यूक्रेन–रसिया जंग की असली जड़ें और हमारी सीख : सन्तोष मेहता
संतोष मेहता, हिमालिनी अंक मार्च ।रूस और यूक्रेन के बीच जंग जारी है । रूस सैन्य कार्रवाई के जरिए यूक्रेन को घुटनों पर लाकर खड़ा करना चाहता है और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की रूस को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए रूसी सेना के सामने डटे रहना चाहते हैं । रूस और यूक्रेन के बीच यह जंग थमने का नाम नहीं ले रही है । हजारों लोगों की मौत, हजारों लोग बेघर हो गए और कई देशों के नागरिक भी यहां फंसे हुए हैं । माना जा रहा है कि यूक्रेन और रूस के बीच बढ़ता तनाव शीत युद्ध के बाद यूरोप में सुरक्षा को लेकर सबसे बड़ा संकट हो सकता है । हालांकि रूस और यूक्रेन के बीच तनाव का मामला कोई नया नहीं है । लेकिन इसबार युद्ध की वजह से यूरोप में विश्वयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गए हैं । इस समय पूरी दुनिया की नजरें इन दोनों देशों पर टिकी हुई हैं ।
रूस ने हाल के महीनों में यूक्रेन बार्डर के पास लगभग २ लाख सैनिकों को तैनात किया हुआ था, जिसके बाद यूक्रेन पर हमले की अटकलें काफÞी वक्त से लगाई जा रही थीं । इसी बीच यूक्रेन ने अपने ही देश के रूस समर्थक यूक्रेन के विरोधी अलगाववादी डोनबास प्रांत के नागरिक आबादी पर आक्रमण कर दिया । यूक्रेन की इस कारवाई का नतीजा यह रहा कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की पाबंदियों की परवाह किए बिना यूक्रेन पर ‘स्पेशल मिलिटरी ऑपरेशन’ का एलान कर दिया । यूक्रेन संकट को अमेरिका नेतृत्ववाली पश्चिम और रूस के बीच एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई के तौर भी देखा जा रहा है ।
वर्ष १९९४ में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रशिया के बीच हंगारी के बुदपेस्ट में एक संधि पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसे ‘बुदपेस्ट मेमोरेण्डम’ भी कहा जाता है । इस संधि के तहत इन देशों ने भरोसा दिया था कि वो किसी भी परिस्थिति में यूक्रेन के हितों की सुरक्षा करेंगे और ये सुनिश्चित करेंगे कि यूक्रेन एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में कार्य करता रहे । उसी सन्धि तहत क्रिमिया युक्रेन अन्तर्गत रहने के शर्त मे युक्रेन ने अपने पास रहे सभी न्युक्लियर वोपेन्स रूस को वापस दे दिया । आज इसी संधि पर हस्ताक्षर करने वाले एक देश, रशिया ने यूक्रेन पर हमला कर दिया है और दूसरी तरफÞ अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन, यूक्रेन की कोई महत्वपूर्ण मदद नहीं कर पा रहे हैं ।
यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोप और पूर्व में रूस से जुड़ी है । गौरतलब है कि यूक्रेन कभी रूसी साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था, १९९१ में सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन को स्वतंत्रता मिली थी । सोवियत संघ के पतन के बाद यूक्रेन के अलग होने को कई रूसी राजनेता इतिहास की एक बड़ी गलती मानते हैं । रूस और यूक्रेन के बीच विवाद को अभी नेटो से जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन दोनों के बीच कई मौकÞों पर संघर्ष हो चुका है । इनमें २०१४ की जंग भी शामिल है, जब रूस ने यूक्रेन से क्रीमिया छीनकर उस पर कÞब्जÞा कर लिया था । वैसे जब १९९१ में यूक्रेन सोवियंत संघ से अलग हुआ था, तब भी कई बार क्रीमिया को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव हुआ था ।
यूक्रेन के पश्चिमी हिस्से में युक्रेनी राष्ट्रवाद की भावना प्रबल है । हालांकि यूक्रेन में रूसी भाषा बोलने वाले अल्पसंख्यकों की संख्या भी अच्छी खासी है और ये लोग विकसित रसिया से सटे हुए पूर्वी इलाके में ज्यादा मौजूद हैं । रूस यूक्रेन में रहने वाले ८० लाख रूसी लोगों की रक्षा को लेकर मुखर रहा है । पिछले जनगरणा में १७.५ प्रतिशत लोगों ने अपने आपको रूसी मूल का बताया था जबकि उससे पहलेवाले गणना के अनुपात में यह ५ प्रतिशत कम है । रसिया का मानना है की वो ५ प्रतिशत लोग यूक्रेन के अत्याचार के कारण देश परित्याग कर दिया है । साल २०१० में विक्टर यानूकोविच यूक्रेन के राष्ट्रपति बने और उन्होंने रूस से बेहद कÞरीबी संबंध बनाए । इन संबंधों की बुनियाद पर उन्होंने यूरोपीय संघ में शामिल होने के समझौते को खÞारिज कर दिया । इसकी प्रतिक्रिया में युक्रेनी राष्ट्रवाद की भावना वाले जनता ने भारी विरोध प्रदर्शन किया जिसके कारण साल २०१४ में उन्हें अपने पद से इस्तीफÞा देना पड़ा । पश्चिम समर्थित प्रदर्शनकारियों के विरोध के कारण फरवरी २०१४ में उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा ।
दरअसल बहुसंख्यक यूक्रेन रूसी पहचान से अलग होने को बेताब है, वहीं अल्पसंख्यक पूर्वी यूक्रेन रूसी भाषी, रूस और बेलारूस साथ–साथ खड़े नजर आते हैं । यूक्रेन पर दबाव बनाने के लिए रूस ने बेलारूस में अपने सैनिकों के साथ अत्याधुनिक और विध्वंसक हथियार जमा कर लिए हैं । रूसी राष्ट्रपति दावा करते हैं कि सोवियत समय में यूक्रेन को गÞलत तरीकÞे से ऐतिहासिक रूसी जÞमीन मिल गई थी । पिछले साल पुतिन ने एक लंबा आर्टिकल लिखकर रूसी और यूक्रेनी लोगों को ‘एक राष्ट्र’ का हिस्सा बताया था । रूस पर आरोप लगते हैं कि वो यूक्रेन के अलगाववादियों को पैसे और हथियारों से मदद कर रहा है । रूस इन आरोपों को खÞारिज करता है । हालांकि वो खुलकर अलगाववादियों का समर्थन करता है । यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में मौजूद डोनबास (लुहान्स्क और दोनेत्स्क इलाकों) को औद्योगिक शहर माना जाता है । लगातार रूस समर्थक अलगाववादियों और यूक्रेन की सेना के बीच डोनबास में संघर्ष चल रहा था । वहां पर २०१४ में हुई लड़ाई के दौरान १४,००० से अधिक लोग मारे गए थे । इसके बाद रूस ने यूक्रेन के खिÞलाफÞ आक्रामकता दिखाई और वहाँ के क्रिमिया राष्ट्रवाद पक्षधर अलगाववादियों की मदद की जिसके परिणामस्वरूप उसने यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप को रूस ने आजाद कर अपने नियंत्रण में ले लिया था । इसके अलावा यूक्रेन के डोनबास इलाके के लुहांस्क और डोनेस्तक में रूसी समर्थकों बहुसंख्यक हैं । इन अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है । इस घटना के बाद से ही यूक्रेन ने पश्चिमी देशों से नजÞदीकियां बढ़ाईं, लेकिन रूस लगातार इसके खिलाफ रहा है । यूक्रेन के बाहर की बात करें तो बेलारूस, जार्जिया पूरी तरह से रूस के साथ हैं । इसका अर्थ ये भी है कि यूक्रेन रूस से पूरी तरह से घिरा हुआ है ।
इस साल की शुरुआत में रूसी राष्ट्रपति ने यूक्रेन को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर पूर्वी हिस्से में युक्रेन ने युद्ध की कारवाई बंद नहीं की तो आगे होने वाले खÞूनखराबे के लिए वो ही जिम्मेदार होगा । अलगाववादी रुख वाले लुहान्स्क और दोनेत्स्क इलाकों पर अब तक रूस अपने समर्थकों के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रहा है । पुतिन के इन इलाकों को स्वतंत्र रूप से मान्यता दे दिया, रूस काफी वक्त से यूक्रेन पर पूर्वी हिस्से में ‘जनसंहार’ का आरोप लगाकर युद्ध के लिए माहौल तैयार कर ही रहा था । आखिरकार रूस ने २४ फरवरी २०२२ को यूक्रेन पर हमला बोल दिया है ।
बताया जाता है कि यूक्रेन–रसिया युद्ध की सबसे बड़ी वजह अमेरिका द्वारा यूक्रेन को नाटो संगठन में शामिल करने की कवायद है । लेकिन पूर्ण सत्य यह नहीं है । इसकी मुख्य बड़ी वजह ये है कि रूस का यूक्रेन से भावनात्मक रिश्ता है, वहाँ की रूसी मूल की आबादी से रूस का भावनात्मक बंधन है । रूस की नींव यूक्रेन की धरती से ही रखी गई थी । रूस की पहचान यूराल पर्वतश्रंख्ला भी यूक्रेन से ही होकर गुजरती है । इसलिए इस बात का निष्कर्ष निकालना जरुरी हो गया है की यूक्रेन–रसिया युद्ध ः सभ्यताओं का संघर्ष है या सिर्फ भू–राजनीति है । अमेरिकी राजनीतिशास्त्री सैमुअल पी हंटिंगटन ने यूक्रेन में संकट की भविष्यवाणी की थी । उनके सभ्यतागत मानक के अनुसार, यूक्रेन एक गंभीर रूप से विभाजित देश है, जो ऐतिहासिक, भौगोलिक और धार्मिक रेखाओं के साथ आंतरिक रूप से विभाजित है, पश्चिमी यूक्रेन दृढ़ता से यूरोपीय अर्थात पश्चिमा निकट में और पूर्वी यूक्रेन और क्रीमिया, रूढि़वादी रूस की निकट में मजबूती से है । हंटिंगटन ने यूक्रेन के बारे में बहुत कुछ लिखा, जो पश्चिमी और रूढि़वादी(अर्थोडक्स) सभ्यताओं के बीच की सीमा पर स्थित है । भले ही २०१४ के यूक्रेनी संकट से कई साल पहले उनके पुस्तक प्रकाशित हुआ था, हंटिंगटन की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक, द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन मे यूक्रेनी स्थिति के खतरों के बारे में चेतावनियों से भरी हुई है और भविष्यवाणी करती है कि यूक्रेन दो अलग–अलग हिस्सा में विभाजित हो सकता है, जिसके पूर्वी हिस्से रूस में विलय हो जाएगा । उनका सिद्धांत है कि राष्ट्र अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटेंगे । हटिंगटन का विचार था कि शीतयुद्ध के बाद दुनिया में संघर्ष का कारण राष्ट्रों के बीच विचारधाराओं के मतभेद के बजाय बड़ी सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक अंतर होगा ।
सोभियत संघ के विघटन के बाद शीत युद्ध का अन्त हुवा । इस परिस्थिति को फ्रांसिस फुकुयामा ने इतिहास का अन्त बताया, उनका मानना था कि विश्व में अब कोई लड़ाई नहीं होगी । फ्रांसिस फुकुयामा की १९९२ की पुस्तक, द एंड अफ हिस्ट्री मे तर्क दिया कि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में मानवाधिकार, उदार लोकतंत्र और स्वतन्त्र बाजार अर्थव्यवस्था राष्ट्रों के लिए एकमात्र शेष वैचारिक विकल्प बन गए है । उनका तर्क था कि दुनिया मे अब विचारधारा का द्वन्द समाप्त हो चुका है, हेगेलियन अर्थों में ‘इतिहास के अंत’ तक पहुंच गई है । इस पुस्तक के ठीक एक वर्ष के बाद हंटिंगटन ने अब दुनिया मे नई प्रकार की द्वन्द सभ्यता की आधार पर होने की चर्चा की, बाद में १९९६ की पुस्तक “द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन एंड द रीमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर” में अपनी थीसिस का विस्तार किया । सैमुअल हंटिंगटन, हार्वर्ड के प्रोफेसर और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के प्रभावशाली विद्वान थे, जिनका २००८ में निधन हो गया । शीत युद्ध के बाद की दुनिया में, उन्होंने भविष्यवाणी की, अब संघर्ष सांस्कृतिक मतभेदों में निहित होगा । उन्होंने तर्क दिया कि साझा संस्कृति और धर्म के आधार पर दुनिया को आठ सांस्कृतिक “सभ्यताओं” में विभाजित किया जा सकता है – पश्चिमी, रूढि़वादी इसाई, इस्लामी, हिंदू, सिनिक आदि ।
“सभ्यताओं के संघर्ष” में हंटिंगटन ने यह विचार ९० के दशक मे दिए, लेकिन आज विश्व मे स्पष्ट रूप से दुनिया की कई बढ़ती शक्तियों को प्रभावित करता है – जैसे भारत के नरेंद्र मोदी की हिंदुत्व विचारधारा का सशक्तिकरण, चीन के शी जिनपिंग के पश्चिमी प्रभाव के खिलाफ का संघर्ष, रसिया का रुढिवादिता (अर्थोडक्स), इस्लामिक र्याडिकल्स, पश्चिमा और अर्थोडक्स देश बीच का द्वन्द, युक्रेन लगायत दुनिया के कई देश मे राष्ट्रवाद का उद्बोदय और यहां तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर भी राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान इस तरह की सभ्यतावाद से संबंधित एक मोड़ के रूप में देख सकते हैं । १९९२ मे ही रूसी जनरल ने कहा था कि ‘यूक्रेन या बल्कि पूर्वी यूक्रेन, दस या पंद्रह वर्षों में वापस आ जाएगा, हाल ही मे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने युक्रेन मे रूसी जातियों की रक्षा के नाम पर क्रीमिया और डोनबास में रूस की सैन्य घुसपैठ को वैध ठहराया है । जैसा कि हंटिंगटन ने लिखा है, ‘शीत युद्ध के बाद की दुनिया में, लोगों के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर वैचारिक, राजनीतिक या आर्थिक नहीं हैं बल्कि वे सांस्कृतिक हैं ।’
यूक्रेन के ही मामले में यूएन में भारत के पीआर, टीएस तिरुमूर्ति ने रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग पर यूएनएससी की बैठक में कहा कि यह खेद की बात है कि कूटनीति का रास्ता छोड़ दिया गया । यूक्रेन पर आक्रमण की निंदा तो किए परन्तु सुरक्षा परिषद में वोट करने से परहेज किया । उन्होंने कहा कि भारत ने संवाद और कूटनीति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बीच का रास्ता खोजने के प्रयास में प्रासंगिक पक्षों तक पहुंचने का विकल्प बरकरार रखा है । भारत ने यूएनएससी के उस प्रस्ताव से परहेज किया है जिसमें यूक्रेन के खिलाफ रूस की ‘आक्रामकता’की निंदा की गई थी । भारत सुरक्षा परिषद में वोट करने से परहेज किया । जब की नेपाल ने रसिया के खिलाफ वोट दिया । हंटिंगटन ने सभी आठौ सभ्यताओं के बीच का संघर्ष समन्वय आदि के बारे मे भी व्याख्या किया है । गौरतलब है की व्याख्या में हिन्दू सभ्यता का संघर्ष एव समन्वय पश्चिमी और रुसी के साथ बराबर होने का बताया गया है । कुछ दिन पहले ही भारत के पुर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ स्वर्गीय बिपिन रावत ने भारत के खिलाफ दो पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान की फौजों की तैनाती में एक खतरनाक पैटर्न की शिनाख्त की । उन्होंने कहा कि, ‘क्लैश आफ सिविलाइजेशंस’, यानी सभ्यताओं के संघर्ष की थिअरी के तहत चीनी और इस्लामी सभ्यताओं के बीच गठजोड़ की बात हो रही है । चीन ने इसी थिअरी के मुताबिक ईरान और तुर्की के साथ समझदारी बनाई है और अब वे अफगानिस्तान में दाखिल होने जा रहे हैं । हंटिंगटन थिओरी के तहत चीनी और इस्लाम बीच गठजोड़ की परिकल्पना की गई है जब की उस दौरान पश्चिमी और इस्लाम के बीच समन्वय हुवा करता था । हलाकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इसे लेकर घोर असहमतियां मौजूद हैं । फिर भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मौजूदा भारत सत्तारूढ़ दल की घोषित विचारधारा है । कूटनीतिक जरूरतें अपनी जगह, लेकिन इस सरकार से जुड़े जिम्मेदार लोगों की सोच ‘सभ्यता संघर्ष’ की धारणा से बिल्कुल निरपेक्ष तो नहीं रह सकती ।
इस आलोक में, यूक्रेन पर आक्रमण भी सभ्यतावाद की तरह दिखता है । इस बीच रूसी राष्ट्रवादी लेखक हो या राष्ट्रपति पुतिन “रूसी दुनिया” को बलपूर्वक बनाने के बात कराते है – जिसका अर्थ है रुसी सभ्यता का एकीकरण, विश्व क्रांति या विश्व विजय भी नहीं है, बल्कि सभ्यतागत नियंत्रण, अपने इतिहास, संस्कृति का एकीकरण, जैसा कि पुतिन ने अपने युद्ध भाषण में भी कहा था । वास्तव मे यूक्रेन के अधिक लोग स्वतंत्र रहना चाहते हैं, लेकिन पूर्वी यूक्रेन के लोगों की मांग है कि यूक्रेन को रूस मे मिलाना चाहिए या उनलोगों को स्वायत्त चाहिए तथा युरोपियन युनियन तथा नाटो से अलग बल्कि रसिया से दोस्ती चाहती है । यूक्रेन की राजनीति में नागरिक एव नेता दो गुटों में बंटे हुए हैं । एक दल खुले तौर पर रूस का समर्थन करता है और दूसरा दल पश्चिमी देशों का समर्थन करता है । यही वजह है कि आज यूक्रेन दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच संघर्ष मे फंसा हुआ है । नजर ये आ रहा है कि युक्रेन में शान्ति के लिए युक्रेन को रुस से दोस्ती करना होगा और पश्चिमी युरोप से सम्बन्ध तोड़ना होगा या तो युक्रेन के पूर्वी रुसी संस्कृति वाले को अपने देश से अलग करना होगा ।
अर्थात युक्रेन का विभाजन । ये सब सभ्यता बीच का संघर्ष ही तो है । सैमुअल हंटिंगटन ने जिसे ‘क्लैश ऑफ सिभिलाइजेसन’ कहा है, उसके अनुसार युक्रेन के घरेलु ‘रूढि़वादी(अर्थोडक्स) और ग्रीक कैथोलिक ईसाई के बीच का संघर्ष, रसिया के रूढि़वादी(अर्थोडक्स) और पश्चिमी युरोप के ग्रीक कैथोलिक ईसाई के भू–राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण युक्रेन के ये घरेलू मतभेद सिर पर आ गए है । २०१५ के मिन्स्क शांति समझौते के अनुसार, यूक्रेन में डोनबास के रूसी भाषी लोगों की स्वायत्तता को नकारने के बहाने यूक्रेन में रूसी जातीय सुरक्षा के नाम पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का सैन्य आक्रमण, और यूक्रेन के लिए पश्चिमा का समर्थन, यह परिघटना हंटिंगटन का सभ्यता सिद्धांत का करीब हैं ।
हंटिंगटन ने अपने सिद्धान्त में तर्क दिया कि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में उभरने वाले अधिकांश सभ्यतागत ब्लाकों में प्राकृतिक नेता होंगे, और “मूल राज्य” होगा । सिनिक की सभ्यता का नेतृत्व चीन, रूढि़वादी सभ्यता का रूस और पश्चिमी सभ्यता का संयुक्त राज्य अमेरिका, पुर्विया या हिन्दु सभ्यता का हिन्दुस्तान द्वारा नेतृत्व किया जाएगा । इस्लामी दुनिया में तत्काल कोई प्राकृतिक नेता नहीं होंगे, चूंकि सुन्नी और शिया के बीच और मध्य पूर्व के प्रमुख देशों जैसे तुर्की, मिस्र, सऊदी अरब और ईरान के बीच नेतृत्व के लिए संघर्ष होगा । इन देशों में राज्य से भी अधिक मजबुत धार्मिक नेता होंगे । उन्होंने ये भी कहा कि विश्व में सभ्यताओं के बीच संघर्ष होगा और लोकल में इथनिसिटी बीच । एक ही देश में दो सभ्यता के बीच का संघर्ष हुई तो दोनों सभ्यता के मूल राज्य के मध्यस्थता में समस्या के हल निकाला जा सकता है । यूक्रेन के सन्दर्भ में भी रसिया और अमेरिका ही समस्या का हल निकाल पाएगी । इसी तरह एक ही सभ्यता के अंदर के इथनिक संघर्ष को उस सभ्यतागत ब्लॉकों के प्राकृतिक नेता और “मूल राज्य” जितना हल कर पाएगी उतना ही उस सभ्यता का मजबूती का संभावना रहेगा । इस थियोरी के आलोक में हिन्दू सभ्यता के ब्लाक में चाहे भारत के अंदिरुनि इथनिसिटी, अल्पसंख्यक का समस्या हो या नेपाल के मधेशी, जनजातियों की समस्या हो या भूटान के नेपाली भाषियों की या फिर श्रीलंका की तमिल की इन समस्या का हल ही प्राकृतिक नेता के रूप मे मोदी को और मजबूत बनाएगी तथा सभ्यता को इंट्रीग्रेट करेगी ।
यूक्रेन में जारी हिंसा का कोई भी मानवतावादी समर्थन नहीं कर सकता परन्तु युक्रेन के संकट से एक महत्वपूर्ण सीख हम सीख सकते हैं । यूक्रेन जैसे ही चाहे सभ्यता का आधार हो या एथनिसिटी का बहुसंस्कृति राष्ट्रवाद में आधारित देश के सन्दर्भ मे हटिंगटन कहते है ऐसे देश सभी के संस्कृति के सम्मान मे सावधानी और कुशल कूटनीति ही उपयुक्त है, जबकि युक्रेन ने २०१४ के बाद से पूर्वी युक्रेन के भाषाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । ऐसे देश मे प्रोक्सी युद्ध या प्रायोजित युद्ध का जोखिम रहता है । अतः यूक्रेन के सन्दर्भ में भी उन्होंने कहा या तो विभाजन से समाधान होगा, या एक ऐसा संघ जहां देश के दोनों हिस्सों की आकांक्षाओं का सम्मान किया जाता हो । अर्थात स्व पहचान, स्वायत्ता सहित के संघीयता से ही राष्ट्रीय एकता सम्भव है इसमे अगर कोई बहु संस्कृतिवाला देश कमजÞोर हो तो देश के आंतरिक मामलों में दूसरे देशों का दखÞल होता है, और उस देश में अनिश्चितता और अस्थिरता पैदा होना स्वाभाविक है । वहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून और संधियों का भी कोई महत्व नहीं रह जाता, जैसा की युक्रेन में भी देखा गया । नेपाल भी बहु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद वाले देश है लेकिन यहाँ भी राज्य एकल सांस्कृतिक दृष्टिकोण से संचालन की प्रयास हो रही है । आधुनिक नेपाल के स्थापना काल से ही थारु–मधेशी एव आदिवासी जनजाति अपनी पहचान सहित के राज्य मे हिस्सेदारी मांग रही है, हालाँकि नेपाल मे संघीयता है लेकिन वह थारु–मधेशी एव आदिवासी जनजाति की न अपनी पहचान पर आधारित है और ना ही स्वायत्त है । युक्रेन से हमे यही सीख लेनी चाहिए की समय रहते ही नेपाल के मधेशी लगायत असन्तुष्ट समुहों का सम्बोधन हो ।

