मूर्गी की बांग “व्यग्ंय” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा
औरत दिनभर घर का करे और रातभर पति नाम का मर्द उसके साथ ‘हराम’ कर के आराम भी करने न दे । कमोबेश हर घर परिवार और समाज में यही हो रहा है और यही होता भी रहेगा
बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बिरगंज । हमेशा से होता आया है कि मूर्गे की बांग से देश और समाज उठता आया है । ईस पितृसत्तात्मक समाज को मूर्गी अंडा दे मंजूर है पर मूर्गी बांग भी दे यह कतई मंजूर नहीं । मूर्गी बाडे के अंदर रह कर अंडे दे उस अंडे के उपर बैठ कर सेकाई कर के अंडे से चूजा बनाए । मूर्गी की पैदाईश ही ईसी लिए हूई है की वह सिर्फ अंडे दे । आगे बढ कर मूर्गे के बांग देने के जन्मसिद्ध अधिकार को चुनौती देते हुए वह खुद ही बांग देने लगे यह परपंरावादी समाज और देश को कतई मंजूर नहीं है । पुरुषों का बनाया हुआ समाज है नियम कानून है । वह ही तय करेगें कि औरत ईतना आगे बढे और कितना बीच ले जिससे कि समाज का काम चल सके । यदि औरत निरक्षर है और अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं है तो यह पुरुषवादी सत्ता के लिए और भी अच्छा है ।
औरत के लिए घूंघट, आंचल, दूपट्टा, चून्नी, शाल, हिजाब और बुर्का बने पर मर्दो के लिए कुछ भी नहीं बना । वह तो खूले आम नंगी छाती तान कर बडी ढिठाई से शर्मनाक हरकते करता है और यह समाज ईसी को पुरुष की मर्दानगी के रुप में परिभाषित करता है । बुर्के और हिजाब में पूरी तरह बंद औरत के पैर का अंगूठा भी दिख जाए तो मर्द उसी से अनेक कयास लगा कर संतुष्ट हो जाता है । औरत तो बच्चे पैदा करने की मेशिन है बस बच्चे पैदा करे और घर का काम करे । सुबह शाम मूर्गी को दाना चुगने दिया ही जाता है । बांग देना मूर्गी का काम या अधिकार नहीं है यह मुर्गा या मर्द का काम है । औरत दिनभर घर का करे और रातभर पति नाम का मर्द उसके साथ ‘हराम’ कर के आराम भी करने न दे । कमोबेश हर घर परिवार और समाज में यही हो रहा है और यही होता भी रहेगा । यदि किसी औरत ने मूर्गी की तरह बांग देने की कोशिश की तब यह मर्दों का मुर्गा समाज चौकन्ना हो जाता है और मूर्गी की पर काट्ने कि कवायद शुरु हो जाती है ।
मर्द हो या मुर्गा पैदा तो उसी औरत या मूर्गी के अंडे से होता है । पर यह ईतना एहसान फरामोश है कि जिस तन से उस का देह बन कर बलिष्ठ हुआ उसी पर अपने बल आजमाता है और अपने नियंत्रण मे रख कर पुरुष सत्ता का अभिमान दिखाता है । औरत का दुश्मन औरत नहीं वास्तव में मर्द ही है । तभी तो एक औरत का स्वाभिमान और आत्मगौरव को गिराना अपनी शान समझता है । अपने से ज्यादा पढीलिखी या समझदार औरत मर्दो को नहीं भाती उन्हे तो बस हुस्न और शबाब में डूबी सांसों के डोर से बंधी एक चलती फिरती गुडिया चाहिए । जंहा औरत या मूर्गी ने आनाकानी की अपनी मूंडी हिलाई पितृसत्ता छपाक से उन औरतों के बिचारों पर तेजाब डाल देता है ताकि वह आगे बढ न सके । ईसी लिए तो मूरँगी बांग दे तो पूरा समाज चौंक जाता है कि यह आठंवा आश्चर्य कैसे हो गया ? मूर्गी ने कैसे हिम्मत की बांग देने की ? जब मूर्गी अंडे दे सकती है तो बांग क्यों नहीं दे सकती ? ईस पर जिरह कोई नहीं करता क्यों कि पुरुषसत्ता कि चेतना ही कमजोर है । ईसी लिए वह नहीं चाहता मूर्गी की बांग से कंही समाज जग न जाए । पूरी नहीं तो आधी आवादी जिसमें मूर्गी या औरतों की संख्या है वह तो जग ही जाएगी । तब मर्द या मूर्गे के बनाए हुए नियम कानून को कौन मानेगा । मर्द को तो अपना अधिकार स्थापित करने के लिए जबरजस्ति से छिनना ही आता है । ईसी लिए तो आए दिन बलात्कार की घटना बढ रही है । मर्द औरत के शरीर को ही युद्ध का मैदान बना देता है । और उसी मे अपनी जीत का झंडा जबरजस्ति गाड कर खुद के सिंकदर होने का भ्रम पाल लेता है । जहां सहमति न हो वहां कैसी जीत और कैसी खुशी ? यह तो वहशीपन है जो मर्द हर दिन औरत के शरीर पर उतारता है ।
समाज औरत को गाम मानता है और उसी अनुसार उसको पालित पोषित करता है । बिना सिंग की और पूंछ न हिलाने वाली गाय को कोई नहीं मानता न उसकी पूजा ही करता है समाज । पितृसत्तात्मक सोच के नुमाइंदों के लिए औरत यदि गाय है तो पति उसका सिंग है और पूंछ उसका पुत्र जो उसकी रक्षा करता है और समाज में गायरुपी औरत को प्रतिष्ठा दिलाता है यह पुरुषसत्ता । यदि किसी गाय की सिंग या पूंछ नहीं है तो उसे आवारा और गली का समझ कर सभी दूलत्ती मारते है । क्यों कि पितृसत्ता ने गाय के सिंग का खौफ दिखा कर उसका प्रभुत्व बनाए रखना चाहता है । जब तक गाय के सिंग और पूंछ के रुप में पति और पुत्र औरत के आगे पिछे है तभी तक और सम्मानित मानी जाती है और पितृसत्ता भी सुरक्षित रहेगा । जंहा गायों ने सिंग और पूंछ कटवा लिए यानी की औरत स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हो कर जीना चाहे तब समाज में खलबली मच जाती है की मूर्गी ने बांग दे दी । अब आगे क्या होगा ? क्यों कि ईस अचेतन समाज को मुर्गे कि बांग से उठ्ने की आदत है । ईसी लिए पितृसत्ता कि कोशिश यही होती है कि मूर्गी बांग कभी न दें हां बशर्ते अंडे जरुर देती रहे । समाज को अंडा चाहिए मूर्गी नहीं और बांग तो बिल्कुल नहीं ।
पर अब मूर्गियों ने बांग देनी शुरु कर दी है और अलसाया हुआ समाज अचरज में भर कर ही सही धिरे धिरे उठ रहा है । अब मूर्गी बांग ही नहीं देती वह यह भी तय करती है की कौन से अंडे चुजे बनेगें और कौन से अंडे हलाल हो कर पेट में जाएंगे । अब गायों को अपनी सिंग भारी होने लगी है । ईसी लिए वह सिंग का कोई अभिमान नहीं करती । अब तो ‘सरोगेसी’ के जरिए ‘सरोगेट मदर’ बन कर औरत मातृत्व का सुख ही नही ले रही है कि पितृसत्ता और विवाह नामक संस्था को चुनौती भी दे रही है । औरतों का आगे बढना कोई आश्चर्य नहीं यह तो होना ही है । बल्कि देरी से हुआ है और अधिकांश औरते अभी भी अगंडाई ही ले रही है । पर मूर्गियों ने बांग दे कर सुबह का आगाज कर दिया है और बता दिया है कि दोपहर और शाम का नजारा कैसा होगा । अब मुर्गा मर्द या पितृसत्ता को तय करना है कि उसको मूर्गी की बांग से जगना है और औरत को अपने बराबर का मान कर ईंसानों जैसा ब्यवहार करना है कि अपनी ऐय्याशी के लिए उसको गोस्त बनाना है । औरत को कब तक जिंदा गोस्त जैसा समझ कर हलाल करना चाहोगे या सिर्फ बच्चे पैदा करने की मेशिन समझोगे ? औरत के प्रति जितना ज्यादा निचता दिखाओगे तुम्हारी ही शाख गिरेगी और पितृसत्ता कि जड हिलेगी । ईसी लिए हे मुर्गो मूर्गी की बांग को समय की मधुर तान समझ कर खुशी से झुमते हुए उठो और औरत को वह सम्मान और जगह दो जिसकी वह अधिकारिणी है । मूर्गी की बांग मतलब समाज और देश का ज्यादा से ज्यादा शिक्षित समझदार और चेतनशील होना है ।


