रिश्तों में है रिक्तता, सांसों में संत्रास। घर में भी अब भोगते, लोग यहां वनवास : डॉ. मानव
नारनौल। नारी के मां, बेटी, पत्नी, बहन आदि सभी रूप अनुपम होते हैं, लेकिन इनमें भी सर्वश्रेष्ठ होता है मां का रूप। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार तथा सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) में हिंदी-विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ रामनिवास ‘मानव’ का। एलपीजी साहित्य एसोसिएशन, मेडान (इंडोनेशिया) द्वारा आयोजित वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय कवि-सम्मेलन में, परिवारों के विखंडन और रिश्तों के अवमूल्यन पर गहरी चिंता प्रकट करते हुए, अपने एक दोहे के माध्यम से बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा-“रिश्तों में है रिक्तता, सांसों में संत्रास। घर में भी अब भोगते, लोग यहां वनवास।।” वैशाली रस्तोगी के कुशल संचालन में लगभग दो घंटों तक चले इस कवि-सम्मेलन में पंजाब के मुख्यमंत्री के पूर्व मीडिया प्रभारी प्रेम विज तथा पटियाला (पंजाब) के प्रोफेसर हरिंद्र कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। सर्वप्रथम एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष आशीष शर्मा ने “अस्थियां मां की मैं गंगा में बहा आया हूं। आज एक मां को एक मां में मिला आया हूं।” कहकर संस्था की संरक्षक उत्तरा शर्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। तत्पश्चात् चेन्नई (तमिलनाडु) की डॉ. मंजू रुस्तगी ने “औरतें अब बोलने लगी हैं। परंपरा की गिरहें खोलने लगी हैं। आंकने लगी हैं खुद की जगह, वर्जनाएं तमाम तोड़ने लगी हैं।” कहकर नारी के सशक्तीकरण की बात की, वहीं मेडान (इंडोनेशिया) की योगिता शर्मा ने “यह कैसा वक्त है! रामों की भीड़ में आज सीता कृष्ण को ढूंढ रही है।” पंक्तियों द्वारा आज की नारी की असुरक्षा-भावना और विवशता को उजागर किया। सुराबाया (इंडोनेशिया) की मीनाक्षी गुप्ता ने संयुक्त परिवार के दिनों को याद करते हुए कहा- “अलग-अलग था नहीं कुछ भी, एक ही छत के नीचे सभी का आशियाना था। वह जमाना भी क्या जमाना था!” जकार्ता (इंडोनेशिया) की वैशाली रस्तोगी ने मां की ममता और महिमा का वर्णन एक दोहे के माध्यम से इस प्रकार किया- “आंचल में ममता भरी, दृग दो नीर-कटोर। अधरों पर मुस्कान है, मां का ओर-न-छोर।।” चंडीगढ़ के वरिष्ठ कवि प्रेम विज ने मां को गुणों की खान बताते हुए फ़रमाया- “इस दुनिया में वह कौन हो सकता है, जो वायु भी दे, छाया भी दे, जल भी दे और मीठी दुआओं का सुरक्षा-चक्र भी दे, वह सिर्फ मां ही हो सकती है।” सुराबाया (इंडोनेशिया) की मीनू संयोग की गजल के इस शेर को भी बहुत सराहा गया- “हम अपनी बज्म में सर को झुकाए बैठे हैं। अपने कातिल से ही दिल को लगाए बैठे हैं।” उक्त कवियों के अतिरिक्त रेखा नायर, अहमदाबाद (गुजरात), कविता अरोड़ा, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) तथा डॉ. नीता सरोजिनी और सरस्वती सुरेश, जकार्ता (इंडोनेशिया) में भी काव्य-पाठ किया।



