्यता संघर्ष’ की धारणा से बिल्कुल निरपेक्ष तो नहीं रह सकती ।
“सभ्यताओं के संघर्ष” में हंटिंगटन ने यह विचार ९० के दशक मे दिए, लेकिन आज विश्व मे स्पष्ट रूप से दुनिया की कई बढ़ती शक्तियों को प्रभावित करता है – जैसे भारत के नरेंद्र मोदी की हिंदुत्व विचारधारा का ससक्तिकारण, चिन के शी जिनपिंग के पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ का संघर्ष, रसिया का रुढिबादिता (अर्थोडक्स), इश्लामिक र्याडिकल्स, पश्चिमा और अर्थोडक्स देश बिच कि द्वन्द, युक्रेन लगायत दुनिया के कयैन देश मे राष्ट्रवाद का उद्बोदय और यहां तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर भी राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान इस तरह की सभ्यतावाद से संबंधीत एक मोड़ के रूप में देख सकते हैं । १९९२ मे ही रूसी जनरल ने कहा था कि ‘यूक्रेन या बल्कि पूर्वी यूक्रेन, दस या पंद्रह वर्षों में वापस आ जाएगा, हाल ही मे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने युक्रेन मे रूसि जातीयों की रक्षा के नाम पर क्रीमिया और डोनबास में रूस की सैन्य घुसपैठ को वैध ठहराया है । जैसा कि हंटिंगटन ने लिखा है, “शीत युद्ध के बाद की दुनिया में, लोगों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर वैचारिक, राजनीतिक या आर्थिक नहीं हैं बल्कि वे सांस्कृतिक हैं । ”
हंटिंगटन ने अपने सिधान्त मे तर्क दिया कि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में उभरने वाले अधिकांश सभ्यतागत ब्लॉकों में प्राकृतिक नेता होंगे, जिन्हें उन्होंने “मूल राज्य” कहा था । सिनिक की सभ्यता का नेतृत्व चीन, रूढ़िवादी सभ्यता का रूस और पश्चिमी सभ्यता का संयुक्त राज्य अमेरिका, पुर्विया या हिन्दु सभ्यता का हिन्दुस्तान द्वारा नेतृत्व किया जाएगा । इस्लामी दुनिया में तत्काल कोई प्राकृतिक नेता नहीं होंगे, चूंकि सुन्नी और शिया के बीच और मध्य पूर्व के प्रमुख देशों जैसे तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब और ईरान के बीच नेतृत्व के लिए संघर्ष होगा । इन देशौ मे राज्य से भी अधिक मजबुत धार्मिक नेता होंगे ।
इस आलोक में, यूक्रेन पर आक्रमण भी सभ्यतावाद की तरह दिखता है । इस बीच रूसी राष्ट्रवादी लेखक हो या राष्ट्रपति पुतिन “रूसी दुनिया” को बलपूर्वक बनाने के बात कराते है – जिसका अर्थ है रुसी सभ्यता का एकीकरण, विश्व क्रांति या विश्व विजय भी नहीं है, बल्कि सभ्यतागत नियंत्रण, अपने इतिहास, संस्कृति का एकीकरण, जैसा कि पुतिन ने अपने युद्ध भाषण में भी कहा था । वास्तव मे यूक्रेन के अधिक लोग स्वतंत्र रहना चाहते हैं, लेकिन पूर्वी यूक्रेन के लोगों की मांग है कि यूक्रेन को रूस मे मिलाना चाहिए या उनलोगौ को स्वायत्ता चाहीए तथा युरोपियन युनियन तथा नाटो से अलग बल्कि रसिया से दोस्ती चाहती है । यूक्रेन की राजनीति में नागरिक एव नेता दो गुटों में बंटे हुए हैं । एक दल खुले तौर पर रूस का समर्थन करता है और दूसरा दल पश्चिमी देशों का समर्थन करता है । यही वजह है कि आज यूक्रेन दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच संघर्ष मे फंसा हुआ है । नजर ये आ रहा है कि युक्रेन मे शान्ति के लिए युक्रेन को रुस से दोस्ती करना होगा और पश्चिमी युरोप से सम्बन्ध तोडना होगा या तो युक्रेन के पूर्वी रुसी संस्कृति वालेको अपने देश से अलग करना होगा । अर्थात युक्रेन का विभाजन । ये सब सभ्यता बिचका संघर्ष हि तो है । सैमुअल हंटिंगटन ने जिसे ‘क्लैश ऑफ सिभिलाइजेसन’ कहा है, उसके अनुसार युक्रेन के घरेलु ‘रूढ़िवादी(अर्थोडक्स) और ग्रीक कैथोलिक ईसाई के बीच का संघर्ष, रसिया के रूढ़िवादी(अर्थोडक्स) और पश्चिमी युरोप के ग्रीक कैथोलिक ईसाई के भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण युक्रेन के ये घरेलू मतभेद सिर पर आ गए है ।
युक्रेन के संकट में एक महत्वपूर्ण सीख छीपी हैं । यूक्रेन जैसे बहुसंस्कृति राष्ट्रवाद मे आधारित देश के सन्दर्भ मे हटिंगटन कहते है ऐसे देश सभी के संस्कृति के सम्मान मे सावधानी और कुसल कूटनीति उपयुक्त है, जबकी युक्रेन ने २०१४ के बाद से पूर्वी युक्रेन के भाषाओ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । ऐसे देश मे प्रोक्सी युद्ध या प्रायोजित युद्ध का जोखिम रहता है । अत: यूक्रेन के सन्दर्भ में भी उन्होने कहा या तो विभाजन से समाधान होगा, या एक ऐसा संघ जहां देश के दोनों हिस्सों की आकांक्षाओं का सम्मान किया जाता हो । अर्थात स्व पहिचान, स्वायत्ता सहित के संघियता से हि राष्ट्रिय एकता सम्भव है इसमे अगर कोई बहु संस्कृतिवाला देश कमज़ोर हो तो देश के आंतरिक मामलों में दूसरे देशों का दख़ल होता है, और उस देश में अनिश्चितता और अस्थिरता पैदा होना सम्भाविक है । वहा अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियों का भी कोई महत्व नहीं रह जाता, जैसा की युक्रेन भी देखा गया । नेपाल भी बहु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाले देश है लेकिन यहा भी राज्य एकल सांस्कृतिक दृष्टिकोण से संचालन कि प्रयास हो रही है । आधुनीक नेपाल के स्थापना काल से हि थारु-मधेशी एव आदिवासी जनजाति अपनी पहचान सहित के राज्य मे हिस्सेदारी मांग रही है, हलाकी नेपाल मे संघियता है लेकिन वह थारु-मधेशी एव आदिवासी जनजाति कि न अपनी पहचान पर आधारित है और ना ही स्वायत्त है । युक्रेन से हमे यही सिख लेनी चाहिए की समय रहते ही नेपाल के मधेशी लगायत असन्तुष्ट समुहौ का सम्बोधन हो ।


