बस बोली लगाओ और वोटों से अपनी झोली भरो “आओ चूना लगवाएं” : बिम्मी कालिन्दी शर्मा
व्यग्ंय-बिम्मी कालिन्दी शर्मा, वीरगंज,
चूना लगाने या लगवाने का मौसम फिर से आ गया है । वैसे घरों में चूना या लिपाई पुताई दिवाली या खास उत्सव त्यौहारों में ही होता है । चुनाव भी तो देश का राष्ट्रीय त्यौहार है । ईसी लिए मतदाताओं के अपेक्षाओं पर चूना लगवाने का खेल शुरु हो गया है । चुनाव से पहले घोषणापत्र या भाषण में नेता या उम्मीदवार अपने मतदाताओं को जो आश्वासन दे कर खुश करते है । चुनाव जितने के बाद उन.सभी आश्वासनों को भूल जाते हैं या रद्दी की टोकरी में डाल देते है । जनता या मतदाताओं के आशा और अपेक्षाओं को पूरा न कर के टांय-टांय फिस्स करने को ही राजनीतिक भाषा में चूना लगाने को कहते है । और यह चूना मतदाताओं के गाल पर नहीं दिल पर लगाया जाता है । और दिल पर लगा दाग हो या चूना कभी नहीं जाता । पर हमारे देश के मतदाता बहुत ही उदारमना है ईसी लिए चूना लगे दिल को फिर से धो पोंछ कर अगली बार और बेहतर तरिके से चूना लगाने के लिए हाजिर हो जाते हैं ।
वैसे यह चूना पांच साल में तीन बार लग ही जाता है । विभिन्न राजनीतिक दल और उनके उम्मीदवारों के भाषण और आश्वासन जनता कान खडी कर के सुनती है और उनकी बात मान कर मास, भात और दारु के बदले मे अपना वोट बेच कर खुद ही अपने भविष्य पर चूना लगा लेती हैं । कभी-कभी कंही-कंही के मतदाता बहुत खडुस भी होते हैं । ईन्हे आप सभ्य भाषा में ईलिट भी कह सकते हैं । यह मास और दारू में नहीं बिकते बल्कि मोबाईल और लैपटॉप के बदले में अपना वोट बेच कर अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर लेते हैं या चूना लगा देते हैं । गरीब और अनपढ औरत एक साडी के बदले में अपना वोट बेच कर चूना लगवाने का काम बखुबी करती हैं । और समय यह भले यह बेवकूफ दिखें पर चुनाव में अपने वोट को सब्जी मंडी मे सब्जी से अच्छे तरिके से मोल-मोलाई कर के अपना वोट बेच कर चूना लगवाने की परंपरा को स-गौरव निर्वाह करती है ।
पनवाड़ी का काम है हर दिन पान पर चूना लगवाना । पनवाड़ी पूरी जिंदगी जितना पान पर चूना नही लगाता होगा उससे ज्यादा चूना चुनाव के समय नेता और उम्मीदवार अपने क्षेत्र के मतदाताओं के उम्मीद पर लगाते हैं । चुनाव के समय सब नेता और दल सब सब की बात मानते हैं वह भी हाथ जोड कर । बुखार तो तब उतरता है जब चुनाव खत्म हो कर मत परिणाम सामने आता है । तब कल वही हाथ जोड कर वीनित भाव में अपने मतदाताओं के सामने आने वाला उम्मीदवार जितने के बाद उन्हीं को अंगूठा दिखा कर ‘बाबा जी का ठुल्लू’ करता है । तब मतदाता पछताने लगता है कि ईसने उनके भविष्य पर बडी बेरहमी से चूना लगा दिया । पर ‘अब पछताय होत क्या जब चीडिया चूग गई खेत’ । उम्मीदवार तो जितने के बाद सांप बन कर आगे निकल गया । अब लकिर पिट्ने से क्या फायदा ?
उम्मीदवारों के आश्वासन के लड्डू बहुत मिठे होते हैं । देश को अग्रगामी छलांग मारने के अपनी और अपने राजनीतिक दल की महत्ता सिद्ध करने के लिए एडिचोटी का बल लगा देते हैं । और यह आश्वासन का लड्डू शादी के लड्डू से भी खतरनाक होता है । पर बेवकूफ मतदाता वक्त रहते ईस आश्वासन की असलियत जान नहीं पाते और अपनी भेंड मानसिकता को प्रदर्शित करते हुए आश्वासन की घांस बडे प्रेम से खाते है । पर जब चुनाव के कुछ समय बाद अपने क्षेत्र के नेता का दर्शन भी दूर्लभ हो जाती है तब उसको महसुस होता है कि उसके भविष्य कि पीठ पर अच्छा खासा चूना लग चूका है । उसके क्षेत्र मे जब नेताजी जब विकाश को ‘काश’ में तब्दील कर देते हैं तब वह मन ही मन सोचता है कि ‘काश मैने अमूक दल के अमूक नेता को अपना वोट नहीं दिया होता ? पर उसका यह सोचना शमसान वैराग्य जैसा ही क्षणिक होता है । जैसे ही अगला चुनाव आता है वह पुराने घाव भूल जाता है और अपनी पीठ नेता या उम्मीदवारों के आगे कर देता है चूना लगाने के लिए । यही होता आया है और यही होता रहेगा । जब तक नोट के बदले वोट बिकता रहेगा ।
सिर्फ न्याय ही अंधा नहीं है और न्याय की देवी के आंखो पर ही सिर्फ पट्टी नहीं बंधी है । फर्क सिर्फ ईतना है कि कोई आंख से तो कोई दिमाग से अंधा है । यदि सच में मतदाता में.वह ल्याकत होती तो वह स्थानीय चुनाव में पार्टी नहीं देखती बल्कि सही और स्वतंत्र उम्मीदवार को मत दे कर जितवाती । पर ईस देश में जनता है कंहा सब के सब पार्टी या नेता के पिछलग्गू है । ईसी लिए देश जाए चाहे भांड में.पर अपना दल और अपने नेता को ही जितवाना है । चाहे वोट प्रेम से मिले या बाई हूक या बाई क्रूक कर के मिले । जितवाना तो जैसे भी अपने ही नेता को है । बेचारे मतदाता ने अपने नेता का नमक जो खाया है । अब नमक खाया है तो वोट दे कर सधाएगें और देश के भविष्य पर चूना लगा देगें । खून दे कर आजादी भले ही न मिले पर नोट देने पर वोट अपनी झोली पर ही गिरेगा । यंहा सब बिकाउ है, सब की किमत तय है । बस बोली लगाओ और वोटों से अपनी झोली भरो । चुनाव देशका राष्ट्रीय त्यौहार है । सब को ईस मौके पर नंए कपडे पहनने ही चाहिए । और ईसके लिए भेंड जनता अपने वोट को बेच कर अपने लिए नंए कपडे खरीद लोगों ती है । और देश के भविष्य पर लगा कर चूना । यह चूना ही देश की गरीमा पर लगाया गया निर्लज्जता का वह वस्त्र है जिसके सामने सत्य और ईमानदारी की अस्त्र हार जाती है ।


