यादों से भरी पंक्तियों में रूपांतरित हो मैं, मैं नहीं रहता, बन जाता हूँ एक पूरी किताब : बसंत चौधरी
किताब
मैंने अक्सर महसूस किया है
कि, मैं जब भी किताबों की
दुनिया में प्रवेश करता हूँ,
तो खिल उठते हैं रंग–बिरंगे
भावनाओं के अनगिनत फूल
जिनमें शामिल होते हैं
कभी तो संघर्षों के पहाड़,
कभी निराशा के
अथाह असीमित सागर,
किन्तु यह अधिक समय तक
टिकते नहीं क्योंकि,
अगले ही क्षण
आकर सँभाल लेती है
बाधाओं को पार करने की
अनुभवों की अनन्त
उत्तम उक्तियाँ उन्हीं पन्नों से ।
कई बार इन्हीं किताबों के मुड़े
पन्नों के बीच से
बिखर जाती हैं अपरिमित
यादों की खुशबू,
किताबों के बीच वर्षों से दबे
सूखे पुष्प की हँसी के साथ ।
निकल आती हैं सुखद साथ की
कुछ परछाइयाँ और
बतियाने लगती हैं मुझसे
सामने ला खड़ा करती हैं
अतीत के झरोखे से
कुछ खट्टी–मीठी, अल्हड़–सी यादें,
सुहावनी, मनभावनी ।
जो समा जाना चाहती हैं मुझमें
और आहिस्ता–आहिस्ता मैं
उपवन, पहाड़, सुगंध और
यादों से भरी पंक्तियों में
रूपांतरित हो जाता हूँ ।
और फिर मैं, मैं नहीं रहता
बन जाता हूँ एक पूरी किताब ।
स्वर्ग अप्सरा
गोधुलि में अक्सर
जब क्षितिज के किनारे
मिलते हैं धरती और आकाश
उस गोधूली अनुपम बेला में
लौट रही गायों और
धूलकणों के संग
तुम्हारी याद आती है
और मुझे छू जाती है
दिल–दर्पण में एक प्रतिमा
रह–रह कर उभरती है
जैसे कोई स्वर्ग अप्सरा
जो मेरे सूने मन–मंदिर में
यादों की संचित निधि–कलशों
के साथ स्थापित होती है
और दीप्त कर जाती है
मंदिर का हर कोना ।
सायास
कितनी पावन
ख्याति प्रेम की
जो सजाती एक उत्सव
क्यारियों में ।
नेह का, अपनत्व का
हिमाच्छादित चोटियों
सा शीतल और
उच्च ! एक भव्य उत्सव ।
तुम्हारा आना
मिलना–मिलाना
बैठना, इठलाना
अचानक चहकना,
खिलखिलाना
करना अनुपम नाद भी
और फिर दूजे ही पल
ओढ़ लेना
झीनी चादर मौन की ।
एक दस्तूर सा लगने लगा है,
तुम्हारा नजरें झुकाकर देखना ।
सुनियोजित, सुनिश्चित
जानता हूँ मैं,
वह सायास था, अनायास नहीं ।

