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युक्रेन संकट में अप्रासंगिक होता संयुक्त राष्ट्रसंघ और भारत की तटस्थता : ललित झा

 


ललित झा | वैसे तो युद्ध का इतिहास सदियों पुराना है और सहस्रों वर्षो से दुनियाँ में युद्ध होता आया है। जबसे मानवजाति ने सभ्यता का विकास किया है तब से ही युद्ध होता रहा है। 21 वीं शताब्दी में दो विश्वयुद्ध हुआ था और इसका प्रभाव इतना भीषण था कि इसके आग से उत्पन्न ताप से विश्व आज भी झुलस रहा है। विश्व के युद्ध का लंबा इतिहास गवाह है, हर युद्ध- महायुद्ध के विनाश के मलबे से शांति उत्पन्न होती है लेकिन युद्ध से उत्पन्न इस शांति का उम्र इस बात पर निर्भर करता है कि युद्ध से दुनियाँ क्या सीख और संदेश ग्रहण करती है। 20 वी सदी में द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश की पृष्ठभूमि से एक प्रभावशाली संस्था संयुक्त राष्ट्रसंघ का जन्म 1945 मे हुआ था। इसके स्थापना के प्रमुख उद्देश्यों में से प्रथम उद्देश्य था “युद्ध चाहे कहीं भी हो, उसे हर हाल में रोकना, युद्ध के कारणों का निदान करना और विश्व मे शांति स्थापित करना लेकिन 21 वीं शताब्दी के दो दशकों के समयांतराल में अबतक जितने भी युद्ध हुये हैं उसे रोकने में राष्ट्रसंघ की भूमिका पर प्रश्न उठ रहा है। बात चाहे अमेरिका एबम नाटो के नेतृत्व् में इराक- अमेरिका युद्ध की हो अथवा अमेरिका- अफ़ग़ानिस्तान युद्ध की या फिर सीरिया क्रीमिया पर हमले की, इन सभी युद्धों में राष्ट्रसंघ अपनी सार्थक भूमिका निभाने में विफल रहा था और रही सही कसर इस रूस- युक्रेन युद्ध ने पुरा कर दिया है। इस युद्ध से उत्पन्न महाविनाश को रोकने के लिए राष्ट्रसंघ द्वारा कोई सार्थक पहल नही किया जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। एक तरफ युक्रेन पर रूस का लगातार हमला, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रसंघ का मूकदर्शक  बन तमाशा देखने को विवश होना , यह परिदृश्य निराशाजनक है। हैरत कि बात ये है कि अब तक राष्ट्र संघ इस युद्ध को रोकने हेतु कोई सार्थक प्रयास नहीं कर सका है और युद्ध अनवरत जारी है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के कदमों से यह संकेत मिल रहा है कि यह युद्ध तभी खत्म होगा जब रूस इसे खत्म करना चाहेगा। जब तक रूस अपने सामरिक रणनीतिक लक्ष्यों को हाशिल् नही कर लेता तब तक यह विध्वंस जारी रहेगा’। यदि राष्ट्रसंघ इस युद्ध को रोक नही सकता तो ऐसे विध्वंसक परिदृश्य में राष्ट्रसंघ की उपयोगिता क्या रह जाती है? युक्रेन संकट के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रसंघ पूर्णतः विफल सावित हो रहा है।
वह सिर्फ इसलिए विफल नही है कि वह इस अवांछित युद्ध को रोकने में नाकाम रहा है बल्कि इसकि विफलता इसलिए अत्यंत दुखद और त्रासदीपूर्ण है क्योंकि 190 देशों की सदस्यता वाला यह संस्था, इस युद्ध को रोकने हेतु कोई पहल तक नहीं कर सका। एक तरफ युक्रेन के मासूम लोगों की मौतें हो रही हैं और राष्ट्रसंघ तमाशबीन बन देख रहा है, ऐसे में राष्ट्रसंघ का क्या औचित्य रह जाता है?विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका और नाटो सभी बेबस और लाचार दिख रहे हैं। युक्रेन संकट पर राष्ट्रसंघ के महासचिब अंटोनियों गुन्तेरस ने अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा है, ” यह अत्यंत निराशाजनक है कि हम सभी इस युद्ध को रोकने में नाकाम रहे है। “यह नाकामी विश्व समुदाय के लिए काफी चिंताजनक है। राष्ट्रसंघ के महासचिव के इस बयान से यह साफ जाहीर है कि विश्व के ताजा भूराजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रसंघ लगभग अप्रासंगिक सा हो गया है जहाँ सिर्फ बहस हो सकती हैं, प्रस्ताव पर विमर्श हो सकता है लेकिन युद्ध और विनाश रोकने की सार्थक पहल नही। संकट के इस समय में गोस्वामी तुलसीदासजी का यह कथन फिट बैठता है जिसमे उन्होंने कहा है- “समरथ को दुःख नाही गोसाई”। यदि आप सामर्थवान है शक्तिशाली है तो आप कुछ भी कर सकते हैं, सारे नियम कानून सिर्फ कमजोर देशों के लिए ही होते है।

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सामरिक विश्लेषकों के अनुसार युक्रेन संकट का सारा दोष रूस पर देना न्यायोचित नही क्योकि यदि अमेरिका और नाटो के देश चाहते तो रूस को यह आश्वासन दे सकते थे की युक्रेन को तत्काल नाटो का सदस्य नही बनाया जायेगा मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। यदि अमेरिका द्वारा यह आश्वासन दे दिया जाता तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता? नाटो और अमेरिका युक्रेन को हथियार तो दे रहे है लड़ने के लिए, युद्ध में रूस के हाथों मरने के लिए मगर वो एक अदद आश्वासन नही दे सकते ताकि युद्धविराम हो सके। कूटनीतिक जानकारों के अनुसार युक्रेन संकट के पीछे भी रूस का अपना सामरिक स्वार्थ है और अमेरिका नाटो का अपना सामरिक आर्थिक स्वार्थ। आज समर भूमि में युक्रेन अकेला खड़ा है। इस युद्ध से उत्पन्न हालात में अमेरिका का प्रमुख हथियार निर्माता कंपनी लॉकहिड मार्टिन समेत कई हथियार निर्माता कंपनियों के शेयरों के मूल्यों में हुए भारी वृद्धि को देखते हुए इस युद्ध के पीछे अमेरिका नाटो का असली खेल समझा जा सकता है।
 नाटो द्वारा रूस की घेरावंदी का विरोध रूस 1997 से कर रहा है। रूस का इरादा वर्ष 2008 मे जार्जिया संकट तथा 2014 में क्रीमीया पर कब्जा के समय ही जाहीर हो गया था तब भला राष्ट्रसंघ द्वारा इसमें सार्थक भूमिका नही निभाया जाना हैरान करनेवाला है। दरअसल युक्रेन संकट अमेरिका, नाटो तथा रूस के भूराजनीतिक सामरिक स्वार्थ के टकराव का परिणाम है। इस युद्ध के लिए अमेरिका और नाटो भी उतना ही दोषी है जितना रूस है।
विश्लेषकों के अनुसार इस युद्ध ने दुनियाँ को एक नये शीतयुद्ध में उलझा कर रख दिया है क्योकि राष्ट्रसंघ की विफलता से दुनियाँ के देशों में जहाँ एक तरफ शक्तिशाली राष्ट्र बनने का होर शुरू होगा वहीँ दूसरी तरफ खतरनाक हथियारों जिसमें परमाणु एबम जैविक हथियार शामिल हैं, का खतरनाक रेस भी शुरू होगा। इस युद्ध से परमाणु निरष्त्रीकरण अभियान को भी तगड़ा झटका लगा है। युक्रेन संकट से उत्पन्न इस नये शीतयुद्ध से विश्वशांति के समक्ष वास्तव में एक गंभीर चुनौती उत्पन्न हो गया है जिसका समाधान तलाशना आवश्यक है, अन्यथा मानवता का अस्तित्व संकट में पर जायेगा क्योंकि आज के विश्वपटल का भूराजनीतिक कटु सत्य है जिसकी लाठी,उसकी भैंस”
भारत की तटस्थता क्यों- रूस- युक्रेन युद्ध से उत्पन्न विध्वंस के दृश्यों से संपूर्ण भारत विचलित और परेशान है। अचानक ही उसके समक्ष एक साथ कई सामरिक, कूटनीतिक एबम आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो गयी है। आज भारत के नीति निर्माताओं के समक्ष बड़ी गंभीर दुविधा वाली स्थिति है, वह करे तो क्या करे? एक तरफ उसके समक्ष युक्रेन मे फंसे अपने 20 हजार से अधिक लोगों को वापस लाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ उसके दोनों अजीज दोस्त रूस और अमेरिका आमने सामने खड़ा है। भारत के लिए सबसे गंभीर चुनौती चीन की विस्तारवादी नीति से निबटना है जिसके लिये अमेरिका और रूस दोनों के साथ रणनीतिक सामरिक सहयोग जरूरी है। इस युद्ध मे भारत इसलिए तटस्थ है और यह तटस्थता थोरा थोरा रूस की ओर झुका हुआ है।रूस भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र है जिसने हर संकट के समय भारत का खुलकर साथ दिया है, बात चाहे कश्मीर संकट की हो या फिर 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की अथवा 1961 के गोवा दमन संकट की, रूस ने हमेशा भारत का मजबूती से साथ दिया है। वहीं अमेरिका जो आज भले ही भारत का रणनीतिक सहयोगी मित्र है लेकिन इतिहास गवाह है उसने कभी भी भारत का साथ नही दिया है बल्कि हमेशा भारत के विरोध में रहा है। 1971 के भारत पाक युद्ध के समय अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के समर्थन में बंगाल की खाड़ि में अपना विध्वंसक पोत यु एस एस इंटरप्राइज को भेजने की घटना को भला कौन भूल सकता है जिसमे भारत के सुरक्षा में रूस ने अपना विध्वंसक पोत भेज कर अमेरिकी चाल को नाकाम कर दिया था। राष्ट्रसंघ में जब जब भारत के खिलाफ प्रस्ताव आया, रूस ने हर बार वीटो का प्रयोग कर उसे निष्प्रभावी कर दिया। आज रूस के सामने संकट है तो ऐसे में भारत का यह नैतिक दायित्व है कि वह अपने सच्चे मित्र रूस की मदद करे। यही धर्म भी कहता है। आज भारत ने दिखा दिया है कि वह अपने मित्र के साथ हर हाल में खड़ा रहता है। कूटनीतिक विश्लेषक अभिनव प्रकाश का कहना है, जब भारतीय सैनिक लदाख के गलवान घाटी में, चीन के खिलाफ बहादुरी से लड़ते हुये बलिदान दे रहे थे तब यही यूरोपीय देश चीन के साथ व्यापार समझौता करने में व्यस्त था, आज भला वह किस मुह से भारत के तटस्थता की नीति की आलोचना कर रहा है। भारत आज स्वतंत्र विदेश नीति का पालन कर रहा है। भारत की तटस्थता इसके भूराजनीतिक सामरिक हितों के अनुकूल है क्योंकि युक्रेन संकट से प्रेरित होकर चीन कब ताइवान अथवा गलवान घाटी जैसा मोर्चा कब खोल देगा यह कोई नहीं जानता। आज भारत भले रूस की तरफ, थोरा झुका हुआ दिख रहा है मगर वह युक्रेन को भी मदद पहुँचा रहा है। वह मूक दर्शक बन युद्ध का तमाशा नही देख रहा। आज अमेरिका समेत विश्व के सभी प्रमुख देश, भारत से आग्रह कर रहे हैं कि भारत मध्यस्थता कर इस युद्ध को रोके लेकिन भारत की पहली प्राथमिकता अभी आपरेशन गंगा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है आज विश्व बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है, महामारी, आशांति और अनिश्चितता से पुरा विश्व प्रभावित है मगर संकट चाहे कितना भी गहरा व बड़ा क्यों न हो, भारत का प्रयास उससे भी बड़ा होगा। आज भले कुछ देश अपनी गलत विस्तारवादी नीतियों की बजह से, दुनियाँ के राजनीतिक भूगोल को बदलने का प्रयास कर रहे हो, दुनियाँ पर अवांछित युद्ध थोपने मे लगे हुये हो मगर उन्हे समझना चाहिए कि अंततः विजय शांति और बंधुत्व की ही होती है।
युद्ध रोकने के अपने उद्देश्यों में भले आज राष्ट्रसंघ बुरी तरह विफल सावित हुआ है बेबस और लाचार लग रहा है , सफेद हाथी की तरह अप्रासंगिक लग रहा हो मगर इस युद्ध से उत्पन्न संभावित संकट से निबटने हेतु इस संस्था की उपयोगिता अभी दुनियाँ के लिए है। वसर्ते इसमे व्यापक सुधार एबम वीटो पॉवर के इस्तेमाल के संदर्भ में सार्थक कानून बने अन्यथा युद्ध रोकने के लिए स्थापित यह संस्था अप्रासंगिक होकर इतिहास के अध्यायों में सिमट कर रह जायेगा।

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