महोत्तरी के भोलही में सामवेद पारायण महायज्ञ
जलेश्वर, 3 अप्रैल । दो दिवसीय दिव्य सामवेद पारायण महायज्ञ का शुभारंभ नेपाल के मधेश प्रदेश के महोत्तरी जिला स्थित भोलही ग्राम के श्री रामजानकी मंदिर में बीते शनिवार 2022-04-02 को पूर्णाहुति के साथ सुसंपन्न हुआ। इस कार्य को सम्पन्न कराने के लिए पतंजलि योगपीठ यू पी के प्रभारी आचार्य श्री अभिषेक जी तथा पतंजलि विश्वविद्यालय के प्राचार्य साधना दिदी का मुख्य योगदान रहा। मंत्रोच्चारण के साथ साथ मंत्रों के तत्वगत रहस्यों को उद्घाटित करते हुए यज्ञ को आगे बढ़ाना वैदिक युग स्थापित करने जैसा अनुभव हो रहा था। पारायण से जुड़े भजन कीर्तन और प्रवचन प्रस्तुत किए जाने से गंगा, जमुना और सरस्वती के रूप में ज्ञानयोग, कर्मयोग तथा भक्तियोग के त्रिवेणी भक्तों को सराबोर होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
सामवेद सनातनियों के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में से एक है, गीत-संगीत प्रधान है। प्राचीन आर्यों द्वारा साम-गान किया जाता था। सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है और इसके १८७५ मन्त्रों में से ६९ को छोड़ कर सभी ऋगवेद के हैं। केवल १७ मन्त्र अथर्ववेद और यजुर्वेद के पाये जाते हैं। फ़िर भी इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है, जिसका एक कारण गीता में कृष्ण द्वारा वेदानां सामवेदोऽस्मि! कहना भी है।
पुराणों में जो विवरण मिलता है उससे सामवेद की एक सहस्त्र शाखाओं के होने की जानकारी मिलती है। वर्तमान में प्रपंच ह्रदय, दिव्यावदान, चरणव्युह तथा जैमिनि गृहसूत्र को देखने पर १३ शाखाओं का पता चलता है। महाभारत में गीता के अतिरिक्त अनुशासन पर्व में भी सामवेेेद की महत्ता को दर्शाया गया है- सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रीयम्। अग्नि पुराण के अनुसार सामवेद के विभिन्न मंत्रों के विधिवत जप आदि से रोग व्याधियों से मुक्त हुआ जा सकता है एवं बचा जा सकता है, तथा कामनाओं की सिद्धि हो सकती है। सामवेद ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग की त्रिवेणी है। ऋषियों ने विशिष्ट मंत्रों का संकलन करके गायन की पद्धति विकसित की। अधुनिक विद्वान् भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि समस्त स्वर, ताल, लय, छंद, गति, मन्त्र, स्वर-चिकित्सा, राग नृत्य मुद्रा, भाव आदि सामवेद से ही निकले हैं।
भोलही के यज्ञ के शोभा को बढ़ाने के लिए जनकपुर के पतंजलि समूह भी उपस्थित थे। जनकपुर के बटेश्वर में पतंजलि द्वारा निर्माणाधीन आचार्य कुलम के स्थापना तथा संचालन के सम्पूर्ण जिम्मेवारी आचार्य साधना दिदी के ऊपर होने से लोगो में विशेष उत्साह के साथ महोत्तरी में भी एक आचार्य कुलम की स्थापना हेतु लोगों में सत्प्रेरणा जगते दिख रहा था।
जनकपुर, जलेश्वर तथा सीमा से सटे भारत से आए सनातन प्रेमियों के सभा को संबोधित तथा भजन कीर्तन प्रस्तुत कर मैं खुदको कृत कृत अनुभव करा रहा हूं। जनकपुर से आए माताओं ने भी अपनी मधुर भजनों से यज्ञ मंडप को सुराभित कर डाला। साथही भोलहि ग्राम वासी महिला माता बहनों ने भी भजन कीर्तन में लोक लाज को त्यागते हुए खुलकर सहभागिता दिखाईं। प्रत्येक वर्ष इस प्रकार के वैदिक यज्ञ को आयोजित कर सनातन संस्कृति को संरक्षित करने का दृढ़प्रतिज्ञ भोलही के युवागण श्री गोपाल पाण्डे, श्री अरविंद ठाकुर, श्री संतोष सिंह, भोलही बाबा लगायत संपूर्ण ग्राम वासी कोटी धन्यवाद के पात्र हैं। दिव्य वाद्यवादन समूह के कारण ऐसा लगता था, मानो इंद्रलोक धरती पर उतर आया हो।





