तृतीय विश्वयुद्ध की संभावना बनता यूक्रेन–रूस युद्ध : डॉ श्वेता दीप्ति

इलियट और मैरिल ने कहा है, “युद्ध उन संबंधों का औपचारिक तौर पर टूटना है जो शांतिकाल मे राष्ट्रों को परस्पर एक दूसरे से बाँधे रखते हैं ।” जो घटित हो रहा है उसका परिदृश्य इसी औपचारिकता का टूटना ही तो है । पूरा विश्व आज एक अनदेखे भय के साए में साँसें ले रहा है । वर्चस्व की लड़ाई ने कई देशों को बारुद के ढेर पर खड़ा कर दिया है । कब कौन सी चिंगारी इसे सुलगा देगी कहा नहीं जा सकता है । आधुनिक और सभ्य कहलाने वाला विश्व अगर देखा जाए तो आज भी उसी पाषाण युग में जी रहा है जहाँ छीनने की प्रवृत्ति हावी थी, जो खून खराबे की वजह बनती थी । हथियारों का जखीरा जमा करना आज की आवश्यकता बनती जा रही है । वरना कब कौन किसे निगल जाए कह नहीं सकते ।
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध ने तीसरे विश्व युद्ध के खतरे को बढ़ा दिया है । रूस और यूक्रेन के बीच महायुद्ध का खतरा इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि रूस ने यूक्रेन पर काफी हद तक अपनी पकड़ मजबूत कर ली है । दूसरी ओर, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे नाटो देश यूक्रेन की रक्षा के लिए संयुक्त कार्रवाई कर सकते हैं । दुनिया दो विश्व युद्ध झेल चुकी है । उस दौरान पूरी दुनिया में न सिर्फ करोड़ों मौतें हुई थीं बल्कि भुखमरी जैसी स्थिति भी पैदा हो गई थी ।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूक्रेन और रूस का युद्ध ऐसे ही कुछ दिनों तक जारी रहा तो जल्द ही यह तीसरे विश्व युद्ध का रूप ले लेगा, जिससे पूरी दुनिया पर संकट गहरा गया है । इन दो देशों के बीच चल रही जंग ने एक बार फिर दुनिया के सभी देशों को दो धड़ों में बांट दिया है । यूक्रेन पर हमला करने से खफा कई देश लगातार रूस पर प्रतिबंध लगाते जा रहे हैं । लेकिन इन प्रतिबंधो का रूस और यूक्रेन के युद्ध पर कितना असर पड़ता है ये देखना बांकी है । इसके अलावा युद्ध के बाद प्रतिबंध लगाने वाले देशों के साथ रूस किस तरह का संबंध रखना चाहेगा ये देखना भी दिलचस्प होगा । क्योंकि रूस दुनिया के कई देशों के लिए काफी महत्वपूर्ण है । यह सिर्फ तेल और गैस सेक्टर में अहमियत नहीं रखता है, बल्कि अन्य कमोडिटीज और मिनरल्स के मामले में भी बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । ऐसे में प्रतिबंध लगाए गए देशों में इन चीजों की सप्लाई घट जाएगी और दामों में इजाफा होने का अनुमान लगाया जा रहा है । जिसका असर दिखने भी लगा है । एक तरफ कोरोना महामारी ने ज्यादातर देशों के अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ रखी है, ऐसे में यह युद्ध दुनियाभर में महंगाई को दशकों के उच्च स्तर पर पहुंचा सकती है ।
इस जंग ने ४० साल बाद एक बार फिर पूरी दुनिया को दो गुटों में बांट दिया है । रूस की बात करें तो उसके समर्थन में आया क्यूबा सबसे पहला देश है । क्यूबा मे जंग के दौरान सीमावर्ती क्षेत्रों में नाटो के विस्तार को लेकर अमेरिका की आलोचना की थी और कहा था कि दोनों देशों को वैश्विक शांति के लिए कूटनीतिक तरीके से इस मसले का हल निकालना चाहिए । वहीं दूसरी तरफ चीन भी रूस का समर्थन कर रहा है । चीन ने पहले ही कहा था कि नाटो यूक्रेन में मनमानी कर रहा है । इन देशों के अलावा कभी सोवियत संघ का हिस्सा रहे अर्मेनिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और बेलारूस भी रूस का साथ दे सकते हैं । इन देशों का रूस के साथ होने का सबसे बड़ा कारण है कि इन छह देशों ने सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन पर हस्ताक्षर किए हैं जिसका मतलब है कि अगर रूस पर किसी देश द्वारा हमला किया जाता है तो ये देश भी रूस की मदद में आगे आएंगे और रूस पर हुए हमले को खुद पर भी हमला मानेंगे ।
बेलारूस ने रूस की सेनाओं के साथ जंग में उतरने की बात कही है तो वहीं यूक्रेन को लातविया का समर्थन मिलता दिख रहा है । लातविया की संसद में एकमत से प्रस्ताव पारित किया गया है कि यदि उसके नागरिक यूक्रेन की मदद को युद्ध में उतरना चाहते हैं तो उन्हें इसकी अनुमति है । लातविया की संसद की डिफेंस, होम अफेयर्स कमिटी के चेयरमैन जुरिस रैनकैनिस ने कहा, ’हमारे नागरिक जो यूक्रेन की मदद करना चाहते हैं और जो वालंटियर के तौर पर काम करना चाहते हैं ताकि यूक्रेन की आजादी की रक्षा की जा सके । वे ऐसा कर सकते हैं ।’
लातविया नाटो संगठन का हिस्सा और एक वक्त में सोवियत संघ का हिस्सा रह चुका है । ऐसे में उसकी यह घोषणा अहम हो जाती है और यदि रूस की ओर से लातविया पर किसी भी तरह का अटैक किया जाता है तो फिर नाटो देश भी जंग में उतर सकते हैं । यदि ऐसा होता है यह विश्व युद्ध की शुरुआत होने जैसा होगा । यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग अब तक दोतरफा ही रही है, लेकिन बेलारूस और लातविया के ऐलान ने चिंताओं में इजाफा कर दिया है । इस बीच यूक्रेन में लोग तेजी से पलायन कर रहे हैं । लोग अपने घरों को छोड़कर पोलैंड, हंगरी जैसे देशों का रुख कर रहे हैं । अब तक कुल ३.५ लाख लोग बेघर हो चुके हैं ।
माना जा रहा है कि मिडिल ईस्ट में ईरान रूस का साथ दे सकता है । दरअसल रूस लगातार इरान को अपने पाले में लाने की कोशिश में लगा हुआ है । दोनों देशों के रिश्ते में न्यूक्लियर डील असफल होने के बाद से दूरी बन गई थी । उत्तर कोरिया भी रूस का साथ दे सकता है । और पाकिस्तान भी रूस का समर्थन कर सकता है क्योंकि पाकिस्तान के पीएम इस युद्ध के समय में रूस की यात्रा कर चुके हैं और यह भी कहा है कि उनकी ये यात्रा सही समय पर हुई है ।
अगर यूक्रेन की बातें करें तो फिलहाल बन रहे हालात को देखते हुए नाटो में शामिल यूरोपियन देश बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लग्जमबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, ब्रिटेन और अमेरिका पूरी तरह यूक्रेन का समर्थन करेंगे । जर्मनी और फ्रांस भी यूक्रेन का साथ दे सकते हैं क्योंकि उन्होंने हाल ही में मास्को का दौरा किया था औरÞ विवाद को शांत करने की बात कही थी । इसके अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा भी यूक्रेन का समर्थन कर रहे हैं साथ ही, उन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाने का एलान भी किया है ।
इस सबके बीच अगर भारत की रुख की बात करें तो भारत वह अकेला देश है जो इस युद्ध में अब तक तटस्थ भूमिका का निर्वाह कर रहा है । इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका और रूस दोनों देशों से भारत के अच्छे रिश्ते हैं । भारत की जीडीपी का ४० फीसदी हिस्सा फॉरेन ट्रेड से आता है । भारत का अधिकतर कारोबार अमेरिका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों के अलावा मिडिल ईस्ट से होता है । भारत पश्चिमी देशों से एक साल में करीब ३५०–४०० बिलियन डॉलर का कारोबार करता है । जबकि रूस और भारत के बीच भी १० से १२ बिलियन डॉलर का कारोबार है ।
एक नजर अतीत पर (प्रथम विश्वयुद्ध)
आठ जून साल १९१४ को ऑस्ट्रिया और हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी आर्क ड्यूक फ्रांज फार्डिनैंड अपनी पत्नी सोफी के साथ बोस्निया में साराएवो के दौरे पर थे, वहां दोनों की सर्ब राष्ट्रवादी गैवरिलो प्रिंसिप ने हत्या कर दी । इसके बाद २८ जुलाई को ऑस्ट्रिया–हंगरी ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध का एलान किया । इसके बाद संकट बढ़ता गया और एक अगस्त को जर्मनी ने रूस और दो दिन बाद फ्रांस के साथ युद्ध शुरू कर दिया । यह विश्व युद्ध २८ जुलाई १९१४ से ११ नवंबर १९१८ तक चला था । चार साल, तीन महीने और दो हफ्ते तक चले इस युद्ध में करीब ३० देश शामिल थे । इस विश्व युद्ध में करीब ६ करोड़ ८२ लाख सैनिक लड़े, जिनमें से ९९ लाख ११ हजार सैनिक मारे गए । बड़ी बात यह है कि इस युद्ध में ७५ हजार भारतीय सैनिक भी थे ।
पहले विश्व युद्ध में ३० ज्यादा देश शामिल हुए थे, जिसमें सर्बिया, ब्रिटेन, जापान, रूस, फ्रांस, इटली और अमेरिका समेत करीब १७ मित्र देश थे । दूसरी ओर जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, बुल्गारिया और ऑटोमन जैसे राज्य थे । युद्ध यूरोप, अफ्रीका, एशिया और उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में लड़ा गया । इस युद्ध की जिम्मेदारी कोई देश नहीं लेता । हालाँकि, प्रथम विश्व युद्ध का कारण आस्ट्रिया–हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी और उसकी पत्नी की हत्या माना जाता है । लगभग १०८ साल पहले, जून १९१४ में, आस्ट्रिया–हंगरी साम्राज्य के उत्तराधिकारी, आर्कड्यूक फर्डिनेंड ने अपनी पत्नी के साथ बोस्निया में सारावो का दौरा किया । २८ जून १९१४ को उनकी हत्या कर दी गई थी । सर्बिया पर हत्या का आरोप लगाया गया था । एक महीने बाद, आस्ट्रिया ने सर्बिया के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया । धीरे–धीरे कई देश इसमें कूद पड़े । इस तरह दोनों देशों का युद्ध प्रथम विश्व युद्ध में बदल गया । इस लड़ाई में जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश सक्रिय थे । चार साल की लड़ाई के बाद, प्रथम विश्व युद्ध ११ नवंबर १९१८ को जर्मनी के आत्मसमर्पण के साथ समाप्त हुआ । जर्मनी ने २८ जून १९१९ को एक संधि पर हस्ताक्षर किए । जिसके तहत उसे अपना एक बड़ा हिस्सा खोना पड़ा ।
दूसरा विश्व युद्ध
दूसरा विश्व युद्ध यूरोप में १९३९ से सितंबर १९४५ तक चला था । लगभग ७० देशों की थल–जल–वायु सेनाएं इस युद्ध में शामिल थी । इस युद्ध के दौरान पूर्ण युद्ध का मनोभाव प्रचलन में आया क्योंकि इस युद्ध में लिप्त सारी महाशक्तियों ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक क्षमता इस युद्ध में झोंक दी थी । युद्ध में अलग–अलग देशों के करीब १० करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया, जिनमें से ५ से ७ करोड़ लोगों की जान चली गई और २ करोड़ से अधिक लोग घायल हुए थे, क्योंकि इसके महत्वपूर्ण घटनाक्रम में असैनिक नागरिकों का नरसंहार, जिसमें होलोकॉस्ट भी शामिल है । और परमाणु हथियारों का एकमात्र इस्तेमाल शामिल है, युद्ध के आखिर में मित्र राष्ट्रों की जीत हुई । यह मानव इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध था । प्रथम विश्व युद्ध की जिम्मेदारी जर्मनी पर थोपी गई और कहा गया कि उसे वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया था । प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के २० साल बाद, जर्मन नेशनल सोशलिस्ट (नाजÞीवाद) पार्टी के नेता एडाल्फ हिटलर ने वर्साय की संधि को उलटने की घोषणा की । मार्च १९३८ में जर्मनी और आस्ट्रिया एकजुट हुए । फिर १९३९ में हिटलर की सेना ने चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा कर लिया । १ सितंबर १९३९ को, जब जर्मन सेना ने पोलैंड में प्रवेश किया, तो दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ । तब दुनिया दो हिस्सों में बंट गई थी । एक ओर मित्र राष्ट्र थे जिनमें अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, सोवियत संघ शामिल थे और दूसरी ओर धुरी देश जिनमें जर्मनी, जापान और इटली शामिल थे । हिटलर की सेना ने नॉर्वे, डेनमार्क, लक्जमबर्ग, बेल्जियम, नीदरलैंड जैसे देशों पर कब्जा करना शुरू कर दिया । अचानक जर्मन सेना ने भी सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया । हालाँकि, जर्मन सैनिक सोवियत संघ की सेनाओं के सामने खड़े नहीं हो सके ।
हिटलर ने ३० अप्रैल १९४५ को आत्महत्या कर ली और ८ मई १९४५ को जर्मनी ने आत्मसमर्पण कर दिया । जर्मनी के आत्मसमर्पण के बावजूद जापान इसके लिए तैयार नहीं था । फिर अमेरिका ने ६ अगस्त १९४५ को हिरोशिमा पर और ९ अगस्त १९४५ को नागासाकी पर परमाणु बम से हमला किया । जब जापान ने मजबूरी में आत्मसमर्पण किया, तो द्वितीय विश्व युद्ध २ सितंबर १९४५ को समाप्त हुआ ।
दरअसल साल १९३६ में एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी के राइनलैंड में अपनी सैन्य क्षमता बढानें का काम शुरू कर दिया । इसी बीच ७ जुलाई १९३७ को मार्को पोलो पुल हादसा हुआ था, जिसके कारण जापान और चीन के बीच युद्ध शुरू हो गया, जिसे इन दोनों के बीच सबसे लम्बा युद्ध माना जाता है । इसके बाद एक सितम्बर १९३९ को जर्मनी नें पोलैंड में घुसपैठ की, जिसके कारण ब्रिटेन और पÞm्रांस ने हिटलर के नाजी राज्य से बदला लेने की घोषणा कर दी और युद्ध छिड़ गया । आखिर में जापान की ओर से सरेंडर करने के बाद युद्ध खत्म हुआ ।
सोवियत संघ और यूक्रेनियन संघ
प्रथम विश्वयुद्ध के मध्य साम्राज्यवाद के साए से उभरते हुए यूक्रेनियन पीपल्स रिपब्लिक (यूएनआर) की स्थापना १९१७ में हुई । जार के शासकीय पतन के बाद यूएनआर ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया था । लेकिन इसी क्रम में बोल्शेविक क्रांति (१९१७) के बाद हुए रूसी गृहयुद्ध (१९१७–२२) के दौरान रूसी रेड्स और व्हाइट्स के बीच हुए घोर संघर्ष से यूएनआर बच नहीं सका क्योंकि दोनों ताकतों ने यूक्रेनी संप्रभुता को मान्यता नहीं दी थी । लेकिन यूक्रेनी स्वतंत्रता की मिसाल ने बोल्शेविकों को एक सोवियत यूक्रेनी गणराज्य बनाने के लिए मजबूर किया जो १९२२ में सोवियत संघ का एक संस्थापक सदस्य बना ।
हालाँकि १९३० के दशक की शुरुआत में जोसेफ स्टालिन यूक्रेनी राजनीतिक राष्ट्र को कुचलने के अधूरे काम को पूरा करने की ठान चुके थे । यह राजनीतिक राष्ट्र जैसा कि ऊपर बताया गया है बोल्शेविक क्रांति की पृष्ठभूमि में विकसित हुआ था । १९३२–३३ के राज्य–प्रायोजित अकाल में लगभग ४० लाख यूक्रेनी किसान मारे गए जिसे यूक्रेन में ‘होलोडोमोर’ (यानी, भुखमरी के माध्यम से हत्या) के रूप में जाना जाता है और एक नरसंहार माना जाता है । स्टालिन ने यूक्रेनी सांस्कृतिक अभिजात वर्ग को भी नष्ट कर दिया और जार के काल से प्रचलित धारणा कि यूक्रेनी रूसियों के “छोटे भाई” हैं इसे बढ़ावा देना शुरू कर दिया ।
इसी तरह पूरा यूक्रेन जबरन “छोटे भाई” की तरह सोवियत संघ का हिस्सा बना रहा । १९९१ में सोवियत संघ के विघटन के बाद उसी साल दिसंबर में यूक्रेनी जनमत संग्रह ने खुद को सोवियत संघ से अलग कर लिया । हालाँकि १९९० के दशक की शुरुआत में आर्थिक सुधारों के रुकने के साथ बोरिस येल्तसिन और अन्य रूसी हस्तियों ने यूक्रेनी सांस्कृतिक नीतियों की आलोचना करके और क्रीमिया के हस्तांतरण पर सवाल उठाकर घरेलू राष्ट्रवादियों को सोवियत साम्राज्य की याद दिलाना भी शुरू कर दिया था ।
१९९७ में रूस और यूक्रेन के बीच एक व्यापक संधि ने यूक्रेनी सीमाओं की अखंडता की पुष्टि की थी । इस संधि की गारंटी रूस और पश्चिमी परमाणु शक्तियों ने १९९४ के बुडापेस्ट ज्ञापन में दी थी जब यूक्रेन अपने सोवियत–निर्मित परमाणु शस्त्रागार को आत्मसमर्पण करने के लिए सहमत हुआ था । यह संधि ३१ मार्च, २०१९ को समाप्त हो गई ।
वर्तमान संकट और अमेरिकी भूमिका
१९९० के दशक के मध्य से यूक्रेन नाटो ढांचे के बाहर अमेरिका का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार रहा है । इस स्थिति को यूएस–यूक्रेन चार्टर (२००८;२०२१ में फिर से नई संधि पर हस्ताक्षर हुए थे । इस के अंतर्गत सामरिक साझेदारी में औपचारिक रूप दिया गया है । वर्तमान चार्टर “रूसी आक्रमण का मुकाबला करने” में यूक्रेन की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए अमेरिकी प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है लेकिन इसमें सूचीबद्ध विशिष्ट उपाय केवल यूक्रेनी सेना में सुधार और डेटा–साझाकरण में अमेरिकी सहायता पर केंद्रित हैं । युद्ध के मामले में किसी भी मौजूदा संधि के लिए अमेरिका को यूक्रेन की रक्षा करने की आवश्यकता नहीं है ।
नाटो में शामिल होने का उद्देश्य अब यूक्रेनी संविधान में निहित है और इसके सशस्त्र बल धीरे–धीरे नाटो मानकों में परिवर्तित हो रहे हैं । लेकिन २००८ में पिछली बार जब नाटो के सदस्यों ने यूक्रेन के परिग्रहण के विचार पर चर्चा की थी तो जर्मनी और फ्रांस ने इसे अवरुद्ध कर दिया ताकि था ताकि रूस को आक्रामक होने का मौका न मिले । पिछले दो दशकों से यूक्रेन का लगातार पश्चिमी खेमे के साथ जाना व्लादिमीर पुतिन के आक्रामक राष्ट्रवाद वाले रूस को रास नहीं आया है ।
साल २०१४ में जब यूक्रेन में एक लोकप्रिय क्रांति ने रूसी समर्थक राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को सत्ता से बेदखल कर दिया और पश्चिमी समर्थक लोकतांत्रिक ताकतों को सत्ता में लाया तो क्रीमिया में एक घोर संकट पैदा हो गया । जैसा कि द न्यू यार्कर’ को दिये साक्षात्कार में (फरवरी २३, २०२२) यूक्रेनी इतिहासकार सेरही प्लोखी ने इस विचार पर कि यूक्रेन में एक जन समूह अभी भी रूसी साम्राज्यवाद से खुद को जोड़ता है पर कहते हैं, ‘निश्चित रूप से उस विचार को २०१४ में क्रीमिया में कर्षण मिला । वहाँ की अधिकांश आबादी जातीयता से रूसी थी । और इसे डोनबास में भी आबादी के एक हिस्से के मध्य कर्षण मिला था जिसकी एक लोकप्रिय सोवियत पहचान थी । वहाँ के लोग वास्तव में एक बहिष्करणीय पहचान के इस विचार से इनकार कर रहे थे और इसने इस विचार के लिए कुछ आधार बनाए कि हाँ, शायद हम यूक्रेनियन हैं, लेकिन हमारे बीच एक बड़ी रूसी भूमिका के लिए भी जगह है ।’
डोनेट्स्क और लुहान्स्क पूर्वी यूक्रेन में स्थित दो राज्य हैं जो रूस के साथ सीमा साझा करते हैं । इन दो राज्यों के भीतर दो अलगाववादी क्षेत्र हैं जिन्हें डोनेट्स्क पीपुल्स रिपब्लिक (डीपीआर) और लुहान्स्क पीपुल्स रिपब्लिक (एलपीआर) के नाम से जाना जाता है जो रूसी समर्थित अलगाववादियों द्वारा चलाए जा रहे हैं । यह पूरा क्षेत्र जिसमें डोनेट्स्क, लुहान्स्क और उनके संबंधित अलगाववादी क्षेत्र शामिल हैं आम तौर पर ‘डोनबास’ क्षेत्र के रूप में जाना जाता है । रूस ने लंबे समय से दावा किया है कि चूँकि ये मुख्य रूप से रूसी भाषी क्षेत्र हैं इसलिए उन्हें “यूक्रेनी राष्ट्रवाद” से संरक्षित करने की आवश्यकता है । सोवियत काल के दौरान द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कई रूसी श्रमिकों को वहाँ भेजे जाने के कारण रूसी बोलने वालों की उपस्थिति वहाँ बढ़ती रही थी ।
इन सब में केवल सामरिक शक्ति या क्षेत्रीय आधिपत्य से कहीं अधिक राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक मुद्दे हैं । साथ ही नाटो और पश्चिमी देशों के अड़ियल रवैए के कारण यह मुद्दे सुलझने की जगह और उलझते गए हैं । सीरिया, इराक, लीबिया, लेबनान, वेनेजुएला, जैसे कई देशों में पश्चिमी राष्ट्रों ने उनके समर्थित सरकारों को बिठाकर उनके जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण का जो हठ किया है उसका दुष्परिणाम बेहद गंभीर है । शीत युद्ध में इसी तरह की विभीषिका कई बार यूरोप, एशियाई और अफ्रीकी देशों में देखने को मिले थे । जहाँ रूस और यूक्रेन अपने मुद्दों को अपने इतिहास और सांस्कृतिक भिन्(नताओं में सुलझा सकते थे वहीं पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप और व्लादिमीर पुतिन को उनका एक ‘तानाशाह’ मानने की जिद ने इस संघर्ष को जटिल बना दिया । चूँकि पुतिन एक अणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के नेता हैं तो उन्हें सद्दाम हुसैन या मुअम्मर गद्दाफी की तरह हटाया नहीं जा सकता ।
युक्रेन–रूस युद्ध का नेपाल पर असर
युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में विभिन्न वस्तुओं की कीमतें आसमान छू गई हैं । नेपाल और यूक्रेन के भी प्रत्यक्ष व्यापारिक संबंध हैं । जानकारों का कहना है कि इससे नेपाल में आयात होने वाले सोने से लेकर खाद्य तेल तक सब कुछ प्रभावित हो सकता है । पिछले वित्तीय वर्ष में, नेपाल यूक्रेन से माल का छठा सबसे बड़ा निर्यातक था । चालू वित्त वर्ष में नेपाल आठवें स्थान पर है । यही कारण है कि रूस–यूक्रेन युद्ध के परिणाम नेपाल में दिखने लगे हैं ।
रूसी सेना ने अकेले यूरोप को तेल और गैस का निर्यात करने वाली यूक्रेनी पाइपलाइन पर हमला कर दिया । रूसी सेना ने यूक्रेन की राजधानी कीव से ३० किमी दूर वासिलकेव तेल टर्मिनल पर मिसाइल हमला कर पाइपलाइन को नष्ट कर दिया है । रूसी सेना ने यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खार्किव में एक प्राकृतिक गैस पाइपलाइन को भी उड़ा दिया है । इससे यूरोप को रूस का प्राकृतिक गैस निर्यात प्रभावित होगा । जिससे परोक्ष रूप से नेपाल भी प्रभावित हो सकता है ।
विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन में युद्ध न केवल कीमती धातुओं, पेट्रोलियम उत्पादों और खाद्य तेल के आयात को प्रभावित करेगा बल्कि नेपाल में पर्यटन क्षेत्र को भी प्रभावित करेगा । विदेशी विशेषज्ञ हिरण्य लाल श्रेष्ठ ने कहा कि लंबे युद्ध से न केवल नेपाल बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्से प्रभावित होंगे । उन्होंने कहा, “विदेश से नेपाल आने वाला सारा सामान प्रभावित हो सकता है । सोने और कच्चे तेल का व्यापार और कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार द्वारा नियंत्रित होती हैं । इसलिए, युद्ध के प्रभाव से कीमत बढ़ सकती है । जब इन वस्तुओं की कीमत बढ़ती है, तो आयात पर अधिक पैसा खर्च करना पड़ता है और नेपाली मुद्रा का मूल्य भी नीचे जा सकता है । पिछले कुछ समय से लगातार बढ़ रहे पेट्रोलियम उत्पादों के दाम युद्ध की वजह से आसमान छू सकते हैं । नेपाल भारत से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करता है । भारत में विभिन्न मीडिया भी कह रहे हैं कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है । भारत अन्य देशों से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करता है, उन्हें नेपाल को बेचता है । इसलिए तेल की कीमत बढ़ सकती है । इसका असर पेट्रोल पम्प पर गाड़ियों की लम्बी लम्बी लाइनों के रूप में दिखने भी लगा है ।
विश्व स्तर पर युद्ध रोकने की पहल भी जारी है । उम्मीद की जा रही है कि युद्ध को रुकना चाहिए और यह आवश्यक भी है । अगर तत्काल ही वार्ता और पहल के जरिए इस युद्ध को नहीं रोका गया तो तृतीय विश्वयुद्ध की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है । हम सभी युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं और कभी भी युद्ध हमें लील सकता है ।
हिमालिनी मासिक (मार्च २०२२) अंक से

