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वंशवाद से पीड़ित श्रीलंका : प्रेमचंद्र सिंह

 

प्रेमचंद्र सिंह, लखनऊ, 22मार्च । श्रीलंका की जनसंख्या करीब 2.25 करोड़ है, जिसमे 75% सिंघल, 24% तमिल और 1% मलय, बर्घर आदि सम्मिलित हैं। पूरी जनसंख्या में 70% बौद्ध, 13% हिन्दू,10% मुस्लिम और 8% क्रिश्चियन हैं। आमतौर पर माना जाता है कि भारत के बंगाली मूल के ही सिंघल लोग है, जैसे तमिलो के लिए भी आमधारणा यही है कि वे भारतीय मूल के ही है। पिछले करीब दो सालों से कुछ अधिक समय में ही श्रीलंका की राजपक्षे परिवार ने देश में विकट संकटों की अगुआई की है, जो केवल उसी एक परिवार की देन है। संकट का आलम यह है कि यह द्वीपीय देश पिछले एक दशक में सबसे खराब आर्थिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। सरकार द्वारा लागू दुर्भाग्यपूर्ण उर्वरक (खाद) प्रतिबंध से चावल और चाय जैसी फसलों की पैदावार में बहुत बड़ी गिरावट आई है और विदेशी मुद्रा (फॉरेन रिजर्व) की संकट अब मानवीय आपातकाल का रूप ले लिया है। इस देश की मुद्रास्फीति बढ़कर 15% हो गई है, जो एशिया में सबसे खराब है। बिजली, ईंधन, भोजन और दवा की कमी व्यापक है जिससे दैनिक वेतन भोगियों से लेकर उद्यमियों तक सभी के लिए असहनीय दुखद स्थिति है। इन विफलताओ से निपटने में राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की सरकार की पूरी तरह से विफलता के फलस्वरूप पिछले सप्ताह कोलंबो में आम लोगों का अभूतपूर्व विरोध प्रदर्शन इसका साक्षी बना और करीब 10,000 से अधिक विपक्षी समर्थकों ने राष्ट्रपति कार्यालय के बाहर एकत्रित होकर उनके इस्तीफे की जोरदार तरीके से मांग की।

    ‘जरूर है किसी गर्दन पे रोशनी का खून
     कोई चराग तो खुद को बुझा नहीं देता’

बताते चलें कि नवंबर, 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में विजयी श्री गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति बने और उसके बाद उन्होंने अपने भाई श्री महिंदा राजपक्षे को प्रधान मंत्री नियुक्त किया। श्री महिंदा राजपक्षे पहली बार वर्ष-2004 में सत्ता में आए, शुरुआत में प्रधान मंत्री बने और बाद में श्रीलंका के राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए। तत्समय श्री गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका सरकार में रक्षा सचिव थे और तमिल विद्रोहियों के साथ गृह युद्ध को समाप्त करने के लिए वर्ष-2009 के ऑपरेशन में अपनी भूमिका के लिए कुख्यात रहे हैं। सर्वविदित है कि इस त्रासदी में हजारों तमिल मर गए, हजारों तमिल गायब हो गए, यातना, बलात्कार, न्यायेत्तर हत्याओं और तमिल अलगाववादियों, पत्रकारों और विपक्षी हस्तियों के अपहरण और हत्या के आरोप गोटाबाया राजपक्षे पर लगा, गोतबाया राजपक्षे इन सभी आरोपों से इनकार करते रहे हैं। राजपक्षे परिवार वर्ष-2015 से वर्ष-2019 तक कुछ समय के लिए सत्ता से बाहर थी, जब राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने देश का नेतृत्व किया। वर्ष- 2018 में विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाते ही देश में एक संवैधानिक संकट छिड़ गया। इसके फलस्वरूप अगस्त, 2020 में आम चुनाव हुआ और आम चुनाव में राजपक्षे की पार्टी एक शानदार जीत हासिल की। पार्टी के सत्ता में आते ही राष्ट्रपति पद के लिए व्यापक कार्यकारी शक्तियों को जल्दी से पुनः बहाल किया गया, जिस पर विक्रमसिंघे की सरकार द्वारा पूर्व में अंकुश लगाया गया था। तत्पश्चात एक अन्य भाई बासिल राजपक्षे को जुलाई, 2021 में वित्त मंत्री नियुक्त किया गया। बासिल राजपक्षे अपनी अमेरिकी-श्रीलंकाई राष्ट्रीयता के कारण पहले से ही एक विवादास्पद व्यक्ति थे। संसद में उनका प्रवेश तभी संभव हुआ जब सरकार ने दोहरे नागरिकता वाले श्रीलंकाई लोगों को सरकार या प्रशासन में प्रवेश पर लगे संवैधानिक पाबंदी के प्रावधान को हटा दिया। उनके सबसे बड़े भाई चमल राजपक्षे कैबिनेट मंत्री हैं, जबकि उनके बेटे एकगैर-कैबिनेट मंत्री हैं। प्रधान मंत्री के पुत्रों में से एक पुत्र मंत्रिमंडल में है, दूसरा उनका चीफ ऑफ स्टाफ है और एक भतीजा सांसद है। कुछ अनुमानों के अनुसार श्रीलंका की बजट का लगभग 75% बजट सरकार में राजपक्षे मंत्रियों के नियंत्रण में ही है। यह वंशवाद की राजनीति का अनोखा उदाहरण है।

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अब श्रीलंका की इस विशिष्ट राजनीतिक परिवार की राजकीय करतूतों पर गौर करते हैं। इनके कुप्रबंधन के कारण स्थिति बद-से-बत्तर हो गई है। यह सब वर्ष-2007 में पूंजी बाजार से उधार लेने के साथ शुरू हुआ, जब महिंदा राजपक्षे राष्ट्रपति थे। यह ऋण अब श्रीलंका के कुल विदेशी ऋण का 38% है, जबकि चीन का ऋण श्रीलंका के कुल विदेशी ऋण का 10% हो चुका है। श्रीलंका के पास लगभग 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जबकि  जुलाई, 2022 में परिपक्व होने वाले 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर के बांड सहित चालू वर्ष-2022 में ऋण चुकौती के लिए कुल 7 बिलियन अमेरिकी डॉलर की श्रीलंका को जरूरत है। अगर इस धनराशि की ससमय व्यवस्था सरकार नहीं कर पाती है तो श्रीलंका को डिफाल्टर होने में मात्र तीन महीने से भी शायद कम समय शेष रह गया हैं। श्रीलंका को भारतीय करेंसी की समस्या से निपटने के लिए जनवरी में भारत द्वारा 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर की स्वैप लाइन बढ़ाने और 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर के एशियाई क्लियरिंग यूनियन समझौते को स्थगित कर दिया गया है। बासिल राजपक्षे 16-17 मार्च,2022 को भारत में थे और उन्होंने संकट को दूर करने में मदद के लिए 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर की क्रेडिट लाइन भारत से हासिल कर ली है। इसके बाद श्रीलंका ने अपने दोनो सबसे बड़े  वित्तीय सहयोगी बीजिंग और नई दिल्ली दोनों को उनके द्वारा प्रदत्त ऋण को चुकाने में श्रीलंका को हो रही कठिनाई के लिए ऋण पुनर्गठन (लोन रिस्ट्रक्चरिंग) पर विचार करने के लिए अनुरोध किया है।

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      ‘यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है
      हवा की ओट भी ले कर चराग जलता है’

चीन के साथ वित्तीय लेनदेन के बेमिसाल अपारदर्शी तौर-तरीकों से जो लोग वाकिफ हैं, उन्हें राजपक्षे परिवार की पार्टी की सत्ता में पुनः शानदार वापसी को समझना मुश्किल नहीं है। अभी राजपक्षे परिवार की सरकार को श्रीलंका संसद में दो-तिहाई बहुमत है और वर्ष:2024-25 तक चुनाव नहीं होने वाला है, ऐसे में विपक्ष के विरोध से सत्ता पर राजपक्षे परिवार की पकड़ ढीली होने वाली नहीं है। श्रीलंका की इस वंशवादी सरकार के समक्ष देश को इस संकट के भंवर से निकालने के लिए अब एक ही विकल्प है ‘अंतरराष्ट्रीय ऋण’, जिसे प्राप्त करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष,भारत और चीन से श्रीलंका की सरकार निरन्तर संपर्क में है। वित्तीय सहायता मिलने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तो का प्रभावी असर श्रीलंका में दिखना शुरू हो गया है, मसलन श्रीलंका की सरकार ने अपने रुपये को कमजोर होने और उधार लेने की लागत (कास्ट ऑफ बॉरोइंग) में वृद्धि की अनुमति भी दे दी है। देखना दिलचस्प होगा कि श्रीलंका की सरकार की इन राजनीतिक हथकंडों का आने वाले दिनों में श्रीलंका की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ता है।
जमाना जीतना चाहे तो यह खयाल रहे
      उसे भी साथ ही रखना जो तेरे साथ न हो”

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प्रेमचन्द्र सिंह

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